जल जंगल ज़मीन नीतियां वंचित समूह

CBA -7 .अंतिम . कोयला खदानों के आबंटन का काला सच कोलगेट घोटाला , सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तथा केन्द्र सरकार की जन – विरोधी कोयला नीति.

सरकारी कंपनियों की मिलीभगत से कोयला खदानों को पूरा विकास एवं संचालन पिछले दरवाज़े से सरकार के करीबी कॉरपोरेट घरानों को सौंपने का तरीका .
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छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने गहन अध्यन करके ” कमर्शियल कोल माइनिंग और एमडी़ओ कार्पोरेट लूट का नया रास्ता ” नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की है.जिसमें कोयला खदानों के आवंटन की प्रक्रिया में हो रही लूट को सिस्टमेटिक तरीके से समझाया गया हैं .छत्तीसगढ़ के संदर्भ में.कोयला खदानों के आवंटन और लूट का विस्तार से लिखा गया हैं ,कि कैसे केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ठीक विपरीत नीतियां बनाकर देश के पूरे कोयले को अपने चहते कारपोरेट अदानी को सोंपने का षड्यंत्र रचा हैं. हमारी कोशिश है कि किश्तों में विषय बार सामग्री आप तक पहुचाई जावे ताकि फील्ड में काम कर रहे कार्यकर्ताओं को कोयला घोटाले और गैर संवैधानिक कार्यकलापों की जानकारी मिल सके. पिछले दिनों लगातार हम इस पुस्तक 6 अंक प्रकाशित कर रही है.यह अंतिम और सातवां अंक है .” कोयला खदानों के आवंटन का काला सच , कोलगेट घोटाला ,सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तथा मोदी सरकार की जन विरोधी कोयला नीति .

सीजीबास्केट की कोशिश रहेगी कि भविष्य में भी तथ्यपरक अध्ययन और रिपोर्ट आप तक पहुंचा सकें.इस श्रंखला के प्रकाशन के लिये हम छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला के आभारी हैं जिन्होंने यह अवसर हमें उपलब्ध कराया.

1993 में पारित कोयला खान ( राष्ट्रीयकरण ) संशोधन अधिनियम के बाद से ही खदानों का आबंटन कोयला उत्खनन उद्योग की सबसे महत्वपूर्ण नीति बन गई । देश में कोयला उत्पादन बढ़ाने और देश की विकास दर को बनाए रखने के लिए तीव्रता से बढ़ती कोयला माग के उद्देश्य से , सरकार ने इस नीति से निजी क्षेत्र की कंपनियों को कोयला उत्खनन क्षेत्र में प्रवेश दिया । वैसे तो इस अधिनियम में केवल पूर्व – निर्धारित अंत – उपयोग परियोजनाओं के लिए कैप्टिव । कोयला खदान आवंटित करने के ही प्रावधान थे , परन्तु इसी प्रावधान में निजी क्षेत्र की कंपनियो ने काफ़ी दिलचस्पी दिखाई , और क्यूँ ना हो , सरकार ने कोयला उत्खनन क्षेत्र के विकास के नाम पर सस्ते दामों पर ( बल्कि यू कहे तो लगभग मुफ्त में ) कोयला खदानों का आबंटन शुरू कर दिया । ऐसे में ना सिर्फ निजी क्षेत्र की औद्योगिक कंपनियों में बल्कि कई तरह के दलालो , जमाखोरों और मुनाफाखोरों में मानो एक होड़ सी लग गई । देखते ही देखते 15 वर्ष के दौरान ही 218 नई खदानों , जिनकी कुल क्षमता 550 मिलियन टन से भी अधिक थी , का आबंटन कर दिया गया ।

कोयला खदानों के आबंटन में होड़ का अंदाज़ा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि इन नई आबंटित खदानों की कुल क्षमता 1993 में परिचालित भारत की सारी खदानों को मिलाकर कुल क्षमता से दुगने से भी अधिक थी जबकि कोल इंडिया लिमिटेड की अपनी उत्खनन क्षमता पिछले 150 सालों के विकास के बाद चरम सीमा पर थी । हालाँकि इतने बड़े पैमाने पर खदानों के आबंटन के बावजूद इनमें से केवल 42 खदानें ही सितम्बर 2014 तक उत्खनन शुरु कर पाई जिनसे कल लगभग 40 – 50 मिलियन टन प्रतिवर्ष का ही उत्पादन हो रहा था । पूर्व उर्जा एवं वित्त सचिव तथा प्लानिंग कमीशन के पूर्व सलाहकार ई . ए . एस . सरमा के अनुसार खदानों के ना खुल पाने और उनके पूर्ण विकास में देरी का मुख्य कारण यह है कि बहुत सारी खदानें गैर जिम्मेदार और अविश्वसनीय लोगों को आवंटित हुई जिनके पास कोयला उत्खनन का ना तो सामर्थ्य था और ना ही खदानों के विकास में कोई रूचि थी ।

कई कंपनियों ने कोल ब्लॉक को इसलिए भी हासिल किया कि महत्वपूर्ण खनिज साधन को भविष्य के उपयोग के साथ जल , जंगल , जमीन पर कब्जा किया जा सकें ।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय :

कोयला खदानों के बेलगाम आबंटन में कई गड़बड़ियों देखी गई । मुख्य रूप से खदानों के आबंटन के लिए कोई मापदंड बनाए नहीं गए । ना ही आबंटी कंपनियों के चयन के तर्क के आधार को कभी कोयला मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमिटी के मिनट्स में लिखा गया । ऐसे में आबंटन प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े हुए और बड़े पैमाने पर घोटाले के आरोप लगे । 2012 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ( CAG ) ने इसकी विस्तृत जांच कर निष्कर्ष निकाला की पूरी आबंटन प्रक्रिया विवेकाधीन तथा गैर – पारदर्शी है । यह पूरा प्रकरण कोलगेट घोटाले के नाम से प्रसिद्ध हुआ जिसमें आरोप लगे की आबंटन के कारण देश को लगभग 1 लाख 86 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा ।

इस मुद्दे पर न्यायिक प्रक्रिया के समापन पश्चात भारत के उच्चतम न्यायलय ( सुप्रीम कोर्ट ) ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसमें सन् 1993 के बाद आवंटित 214 कोल लोकों के आबंटन को निरस्त कर दिया । अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने माना की आबंटन के लिए कोई निष्पक्ष और परिद प्रक्रिया नहीं अपनाई गयी जिसके परिणाम स्वरूप राष्ट्रीय संपदा का अनुचित वितरण हुआ । इस नतीजे में आबंटन में हुई तमाम प्रक्रियात्मक अनियमित्ताओं , संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन , और चंद कंपनियों को लाभ पहुचाने के लिए कंपनियों तथा सरकारी तंत्र की मिलीभगत का भी विशिष्ट उल्लेख किया गया । अपने फैसले में ।

उच्चतम न्यायालय ने निम्न टिप्पणियां की हैं :

> कोयला आबंटन की पूरी प्रक्रिया किसी भी निष्पक्ष मापदंड के अनुसार नहीं की गयी . आबंटन बिलकुल अवैध और मनमाने ढंग से किये गए ।

> इसके कारण सरकार द्वारा मुफ्त दी गयी कोयले की खदानों से निकले उत्पादन का पूरा लाभ आवंटित कंपनियों को मिला और जनता इस लाभ से वंचित रही ।

.* कानूनी व्यवस्था के अनुसार , किसी भी निजी उद्यम को किसी अन्य निजी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम ( जॉइंट वेंचर ) में प्रवेश करने की कोई अनुमति नहीं है । परंतु इस प्रावधान का कई मामलों में उल्लंघन किया गया जिससे निजी कंपनियों को पिछले दरवाजे से कोयले का अवैध लाभ हुआ ।

  • अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश इंडस्ट्रीज , जो कि चोटिया में कोयला खनन कर रहे हैं , के आबंटन पर भी सवाल उठाये और कहा की कि वह आबंटन के लिए संभवतः अयोग्य थी क्योंकि उन्होंने दिवालियेपन के लिए अर्जी दायर की थी ।

* सरकार ने निजी कंपनियों द्वारा कोयले के संभावित दुरूपयोग को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किए । कई मामलों में निजी कंपनियों ने अपने कोयले उपयोग हेतु उर्जा संयंत्रों में निवेश ही नहीं किया जबकि कई अन्य मामले ऐसे भी थे जहाँ निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन की आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में कोयला आवंटित किया गया । इस अवस्था में सभी खदानों के आबंटन के निरस्तीकरण के साथ साथ सभी तत्कालीन संचालित कोयला खदानों को 6 महीने के अन्दर खदान संचालन बंद करने के भी आदेश दिए और केन्द्रीय सरकार को इन 6 महीनों में अक्षय व्यवस्था खोजने का निर्देश दिया । इसके अतिरिक्त , सभी दोषी कंपनियों को अपने खनन कार्य की शुरुआत से अब तक निकाले गए कोयले पर प्रति टन 295 रूपये का जुर्माना देने का भी आदेश किया । यह जुर्माना जनता की अधिकृत संपत्ति पर इन कंपनियों के द्वारा अनुचित लाभ उठाये जाने की क्षतिपूर्ण करने हेतु किया गया । इस महत्वपूर्ण एवं सराहनीय निर्णय से आशा जगी की सरकार सभी गड़बड़ियों को ठीक करने और कोयला उत्खनन के जन – हित में प्रयोग के लिए एक विस्तृत नई कोयला नीति प्रस्तुत करेगी । हालांकि सुप्रीम कोर्ट का कोलगेट मामला केवल आबंटन प्रक्रिया में हुए घोटाले से उठे । सवालों तक ही सीमित था , यह एक अभूतपूर्व अवसर था की कोयला मंत्रालय अपनी आबंटन नीति में पर्यावरणीय एवं सामाजिक न्याय संबंधित सवालों पर भी नज़र डाले जिससे आबंटन प्रक्रिया जन – हित तथा देश के बहुमूल्य संसाधनों के संरक्षण के भी अनुकूल बनाई जा सके ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पूर्णतया पलट देने के लिए नई कोयला आबंटन नीति :

सुप्रीम कोर्ट का पूरे कोयला उत्खनन क्षेत्र की अनिमित्ताओं को खत्म करने के इस निर्णय ने सरकार को एक अभूतपूर्व अवसर दिया कि वह अपनी पुरानी नीतियों , प्रक्रियाओं एवं कॉर्पोरिट – केन्द्रित एजेंडे पर गंभीरता से पुनर्विचार करे । अपने निर्णय में तथा सम्पूर्ण कानूनी प्रक्रिया के दौरान अनेकों अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की निंदा करते हुए भरपूर प्रयास किया कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को समझे और ऐसी दीर्घ – दर्शी नीतियाँ बनाए जिनसे देश । के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का देश के विकास में तथा जनता के हितों में उपयोग किया जा सके । केन्द्र की मोदी सरकार ने अनुचित शीघ्रता दिखाते हुए , सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मात्र 20 दिन के अंतराल पर ही अध्यादेश के रास्ते नई आबंटन नीति लागू कर दी । इसके लिए [ पहले कोयला खान ( विशेष उपबंध ) अध्यादेश 2014 और फिर कोयला खान ( विशेष उपबंध ) अधिनियम 2015 पारित किए गए ।

इस जन विरोधी कोयला आबंटन नीति की प्रमुख कोशिश यही थी की सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पड़े प्रभाव को पूर्णतया उलट दिया जाए और पहले जैसी कॉर्पोरिट – प्रेमी नीति को बहाल किया जा सके । इस नीति में सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य विचारों की पूर्ण रूप से अवमानना कर मानो पूरे आदेश के मूल आधार को ही सिरे से पलट दिया । इससे सरकार ने ना केवल इस ऐतिहासिक अवसर को गंवा दिया है बल्कि जनता एवं देश के हितों के विरुद्ध काम करते हुए केवल कॉर्परिट क्षेत्र को ही लाभ पहुंचाया है ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के मुख्य बिंदुकोयला खान(विशेष उपबंध)अधिनियम के मुख्य प्रावधान
कोयला खदान के आवंटन की आवेदन प्रक्रिया की मूल जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।कोयला आबंटन की पूरी प्रक्रिया को केंद्रीकृत कर दिया गया है जिसमें राज्य सरकार या निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से विचार-विमर्श का कोई प्रावधान नही है।राज्य सरकारों की भूमिका महज रबर – स्टाम्प मात्र ही रह गयी है जोकि हमारे संविधान के संधीय ढाँचे पर कठोर आघात
निजी क्षेत्र में लाभ के उद्देश्य से किया गया कोयला खनन वर्जित है । कोयला खनन केवल पहले से निर्देशित अंत – उद्देश्य के लिए ही और केवल ज़रुरत की परिसीमा में रहकर ही किया जाना चाहिए । यह खनन कार्य केवल उन्ही कम्पनियों के द्वारा किया जाना चाहिए जिन्होंने पहले से ही अंत – उद्देश्य जैसे विद्युत् संयत्र , लौह – इस्पात , सीमेंट , इत्यादि के कारखाने खोल लिए हों निजी मुनाफे के लिए कोयला खनन को अनुमति दी । गयी है जिसमें अंत – उद्देश्य की या ज़रुरत की कोई भी सीमा निर्धारित नहीं की गयी है कई तरह से जमाखोरों , काला – धन विक्रेताओं , पुनर्विक्रेताओं को खुला निमंत्रण है । खनन कंपनियां अब अपने संकीर्ण मुनाफे के लिए ज़रुरत से कहीं अधिक खनन कर राष्ट्रीय संपत्ति का नाश कर सकती हैं
निजी कंपनियों के बीच तथा प्राइवेट कंपनियों का सरकारी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम गैर – कानूनी हैसभी संयुक्त उद्यम , जिनमें केंद्रीय एवं राज्य की सरकारी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम भी शामिल हैं , को कोयला खनन की अनुमति प्रदान कर दी गयी है । इससे शीघ्र ही देश के कोयले की चंद कम्पनियों के हाथों में केन्द्रित होने की संभावना उत्पन्न हो गयी है । इससे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां जैसे कोल इंडिया लिमिटेड की प्रतिस्पर्धिता को भी भारी ठेस पहुँचना निश्चित है
कोयला ब्लाकों के आबंटन के लिए परदर्शी एवं निष्पक्ष मापदण्ड ज़रूरी हैं , ताकि कोयला चुनिंदा कंपनियों के हाथों में वितरण रोका जा सके ।नीलामी की रकम को ही एक मात्र मापदंड बनाया गया । है और सभी अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे की माइनिंग में अनुभव , पर्यावरणिक तथा सामजिक व्यवहार , इत्यादि को दरकिनार कर दिया गया है । खदानों के आबंटन को 3 अलग – अलग हिस्सों में बांट दिया – उर्जा के लिए | रेगुलेटेड क्षेत्र , अन्य उद्योगों में कैप्टिव माइनिंग के लिए । अनरेगुलेटेड क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए बिना नीलामी का रास्ता । इन तीनों हिस्सों में आबंटन को बाँटने से निजी क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्धा कम होगी और खदानों से प्राप्त रॉयल्टी दर कम रहेगी । साथ ही खदानों के विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता नहीं है एवं सरकार – कंपनियों की मिली भगत से चुनिंदा खदानों को मनचाहे ढंग से बांटना संभव है
सभी दोषी कंपनियों को अब तक निकाले | गए सम्पूर्ण कोयले पर 295 रूपये प्रति टन | की दर से जुर्माना लगाते हुए – एक स्पष्ट निर्देश दिये गए कि कोयले पर जनता का ही अधिकार है और उसके खनन का पूरा लाभ जनता को ही मिलना चाहिए तथा खनन से निजी मुनाफा वर्जित है ।निजी मुनाफे के लिए कोयला खनन को अनुमति दे दी | गयी है जिससे बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधनों का ज़बरदस्त एवं शीघ्र विनाश निश्चित है ।

इस नीति को लागू करने में केन्द्र सरकार ने अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग कर संवैधानिक । कार्य – रचना की भी अवमानना की । पहले तो लगातार 3 बार अध्यादेश का उपयोग कर इस नई । आबंटन नीति पर व्यापक विचार – विमर्श और जन – संपर्क से बचने की कोशिश की , फिर जब अंततः इसको संसद में प्रस्तुत किया तो गैर – लोकतांत्रिक तरीके से इस नीति पर चर्चा को बहुत ही कम समय – सीमा में समाप्त करने पर विवश कर दिया । राज्य सभा में विपक्ष ने बड़ी मुश्किलों से इस महत्वपूर्ण नीति पर व्यापक बहस और चर्चा के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन पर सरकार को विवश किया लेकिन , इस समिति को मात्र 1 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देने के लिए कड़े निर्देश दिए गए जिसके कारण यह समिति सभी पक्षों से विचार – विमर्श करने में अक्षम थी । हालाँकि इसके बावजूद संसद में विपक्ष के कई नेताओं ने इस नीति का पुरज़ोर विरोध कर अपने समस्याओं को रखा परंतु सदन में बहुमत के बल पर सभी आपत्तियों को दरकिनार कर सरकार ने एकतरफ़ा निर्णय लेकर अधिनियम को पारित किया ।

नई कोयला आबंटन नीति के जन – विरोधी प्रावधान :

कोयला खान ( विशेष उपबंध ) अधिनियम 2015 में एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्णतया अमान्य करने का प्रयास किया है वहीं दूसरी ओर इसमें कई ऐसे नए प्रावधान दाल दिए हैं जो जन – हित के विरुद्ध हैं और जिनका पर्यावरण , प्राकृतिक स्थिरता स्थानीय आजीविका , इत्यादि कई मामलों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा ।

कोयला खान ( विशेष उपबंध ) अधिनियम के मुख्य जन – विरोधी प्रावधानसंभावित प्रभाव ।
कोयला खदान के आबंटन के पूर्व किसी | भी पर्यावरणीय , वन स्वीकृति या ग्राम सभा की अनुमतियों की कोई आवश्यकता नहीं है । साथ ही खदान संचालन से होने वाले मुनाफ़े का 10 प्रतिशत राशि आबंटन के समय ही आबंटी कंपनी सरकार को देगीं । ।इस प्रावधान के पालन से पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभाव के आंकलन की सभी नियमित प्रक्रियाओं का मज़ाक बनके रह जाएगा । यह पूरी प्रक्रिया इस धारणा पर आधारित है की सभी कोयला ब्लाकों को सभी पर्यावरणीय , वन तथा सामाजिक स्वीकृतियाँ स्वतः ही मिल जायेंगी । अन्यथा 10 प्रतिशत पूर्व भुगतान स्वयं एक दलाली रकम की तरह देखा जा सकता है जिससे सरकार कंपनी को स्वीकृतियाँ देने मजबूर हो जायेगी । अधिनियम में जिन 204 कोयला ब्लाकों की नीलामी का ज़िक्र है , उनमें अधिकाँश के पास पर्यावरणीय , वन परिवर्तन सम्बन्धी तथा अन्य स्वीकृतियां नहीं हैं । ।
पुरानी कम्पनी को मिली सभी स्वीकृतियां स्वतः ही नए आबंटी को स्थानांतरित कर दी जायेंगी ।इससे पुराने आबंटी को दी गई गयी स्वीकृतियाँ एवं विभिन्न प्रक्रियाओं में हुई अनियमित्ताओ को सुधारने का कोई अवसर नहीं मिल पायेगा । सभी अनुसूचित क्षेत्रों ( Scheduled Areas ) में यह प्रावधान पेसा क़ानून 1996 ( PESA Act 1996 ) का भी उल्लंघन है जिसमें किसी भी खनन कार्य से पूर्व ग्राम सभा की स्वीकृति लेना आवश्यक है ।
नीलाम किये गए कोल ब्लाकों के | सम्बन्ध में कोई भी कानूनी प्रक्रिया या | उपाय नए खरीददार , तथा खदान से सम्बंधित भूमि एवं खदान ढाँचे , पर | लागू नहीं होगी । ।खदान से सम्बंधित अनियमित्ताओं की भरपाई तथा नुक्सान के हर्जाना वसूलने की प्रक्रिया बहुत कठिन हो गई है जैसा की रायगढ़ में गारे पेल्मा क्षेत्र के प्रभावित ग्रमीण लगातार झेल रहे हैं । इन खदानों में से कई पर गंभीर अनियमित्ताओं जैसे , अपर्याप्त मुवावजा एवं पुनर्वास पैकेज गैरकानूनी खनन इत्यादि आरोप हैं । यह उन सभी खनन कंपनियों को भी बचाने का प्रयास हैं जहाँ पर्यावरणीय मानदंडों का कोई अनुपालन नहीं किया जा रहा है ।
खदानों के संबंध में कानूनी फैसलों ,ट्रिब्यूनल के आदेशों तथा किसी भी अधिकारी दुबारा दिए गए प्रतिकूल निर्देशों को रद्द कर दिया गया है ।विभिन्न न्यायालयों द्वारा दिए गए विभिन्न अनियमित्ताओं जैसे कि ।
भूमि अधिग्रहण , विस्थापन तथा पुनर्वास , कर्मचारियों के । अधिकारों , इत्यादि पर दिए गए सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया गया है ।
मौजूदा खदान में नीलामी से पूर्व हुई मजदूरी , बोनस , रॉयल्टी , पेंशन , | ग्रेच्युटी या किसी अन्य देय राशि के लिए सभी दावे पर प्रतिबन्ध लगा दिया | हैइससे मजदूरों या ट्रेड युनियनों के अपने अधिकारों की प्राप्ति तथा रक्षा के सभी समाधानों को समाप्त कर दिया गया है । यह मजदूरों के अधिकारों पर भी कुठाराघात है क्यूंकि वेतन विसंगति , स्थायीकरण सहित लम्बित सभी मामलों से कंपनियों को मुक्त कर दिया गया है ।
भूमि अधिग्रहण के लिए अत्यंत ही कठोर तथा पुराने कानून कोयला धारक क्षेत्रों ( अधिग्रहण एवं विकास अधिनियम 1957 ( Coal Bearing Areas ( Acquisition and Development Act , 1957 ) का इस्तेमाल किया जाएगा । ACTसंसद द्वारा पारित / भूमि अर्जन , पुनर्वास और पुर्नव्यस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 Right to Fair Compensation and transparency in Land Acquisition , Rehabilitation and Resettlement Act 2013 ) का एक भद्दा मज़ाक है जिससे निजी कंपनियां गरीब किसानों तथा आदिवासियों की ज़मीन को उनकी सहमती के बिना कौड़ी के भाव खरीद सकेंगे ।
किसी भी व्यक्ति पर खनन अधिग्रहण के कार्य में बाधा उत्पन्न करने के आरोप में 1 – 2 लाख रूपये प्रतिदिन के भारी जुर्मान तथा कारावास का भी प्रावधान हैलोगों के विचारों वा विरोधों को दबाने की कोशिश और इससे जनता तथा नागरिक समाज के खनन कार्यों से उत्पन्न वास्तविक शिकायतों को दबाने का प्रयास है .

इस अधिनियम में जनता की लम्बे समय की उस मांग को भी ठुकरा दिया है जिसमें निवेदन । किया गया था की किसी भी कोयला क्षेत्र को छोटे छोटे ब्लॉकों में बांटकर आबंटित करने से पहले पूरे क्षेत्र का सम्पूर्ण एवं समग्र अध्ययन किया जाना चाहिए जिससे उस क्षेत्र पर खनन का सम्पूर्ण पर्यावरणिक , भौगोलिक तथा सामाजिक प्रभाव को समझा जा सके । इसमें जलवायु सम्बंधित भारत के पर्यावरणीय दायित्वों या आदिवासी मामलों पर दी गई खाखा कमिटी की रिपोर्ट को भी दरकिनार कर दिया गया है । ।

केंद्र सरकार की कोयला आबंटन नीति का विश्लेषण |

नई कोयला आबंटन नीति में खदानों की नीलामी एकमात्र अच्छा प्रावधान है जिससे उत्खनन का फायदा निजी कंपनियों की जगह राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए मिल सकेगा । इसके अलावा यह नीति पुराने घोटाले की तर्ज पर चुनिंदा कंपनियों को आर्थिक लाभ देने के क्रम को ही अग्रसर करता है । सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पूर्णतया विपरीत , यह ९ स्वतन्त्र न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर आघात है । राज्य सरकारों के अधिकारों को अनदेखा कर यह नीति भारतीय संविधान के संघीय ढाँचे पर भी कुठाराघात है । यह पूर्णतया जन विराधा और राष्ट्र हित के विपरीत है और महज़ निहित निजी कंपनियों के हितों से प्रेरित प्रतीत होता है । हमन । आशा की थी कि सरकार इस अत्यंत ही गंभीर तथा महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी । और चंद कंपनियों के संकीर्ण हितों की रक्षा के लिए इतनी जल्दबाज़ी नहीं दिखायेगी । परन्तु केन्द्र सरकार ने स्पष्टरूप से इस नीति को चुनिंदा कंपनियों को लाभ देने के उद्देश्य से बनाया है । ना कि व्यापक जनहित के लिए ।

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