राजनीति

गरिमा की चोरी…..

विमल भाई

राष्ट्रीय समन्वयक
जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

माहौल ऐसा की जैसे पूरा देश चौकीदार बनने को तैयार है। सोशल मीडिया पर और खरीदे हुए चैनलों पर “मैं भी चौकीदार”, का चाय बेचने वाले जैसा प्रचार मानो कोई रैली नई रिलीज होने वाली फिल्म का प्रचार चल रहा है। जिसके नायक स्वंय देश के प्रधानमंत्री हैं। जिनके नीचे दासियों नॉकर काम करते हैं। जिस अकेले व्यक्ति की सुरक्षा में देश के करोड़ों रुपए हर महीने खर्च हो रहे है। जिसके घर की चौकीदारी के लिए देश के सर्वोत्तम युवा खड़े हैं। जिनके राज में देश के सबसे सुरक्षित सीबीआई के दफ्तरों में फाइले चोरी हो जाती हैं। जो व्यक्ति अपनी शिक्षा की डिग्री तक सभाल के नहीं रख पाया वो अपने आप को चौकीदार बताकर गरीब मेहनतकश चौकीदारों का मजाक ही रहा है।

देश के गरीब तबके के लिए न्यूनतम मजदूरी कम से कम करते जा रहे हैं। ऐसे में वित्त मंत्री अपने आप को जब मैं भी चौकीदार कहते हैं तो यह उन तमाम गरीब बेरोजगार और मजबूरी में ही 12 से 16 घंटे की नौकरी करके मात्र अपना जीवन यापन करने लायक पैसा कमाने वालों का न केवल मजाक है बल्कि उनका हद दर्जे का अपमान है। सत्ता का नशा या भक्तगिरी इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि वे सदियों से घरों, दुकानों, गलियों, बाजारों की रातों को जाग कर भी सुरक्षा करने वालों को उचित आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा तक नही दे सके और चुनावी जुमले के लिए माथे पर पट्टी, टी शर्ट पहने, ट्वीटर एकाउंट पर नाम के आगे चौकीदार लगाना?

जुमले कि काट पर नया जुमला “चौकीदार चोर है”। आलोचना तो उसकी भी है। परिवार से दूर, बिना किसी छुट्टी, हफ्ते में 7 दिन काम करने वाला पेशा बदनाम हो रहा है।
आज राजनेता चौकीदार के पेशे को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए बदनाम कर रहे है।

चुनाव आयोग भी इनकी जबान पर कोई लगाम नहीं लगा सका। आचार विचार की तो बात ही छोड़िए। जनता को मात्र वोट डालने के लिए जागरूक होने के अलावा इन जुमलों के प्रति भी जागरूक होना चाहिए।

अपने नेता की अंधभक्ति करते हुए जनता को भी इस बात का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह किसी पेशे का मजाक बनाए या बदनाम करें। मुश्किल तो यह है कि इन सब पर एक कड़ी निगाह रखने वाला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता अपने आप में एक जुमला बन के रह गई है। शायद ही किसी अखबार में चौकीदार की व्यथा कथा पर या राजनीतिक दलों द्वारा चौकीदार शब्द के गलत इस्तेमाल पर कोई संपादकीय लिखा गया हो? टीवी चैनलों के बारे में तो बात करनी भी शब्दों का बर्बादी है बस एक रविश कुमार जरूर अपने प्राइम टाइम पर असली चौकीदारों की व्यथा सुनाते हैं और उसे रूबरू कराते हैं की उत्तर प्रदेश के कई पुलिस थाने में ₹1500 में काम करने वाले चौकीदार भी हैं।

प्रधानमंत्री के पक्ष में रैलियों में मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और चुनाव के मैदान में उतरे प्रत्याक्षी तक हम चौकीदार के नारे लगा रहे हैं। प्रश्न यह है कि देश का प्रधानमंत्री सच में देश की चौकीदारी कर रहा है? तो किसकी चौकीदारी कर रहा है? किसके लिए चौकीदारी कर रहा है? वैसे इन प्रश्नों के उत्तर जग जाहिर है। दूसरी तरफ चौकीदार चोर कहने वालों को भी कहना होगा कि प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा की चोरी की है। ये शायद सही और पूरी बात होगी। कम से कम देश का एक बड़ा कमजोर वर्ग अपनी को आहत तो नहीं महसूस करेगा।

चुनाव में हम चौकीदार और चौकीदार चोर कहने वाले भी क्या देश के चौकीदारों की दुर्दशा पर अपने घोषणापत्र में कुछ कहेंगे या उनको मात्र वोट की संख्या ही मानेंगे?

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