कला साहित्य एवं संस्कृति

कोल्हापुर यात्रा संस्मरण : कोल्हापुर भी कमाल का शहर है : शाहू जी महाराज का सामाजिक न्याय ,7 वीं सदी का पुरातन मन्दिर और धर्मिक सौहाद्र की मिसाल मज़ार : एक दिन में जितना समझ सके , चार किश्त में {संकलित }.

गोआ से पुणे वापस आते समय विश्व विजय ने प्रस्ताव दिया कि चलो चाचा कोल्हापुर चलते हैं वहां से आप पुणे चले जाना ,एक दो दिन में जितना हो सकेगा घूम लीजिये .में तो तैयार था ही ,उसने कोल्हापुर में अपने एक सहयोगी  आसिफ  मुजावर  को साथ भेज़ दिया ,उनके साथ शाहू जी महराज  के महल  और जहां तहां गये .उसे चार किश्तो में बांधा है .

डॉ, लाखन सिंह 

6.02.2018

? कोल्हापुर 1

कोल्हापुर भी कमाल का शहर है , प्यार मोहब्बत और एकता खोजने वाले को ऐसी जगह मिल ही जाती हैं .
**

गोवा से पुणे जाते समय कोल्हापुर में एक दिन रुकने का प्रोग्राम बना , देखा तो बहुत कुछ है चलो पहले सबसे अच्छी जगह घुमाते है .

मेरे साथ आसिफ मुजावर है जो कोटक महेंद्र बैंक में काम करते है ,वे मुझे हज़रत पीर बाबुजमाल शाह जमाल कलंदर दरगाह पर ले गये , करीब 150 साल पुरानी है , उसके प्रवेश द्वार पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई हैं औऱ शायद बाद म़े सिंदूर से पोत दी हैं. द्वार के एक ही पत्थर में खुदी हुई . अद्भुत कर देने वाला द्र्श्य .

 


आसिफ के पास कोई रेडिमेड कहानी नही है और न विस्मय का एहसास , साधारण सी प्रतिक्रिया. उन्होंने कहा यह गणेश की मूर्ति शुरू से है ,मेने बचपन से देखी मेरे पिता भी बताते है . कभी कोई विवाद नही हुआ .
बात निकली तो मेने पूछ ही लिया यहां के साम्प्रदायिक सोहाद्र के बारे मे , तब उन्होंने बडी़ गम्भीरता से कहा यहाँ कभी हिन्दू मुस्लिम में कोई झगड़ा या दंगा नहीं हुआ ,बाबरी मस्जिद के समय भी . लेकिन बुजुर्ग बताते हैं कि 1948 में गाँधी जी की हत्या के समय जरूर कुछ मराठों और चित्तपावन ब्राह्मण के बीच तनाव और कहीं कहीं मारपीट की घटना हुई है कोल्हापुर में करीब बीस फीसदी मुस्लिम और 10,12 फीसदी दलित है ., चुनावी राजनीती के भी कुछ सन्देश है जैसे अभी तक यहाँ से हमेशा कांग्रेस या एनसीपी जीतती रही हैं ,पहली बार विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसैना को एक एक सीट मिली हैं..
खैर .

तो मुझे बहुत अच्छा लगा ,अभी तीन दिन पहले गोवा मे भी एसा ही राहत का द्र्श्य देखा और आप तक पहुचाया भी था .

कोल्हापुर -2

**

महाराष्ट्र में लोकशाही है या शिवशाही और सरकारी ध्वज तिरंगा है इस भगवा तिकोना : में आज कोल्हापुर से पुणे महाराष्ट परिवहन बस { सरकारी ).से आ रहा था तो उस बस पर यही लिखा था .
शिवशाही और बलशाली घोडों के साथ थे हिन्दू सामंती भगवा तिकोने ध्वज .

थोड़ा सोचिये कोई स्टेट अपनी बस को इस्लामिक सल्तनत लिख कर उसपर हरे झंडे के साथ कोई इस्लामिक चिन्ह बना कर बस चला दिया होता तो क्या होता , सारा मीडया और कोर्ट भी घन घना गया होता .

 

चलिये आप देख तो लीजिये ही .
**

? कोल्हापुर -3

शहर के बीचो बीच 13 सौ साल पुराना / सातवीं सदी / महालक्ष्मी का पुरातात्त्विक मंदिर जिसे मंदिर समिति ने कमाई के चलते असुरक्षित कर दिया. .कन्नड़ के चालुक्य साम्राज्य के संपन्न अवशेष .इसे पूजा पाठ से मुक्त किया जाए .

**
7.02.2018

 

कोल्हापुर /

गोआ से वापस होते समय विश्व विजय ने सुझाया की पूणे वापसी के समय कोल्हापुर होते चलते हैं , वहां शाहू जी महाराज का संग्राहलय और 7 वीं सदी का एक पुरातत्व मंदिर भी है , पहुचे तो और भी बहुत कुछ मिला
यह मन्दिर 1300 साल पुराना है ,एक बार भूकम्प आने पर यह ध्वस्त हो गया था जिसे 100 साल बाद दुबारा बनाया गया . आज इसकी भव्यता और पुरातन स्थिति को मंदिर समिति ने बर्बाद कर दिया है ,पूरे ढांचे को भोंडे और भडकीले रंगों से उसके सोंदर्य को खराब कर दिया गया हैं .

मंदिर को पूजा पाट के लिये खोल देने की वजह से असुरक्षित भी हैं और असुन्दर भी.
मंदिर का शिल्प और पुरातन कला हमारी मूर्ति कला औऱ भवन निर्माण कला अद्भुत है .

 

मंदिर की जो जानकारी मिल सकी व़ो यह हैं.

महालक्ष्मी मंदिर विभिन्न शक्ति पीठों मैं एक है और कन्नड़ के चालुक्य साम्राज्य के समय में या की करीब 700 ad ऐडी में इस मंदिर का निर्माण हो ने का अनुमान किया गया है। एक काला पत्थर के मंच पर, लक्ष्मी की चार हाथ़ौ वाली प्रतिमा, सिर पर मकुट पहने हुए बनाया गया है और गहनों से सजाया हुआ मकुट लगभग चालीस किलोग्राम वजन का है। काले पत्थर में निर्मित लक्ष्मी की प्रतिमा की ऊंचाई करीब 3 फीट है। मंदिर के एक दीवार में श्री यंत्र पत्थर पर खोद कर चित्र बनाया गया है। देवी की मूर्ति के पीछे देवी की वाहन शेर का एक पत्थर में बना प्रतिमा भी मौजूद है। देवी के मुकुट में विष्णु के शेषनाग नागिन का चित्र भी रचाया गया है। लक्ष्मी के चारों हाथों में अमूल्य प्रतीक वस्तुओं को पकड़ते दिखाई देते है। निचले दाहिने हाथ में निम्बू फल , ऊपरी दाएँ हाथ में गदा के साथ ऊपरी दाई हाथ में एक ढाल (एक खेटका) और निचले बाएँ हाथ में एक कटोरे लिए (पानपात्र) देखें जातें है।

पश्चिमी दीवार पर एक छोटी सी खुली खिड़की मिलती है, जिसके माध्यम से सूरज की किरणें हर साल मार्च और सितंबर महीनों के 21 तारीख के आसपास तीन दिनों के लिये मूर्ति पर आती हैं .

इन प्रतिमाओं में से कुछ 11 वीं सदी के हो सकते हैं, जबकि कुछ हाल ही मूल के हैं। इसके अलावा आंगन में स्थित मणिकर्णिका कुंड के तट पर महादेव मंदिर भी स्थित हैं।

##

कोल्हापुर – 4 छत्रपति साहूजी महाराज और उनका महल : सामाजिक न्याय के लिये उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा , सामन्तो वे बिरले ही है

?

? कोल्हापुर – 4 छत्रपति साहूजी महाराज और उनका महल : सामाजिक न्याय के लिये उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा , सामन्तो वे बिरले ही है .

6.02.2018

कोल्हापुर आने का मेरा मुख्य मकसद ही साहूजी महाराज की कर्मभूमि से रूबरू होना था ,मुझे विश्व विजय ने जब कोल्हापुर चलने क् प्रस्ताव किया तो में सहर्ष तैयार हो भी गया.

मेंरे साथ मुजावर थे जो महेंद्र कोटक बैंक से है , पहली बात मुझे लिखनी ही चाहिए कि किसी भी ऐतिहासिक इमारत को देखने के लिये जो भी टिकिट राशी तय करती है वो भारतीय के लिये कम और विदेशियों के लिये दुगना तिगना ,यह तर्क आजतक समझ नहीं आया की हम एसा करते क्यों है ,यह लूटने का काम सरकार तो करती ही है साथ मे ऑटो ,टेक्सी ,होटल से लेकर जो भी उनके सम्पर्क में आता हैं वह भी करना चाहता हैं और करते भी है .यह सिर्फ हमारे लूटने की सँस्कृति के अलावा औऱ कुछ नही है , कुछ और हो तो आप कभी बताइये ,अभी फ़िलहाल महल में चलते हैं .

 

महल को दूर से देखने पुर कुछ कुछ ग्वालियर के एम एल बी कॉलेज जैसा दिखता है { मे वहाँ तीन साल पढा जो हूँ।} जो सिंधिया राज घराने से अंग्रेजों ने विक्टोरिया कॉलेज़ खोलने के लिये ले लिया था ,जो आज़ादी के बाद महारानी लक्ष्मी बाई के नाम से जाना गया .
महल या संग्राहलय के ठीक सामने शाहू जी महाराज की छोटी सी मूर्ती लगी हैं ,जिसपर लिखा है ,हिन्दू हित के लिए साहू जी महाराज आदि आदि ….
इसकी इबारत और उनके महल पर भगवा तिकोना ध्वज उनके सामाजिक सहकारो की छवि को नहीं दर्षाते है .
महल में घुसते ही यह निर्देश की फ़ोटो लेना सख्त मना आहे ..कमाल है जो जो फ़ोटो गली गली में किताबो औऱ टूरिस्ट परम्पले मे आसानी से मिल जाते है उनके फोटो लेने में क्या प्रॉब्लम हो सकती है ,यह समस्या सब जगह ही हैं .
महल या संग्रहालय जो भी कहिये , इसमें कोई समझाने वाला नही हैं ,जिसे जैसा घूमना हो जो समझना हो वो समझे .

 


महल मे अस्त्र शस्त्र ,फर्नीचर ,फोटो और मूर्तिया ही है जो लगभग सभी महल या मियूजियम में होता है ,इसमे ऐसा कुछ भी नहीं था जो शाहू जी महाराज के सामाजिक उत्तरदायित्व को दर्शाता हो . न कहीं स्कूल की बात न कहीं शुद्र { उस समय कि भाषा } या पिछडों के लिये किये गये उनके महान काम का विवरण .
हां ,यह जरूर मेरे लिये नई जानकारी थी कि शाहूजी महाराज के पूर्वज उदयपुर के राजपूत थे उनकी पूरी वंशावली लिखी मिली ,इसके अलावा कुछ भी नया जानने को नहीं मिला ,सही मे बहुत निराश होकर बाहर निकले .

अब जब यहाँ आये हैं तो जरूरी हैं कि शाहू जी महाराज के सामाजिक कार्य से अवगत हुआ जाये तो यह जानकारी प्राप्त करके यहां प्रस्तुत है .

bharatdiscovery.org/india }

 

छत्रपति साहू महाराज ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राजा होते हुए भी दलित और शोषित वर्ग के कष्ट को समझा और सदा उनसे निकटता बनाए रखी। उन्होंने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की थी। गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए। साहू महाराज के शासन के दौरान ‘बाल विवाह’ पर ईमानदारी से प्रतिबंधित लगाया गया। उन्होंने अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज़ उठाई थी। इन गतिविधियों के लिए महाराज साहू को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। साहू महाराज ज्योतिबा फुले से प्रभावित थे और लंबे समय तक ‘सत्य शोधक समाज’, फुले द्वारा गठित संस्था के संरक्षण भी रहे।

उन्होंने देखा कि जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा है। अतः उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए योजना बनाई और उस पर अमल आरंभ किया। छत्रपति साहू महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया। वे छत्रपति साहू महाराज को अपना शत्रु समझने लगे।

उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि- “आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति साहू महाराज ने इस सारे विरोध का डट कर सामना किया

साहू महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में स्नानकरने जाया करते थे। परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था। एक दिन बंबई से पधारे प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए थे। महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक को सुनकर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए। पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा की- “चूँकि महाराजा शूद्र हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते है।” ब्राह्मण पंडित की बातें साहू महाराज को अपमानजनक लगीं। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। महाराज साहू के सिपहसालारों ने एक प्रसिद्ध ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवीत संस्कार करने को राजी किया। यह सन 1901 की घटना है। जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए। उन्होंने नारायण भट्ट पर कई तरह की पाबंदी लगाने की धमकी दी। तब इस मामले पर साहू महाराज ने राज-पुरोहित से सलाह ली, किंतु राज-पुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी। इस पर साहू महाराज ने गुस्सा होकर राज-पुरोहित को बर्खास्त कर दिया.

आरक्षण की व्यवस्था

सन 1902 के मध्य में साहू महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे। उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी। उल्लेखनीय है कि सन 1894 में, जब साहू महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। साहू महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी। सन 1903 में साहू महाराज ने कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति जप्त करने का आदेश दिया। दरअसल, मठ को राज्य के ख़ज़ाने से भारी मदद दी जाती थी। कोल्हापुर के पूर्व महाराजा द्वारा अगस्त, 1863 में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी, परन्तु तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था। 23 फ़रवरी, 1903 को शंकराचार्य ने अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति की थी। यह नए शंकराचार्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के क़रीबी थे। 10 जुलाई, 1905 को इन्हीं शंकराचार्य ने घोषणा की कि- “चूँकि कोल्हापुर भोसले वंश की जागीर रही है, जो कि क्षत्रियघराना था। इसलिए राजगद्दी के उत्तराधिकारी छत्रपति साहू महाराज स्वाभविक रूप से क्षत्रिय हैं।”

स्कूलों व छात्रावासों की स्थापना

मंत्री ब्राह्मण हो और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्रिय हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शूद्र शख्स बैठा हो तो दिक्कत होती थी। छत्रपति साहू महाराज क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी जातियों में आते थे। कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नि:संदेह उनकी अभिनव पहल थी। छत्रपति साहू महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की। साहू महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये। जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु नि:संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं। उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। साहू महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर साहू महाराज ने सभी जाति और वर्गों के लिए काम किया। उन्होंने ‘प्रार्थना समाज’ के लिए भी काफ़ी काम किया था। ‘राजाराम कॉलेज’ का प्रबंधन उन्होंने ‘प्रार्थना समाज’ को दिया था।

छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा था कि- “वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।”साहू महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- “उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- “छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।”15 अप्रैल, 1920 को नासिक में ‘उदोजी विद्यार्थी’ छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए साहू महाराज ने कहा था कि- “जातिवाद का अंत ज़रूरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है। जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं। निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए।

छत्रपति साहू महाराज ने कोल्हापुर की नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। यह पहला मौका था की राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था। उन्होंने हमेशा ही सभी जाति वर्गों के लोगों को समानता की नज़र से देखा। साहू महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक् स्कूल और छात्रावासों को बंद करा करवा दिया और उन्हें सामान्य व उच्च जाति के छात्रों के साथ ही पढ़ने की सुविधा प्रदान की।

भीमराव अम्बेडकर के मददगार

ये छत्रपति साहू महाराज ही थे, जिन्होंने ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण में महत्त्वपूर्व भूमिका निभाने वाले भीमराव अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की। महाराजाधिराज को बालक भीमराव की तीक्ष्ण बुद्धि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता लगाकर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में उनसे मिलने गए, ताकि उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता हो तो दी जा सके। साहू महाराज ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के ‘मूकनायक’ समाचार पत्र के प्रकाशन में भी सहायता की। महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी.

**

डा. लाखन सिंह ,कोल्हापुर  6.02.2018

Related posts

हम सैनिकों के खिलाफ नहीं हैं, हम सैन्यवाद के खिलाफ हैं,-हिमांशु कुमार

cgbasketwp

हरिशंकर परिसाई की कहानी ” भेड़ और भेड़िया ” का पाठ : मुंशी प्रेमचन्द बाल पाठक संघ का चौथा आयोजन .

News Desk

|| शशि कपूर के जाने का मतलब || ✍? यूनुस खान : दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले * एक संस्मण शरद कोकास

News Desk