कला साहित्य एवं संस्कृति

कोलकत्ता : प्रेमिका के घर का पता ःः सतीश जायसवाल

29.03.2019

हिन्दी पाक्षिक ‘दुनिया इन दिनों’,नई दिल्ली के १६ से ३१ मार्च के- कोलकता पर एकाग्र – अंक में प्रकाशित।)

अपने पास अपना घर हो या ना हो, लेकिन एक प्रेमिका के घर का पता हो तो अपनी स्मृतियों को जगाये रखने के लिए पर्याप्त होता है। क्योंकि वह सुन्दर और कोमल होता है। और एक परिपक्व समय ऐसा भी होता है जब इन सुन्दर और कोमल स्मृतियों को साहित्य के परिसर में विचरण के लिए मुक्त छोड़ना चाहिए। यह परिसर प्रेम के सौन्दर्य और उसके कोमल तत्वों की सहेज को सुनिश्चित कर सकता है। और मुझे भरोसा हो रहा है कि यही वह परिपक्व समय है जब मैं कोलकता के प्रति अपना आभार व्यक्त कर दूँ। कोलकता में मुझे एक प्रेमिका के घर का पता मिला। और साहित्य के परिसर में वह जगह भी मिली जहा अपनी स्मृतियों को संवेदनशील साझेदारियों के लिए प्रसारित कर सकूं।

वह पता अब भी वही है लेकिन अब उस घर में कोई नहीं रहता। अब वहाँ सूनापन बसता है। और यह बात परेशान करती है कि जिन घरों की प्राण-प्रतिष्ठा किसी प्रेमिका से होती है वो घर बाद में सूने क्यों रह जाते हैं ?

कोलकता में ड़ॉ० सुकीर्ति गुप्ता रहती थीं। और उन्हें उस घर के साथ मेरी स्मृतियों के रिश्ते का पता था। किसी हद तक उन स्मृतियों की साक्षी भी रहीं। इसलिए अपनी यह परेशानी मैंने उनके सामने रखी थी। क्योंकि वह भी अपने भीतर कोई प्रेम सहेज रही थीं। कभी-कभार तानपुरा लेकर बैठतीं और उस प्रेम को किसी राग में बांधतीं। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर की इमिरती कलकत्ता आकर पूरी की पूरी बंगाल की हो गयी थी। इमिरती उनके घर का नाम था। लेकिन कलकत्ता ने ड़ॉ० सुकीर्ति गुप्ता को ही जाना। उनके एकाकीपन को नहीं। इस महानगर में वह अपने एकाकीपन के साथ जी रही थीं। और एक सूने घर की रखवाली कर रही थीं। पता नहीं किसके लिए। और एक दिन अपने इस एकाकीपन के साथ चली गयीं।
मेरी पहली कहानी ”ज्ञानोदय” में प्रकाशित हुयी थी। शायद जनवरी १९६९ या १९७० के अंक में। तब ”ज्ञानोदय” का प्रकाशन कलकत्ता से होता था। कलकत्ता अब कोलकता है। और ‘ज्ञानोदय’ भी अब दिल्ली से प्रकाशित होता है। लेकिन अब वह ‘नया ज्ञानोदय’ है। अपनी पहली कहानी के ‘ज्ञानोदय’ में प्रकाशित होने का, खुद को विश्वास कराने में मुझे समय लगा था।

वह सन सत्तर का दशक था। ज्ञानोदय,उस समय के हिन्दी साहित्य की एक प्रतिनिधि पत्रिका थी। कलकत्ता में, हिन्दी वालों के लिए जोड़ने और जुड़ने का एक ठिकाना भी। काफी बाद में, भारतीय भाषा परिषद् एक तरह से वह ठिकाना बना जब यहां से ”वागर्थ” का प्रकाशन शुरू हुआ। लेकिन पता नहीं क्यों इस ठिकाने के साथ वैसा लगाव नहीं बन पाया जैसा ”ज्ञानोदय” के साथ रहा।

सन सत्तर का दशक हिन्दी साहित्य में भारी हलचलों का समय रहा है। यह हलचल अन्य भारतीय भाषाओँ के साहित्य में भी वैसे ही दर्ज हो रही होगी जैसे हिन्दी साहित्य में दिख रही थी। क्योंकि यह किसी एक भारतीय भाषायी साहित्य का नहीं बल्कि पूरे भारतीय साहित्य का,उस समय का परिदृश्य था। लेकिन वह समूचा परिदृश्य मेरी समझ से बाहर था क्योंकि साहित्य के परिसर में मैं अभी एक नव-प्रवेशी था।
फिर भी वह एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समय था। भारतीय साहित्यिक दृष्टि खुली आंखों से दुनिया के साहित्य और साहित्य की दिशा को देख रही थी। अपने यहां की खिड़की और दरवाज़े खोल रही थी। उधर क्या हो रहा है ? यह देख रही थी। और हमारे यहाँ जो हो रहा है, सोचा और लिखा जा रहा है उससे दुनिया को परिचित करा रही थी। एक बराबरी की रिश्तेदारी के लिए रास्ते खुल रहे थे। मेरे लिए वह समय, उस समय की ये सारी हलचलें कुछ ऐसी ही रही होंगी जैसे किसी छिछले-उथले किनारे के बदले सीधे, बीच समुद्र में उतरना। कलकत्ता इन हलचलों के केन्द्र में था।

लघु पत्रिका,पोस्टकार्ड पत्रिका से लेकर पोस्टर तक, अ-कहानी से लेकर अ-कविता तक, भूखी पीढ़ी से लेकर श्मसानी पीढी तक और ऐसे ही कितने अजब-गजब आन्दोलनों का वह दौर रहा। हिप्पियों और बीटल्स का भारत की तरफ रुख करना भी इसी दौर की बात हुयी। उनका जीवन जीने का तरीका और उनका जीवन दर्शन भी हमारे यहां के लिए जिज्ञासाओं का ही था। इसलिए उनकी तरफ ध्यान भी गया। उनको जानने-समझने की कोशिश भी हुयी। इस कोशिश में कुछ शब्द हमारे प्रचलन में आये। लम्बे समय तक हिन्दी साहित्य में अपनी जगह बनाकर रहने के लिए आये। जैसे —

बोहेमियन,एब्सर्ड,फ्रस्ट्रेशन वगैरह-वगैरह। इन शब्दों के सम्बन्ध उन लोगों के रहने-सहने और उनके जीवन-दर्शन, दोनों के साथ थे। उन लोगों ने भी कलकत्ता को ही अपना प्रमुख केन्द्र बनाया था। इन सबके केन्द्र में एक नाम था। एलेन गिन्सबर्ग। गिन्सबर्ग का भारत आना, कलकत्ता के लिए एक घटना थी।

इस बात को हुए अब कोई आधी सदी होने को आयी फिर भी कलकत्ता का एक बौद्धिक-समाज गिन्सबर्ग के अपने यहां आने को जिस तरह याद करता, बताता है वह किसी हद तक एक बौद्धिक रुमानवाद की रचना ही होती है। वह आया था और सीधे नीमतल्ला के श्मसान में गया था। शायद वह भारतीय जीवन दर्शन को उसके मृत्यु-बोध में देखना और समझना चाहता था।

मेरे एक वरिष्ठ मित्र थे, ड़ॉ० राजा राम शुक्ल। हिन्दी के अच्छे विद्वान। कलकत्ता में इन हलचलों और आन्दोलनों के उस दौर में वहीं थे। बाद में वहाँ से बाहर आये। उस समय अपने उग्र तेवरों के साथ निकल रही एक हिन्दी पत्रिका ”युयुत्सा” के कुछ अंकों का उन्होंने सम्पादन भी किया था। वह बताया करते थे कि गिन्सबर्ग ने अपनी दो प्रसिद्द कविताओं — ‘हाउल’ और ‘अमेरिकाना’ का स-स्वर पाठ वहाँ, कॉलेज स्ट्रीट वाले इण्डियन कॉफी हॉउस में किया था। उस समय पूरा कॉफी हॉउस खचा-खच भरा हुआ था। और बाहर, सड़क पर भी सुनने वालों की भीड़ थी। कलकत्ता के बुद्धि-समाज के लिए कॉलेज स्ट्रीट वाला यह कॉफी हॉउस पहले भी मिलने-जुलने और बात-बहस का अड्डा रहा था। अभी भी है।

गिन्सबर्ग भारतीय जीवन दर्शन को उसकी परम्परा में और यहां के रीति-रिवाजों को उनके ठेठ देसीपने में देखना और समझना चाहता था। इसके लिए उसने बनारस-प्रवास किया था। उस विदेशी के, इस तरह देखने-समझने को उस समय का हिन्दी साहित्य अपने ठेठ देसी संस्कार और संरचना में अपने यहाँ दर्ज कर रहा। इलाहाबाद इस ठेठ देसी संस्कार का एक स्थापित गढ़ था। कथा,कहानी, नयी कहानी, माध्यम और ऐसी ही अन्य कई साहित्यिक पत्रिकाएं अपने इस ठेठ देसी संस्कार के साथ वहाँ से प्रकाशित हो रही थीं। और कोलकता-वाराणसी-इलाहाबाद को एक साथ जोड़कर एक त्रिभुज की रचना हो रही थी। लेकिन कलकत्ता से ‘ज्ञानोदय’ के स्थगन के साथ इन पत्रिकाओं का अवसान-काल ऐसे अकस्मात् और एक साथ आया कि कुछ समझ में ही नहीं आया। सब कुछ दिल्ली की तरफ का होकर रह गया। फिर भी कलकत्ता अपनी जगह बना रहा। और अपनी तरह बना रहा।

कलकत्ता का ‘पुस्तक-मेला’ कलकत्ता की अपनी एक पहिचान होती है। कलकत्ता पुस्तकों से प्रेम करता है। और प्रेम को पुस्तक की तरह जीता है। एक हिन्दी फिल्म ‘आनंद’ का नायक इस फिल्म के बाबू मोशाय से कहता है — ये साला, तुम्हारा ‘बंगाली प्रेम .. ‘
यह ‘बंगाली प्रेम’ कविता की हद तक कोमल और किताबी होता है। और कलकत्ता इस बंगाली प्रेम को जीना जानता है। एक और हिंदी फिल्म है –३६ चौरंगी लेन।’ कलकत्ता पर केन्द्रित। इसमें वह प्रेम है जिसे बंगाली प्रेम कह सकते हैं। प्रेम में डूबे हुए दो प्राणी हैं। उनके पास प्रेम है लेकिन घर नहीं है जहां प्रेम कर सकें। फिर भी वो अपने लिए एक जगह बना ही लेते हैं।

श्रीकांत वर्मा हिन्दी के एक बड़े कवि हुये। पता नहीं क्या बात हुयी, जो उन्होंने लिखा–अब तो कलकत्ता में अच्छी वेश्याएं भी नहीं मिलतीं।’

अगर उन्होंने वेश्याओं के बदले कलकत्ते में प्रेम ढूंढा होता, तो पूरा भरोसा है कि किसी उस घर का पता जरूर मिल जाता जो एक प्रेमिका का घर होता। कलकत्ता में प्रेमिका का घर हो सकता है। कलकत्ता प्रेम को जीता है।

***

सतीश जायसवाल 

वरिष्ठ पत्रकार और जानेमाने साहित्यकार 

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