आदिवासी हिंसा

क्या आपको मालुम हैं : एक वक्त था कि अमेरिका में आदिवासियों को मारने का लाइसेंस मिलता था .

हिमांशु कुमार

भारत का प्रधानमंत्री कहता है कि उसे शहरी नक्सलवादियों से जान को खतरा है

और नक्सलवादी कौन हैं ?

तो भारतीय लोगों की आम समझ कहती है कि आदिवासी ही नक्सलवादी हैं

और शहरी नक्सलवादी कौन हैं ?

जो आदिवासियों की हत्या का विरोध करते हैं

और जंगल, पहाड़ तथा नदियों को छीनकर पूंजीपतियों को सौंपने के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं उन्हें सरकार शहरी नक्सली कहती है

तो आदिवासियों की हत्याओं और जंगल पर पूंजीपतियों के कब्ज़े को रोकने वाले लोगों से प्रधानमंत्री को इतना डर क्यों लगता है

क्योंकि चुनाव में पूंजीपतियों से रिश्वत खाई थी और मुफ्त के हवाई जहाज में घूमा था और वादा किया था कि खदानें जंगल नदियां सब पर आपका कब्ज़ा करवा दूंगा

लेकिन ये आदिवासियों के शहरी दोस्त ऐसा नहीं होने दे रहे

ध्यान दीजिये मुझे बस्तर से क्यों निकाला, सोनी सोरी की कोख में पत्थर क्यों भरे, बच्चों के डाक्टर बिनायक सेन, सीमा आज़ाद, विश्व विजय और प्रोफेसर जीएन साई बाबा को उम्रकैद की सज़ा क्यों दी गई ?

अभी दो हफ्ते पहले दो पढ़ने लिखने वाले लोगों को जेल में क्यों डाला गया ?

क्योंकि ये लोग आदिवासियों की हत्याओं का विरोध करते हैं,

असल में यह विकास का तरीका ही हिंसक है

आदिवासियों की हत्या करके,

उनके जंगलों पर कब्ज़ा करके ही आप शहरों का विकास कर सकते हैं

आपको यकीन नहीं होगा कि इस विकास के लिये अमेरिका और अफ्रीका के आदिवासियों के ऊपर तथाकथित सभ्य लोगों ने कितने जुल्म किए हैं ?

एक वक्त था कि अमेरिका में आदिवासियों को मारने का लाइसेंस मिलता था

ऐसे एक लाइसेंस की फोटो लेख के साथ संलग्न है

आज भी बस्तर में आदिवासियों को मारने और जेल में डालने पर सुरक्षा बल के सिपाहियों को नगद ईनाम और तरक्की मिलती है

आदिवासियों की हत्या करने का वह पुराना खेल आज भी जारी है

फर्क सिर्फ इतना है कि जो अतीत में हुआ उसके बारे में आप जानते हैं

और आज जो हो रहा है उसकी तरफ आप ध्यान नहीं दे रहे

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