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क्या सावरकर ख़ुद ही अपने आप को वीर का ख़िताब दे गए थे?

गांधीजी की हत्या के सिलसिले में पकड़े जाने से बहुत पहले, 1911 में, सावरकर और उनका भाई एक कलक्टर की हत्या के मामले में पकड़े गए थे। उन्हें 50 साल की सज़ा हुई। जेल से बाहर निकलने के लिए उन्होंने बार-बार दयनीय माफ़ीनामे लिखे।

अंगरेज़ शासकों को अजीबोग़रीब लिखित भरोसे देकर 1924 में सावरकर बाहर निकल सके। दो साल बाद ही उनकी एक जीवनी छपी आई: “बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर का जीवन”। लेखक का नाम था – ‘चित्र गुप्त’। पहले-पहल इसी किताब में उन्हें “स्वातंत्र्य-वीर” ठहराया गया था।

सावरकर की इस जीवनी का दूसरा संस्करण दशकों बाद – फ़रवरी, 1986 में – बालाराव सावरकर के प्रयासों से छपा। वीर सावरकर प्रकाशन संस्थान से। सावरकर को “जन्मजात नायक” बताने वाली इस कृति की प्रस्तावना डॉ रवींद्र वामन रामदास ने लिखी थी। प्रस्तावना में उन्होंने पुस्तक के एक अंश की लेखन-शैली का हवाला देकर कहा कि जीवनी के लेखक ‘चित्रगुप्त’ और कोई नहीं, सावरकर स्वयं थे।

डॉ रामदास ने यह भी लिखा: “हालाँकि सावरकर ने इस बात को (कि अपनी जीवनी उन्होंने छद्म नाम से लिखी थी) स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद भी बताया क्यों नहीं, यह बात हमेशा एक भेद ही रहेगी।”

यानी सावरकर को “वीर” किसने क़रार दिया – यह महज़ रहस्य नहीं, अब गहन पड़ताल का मसला भी है।

‘द वायर’ में कुछ समय पहले शाया हुए पवन कुलकर्णी के एक शोधपूर्ण लेख से मुझे “जीवनी” की जानकारी मिली थी। फिर नैट पर (सावरकर-डॉट-ऑर्ग) अंगरेज़ी में वह पूरी किताब पीडीएफ़ में मिल गई और प्रस्तावना का रस्योद्घाटन पढ़ा।

पवन ने अपने अध्ययन में इस का भी अच्छा ख़ाका खींचा है कि जब सुभाष चंद्र बोस अंगरेज़ी राज से मोर्चा लेने को अपनी सेना खड़ी कर रहे थे, जेल से बाहर आकर सावरकर ने लाखों भारतीय युवकों को अंगरेज़ों की फ़ौज में भरती करवाने में मदद की। इतना ही नहीं, जब देश को मिलकर अंगरेज़ों से जूझना था, सावरकर ने हिंदुत्व की विचारधारा छेड़कर सांप्रदायिकता की दरार को गहरा किया और आज़ादी के संघर्ष को अस्थिरता दी।

(नोटः ये आलेख वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक पोस्ट एवं सबरंग हिन्दी में पूर्व में प्रकाशित किया जा चुका है।)

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