कला साहित्य एवं संस्कृति

केवल स्‍टेशन नहीं, जलेबी-समोसा सबके नाम बदल डालिए योगीजी!  :  पुरुषोत्तम अग्रवाल

23.10.2018

सिकुलर और इंटेलेक्चुअल टेररसिस्टों की चीत्कार-फूत्कार सुनकर आप कितने आनंदित हो रहे होंगे माननीय योगीजी, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है. अंतत: आपने इलाहाबाद को प्रयागराज कर ही दिया. अब फैजाबाद को श्री अयोध्या करने का प्रस्ताव भी आ ही गया है, तुरंत ही इसे स्वीकार कर लीजिए.

इतिहासकार जो चाहें कहते रहें, राजकोष पर व्यर्थ का व्यय-भार कितनी भी वृद्धि को प्राप्त होता रहे, आपको तो शुद्ध सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना के अकबर और अन्य ‘यवनों’ को ठिकाने लगाने का अभियान चलाना है, चलाए रहिए.

यह स्वाभाविक ही है कि आपकी विचारधारा भी अकबर से उतनी ही घृणा करे, जितनी कि पाकिस्तान का निर्माण करने वाली विचारधारा करती आई है. इसे कृपया बौद्धिक आतंकवाद न मानिएगा, मैं बस स्मरण दिलाना चाहता हूं कि पाकिस्तान के निर्माण के बाद शेख-उल-इस्लाम कहे गये मौलाना शब्बीर उस्मानी ही नहीं, उनके जैसे सभी लोग गांधी-नेहरू-पटेल आजाद की, कांग्रेस की साझी संस्कृति और समावेशी राष्ट्रवाद की धारणा से घृणा करते हुए जिन्नाह को उन मौलाना सरहिन्दी का आधुनिक रूप बताते थे, जिन्होंने अकबर के दीन-ए-इलाही के विरुद्ध जिहाद छेड़ा था.

अब गांधीजी के गुण गाना तो अंतर्राष्ट्रीय विवशता बन गई है, किंतु नेहरू-निन्दा के लिए तो किसी मर्यादा क्या, मानवता का विचार भी करना आवश्यक नहीं.

आपने इलाहाबाद का नामांतरण कर उसे प्रयागराज कर दिया, लोग चर्चा करते रहें इलावास की, बताते रहें कि अकबर ने किसी पुराने नगर का नाम परिवर्तित नहीं किया था. याद दिलाते रहें कि दीन-ए-इलाही के प्रवर्तन के कारण मौलाना लोग अकबर से कितने कुपित थे.

आपको क्या अंतर पड़ता है? आपके लिए इतिहास है क्या? वर्तमान की राजनीति के लिए अतीत का दुरुपयोग. संस्कृति है क्या? वास्तविक जीवन नहीं, अपितु आपकी आक्रामक कल्पनाएं… सीधी सी बात है- इतिहास वही जो आप बतलाएं, संस्कृति वही, जो आप चलवाएं…

किन्तु मान्यवर, भारतीय भाषाओं और साहित्य में जो संस्कृति वास्तव में प्रकट होती है, वह आपकी विचारधारा के दुर्भाग्य से वह कुछ और ही कथा कहती है. इस वास्तविक भारतीय संस्कृति को ध्वस्त करके ही आप लोग अपना तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद स्थापित कर सकते हैं. भारत की परंपरा पर गर्व करने वाले, अपने सभी देशवासियों से प्रेम करने वाले भारतीय के तौर पर मेरी कामना तो यही है कि यह विध्वंसयोजना असफल हो. किन्तु क्या कहा जा सकता है?

किन्तु पुन: स्मरण दिलाऊं, भारतीय संस्कृति आप लोगों के ‘बौद्धिक’ संस्कारों से बहुत अधिक विराट है. हमारी भाषाएं, हमारा साहित्य, हमारी जीवन-विधियां— समावेश और ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ (आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है यह वाक्यांश) पर आधारित हैं. इस तथ्य का आप जैसों का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ क्या करेगा? मुसलमानों को परकीय मानने वाला, अकबर जैसे दूरदर्शी, समावेशी और उदार शासक से घृणा करने वाला आपका ‘बौद्धिक’ मानस हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के अनेक कवियों, कलाकार का क्या करेगा?

इस विषय पर आप चाहें तो विवेकपूर्वक विचार करें, अर्थात जिस हिन्दू उदारता और सहिष्णुता के गीत गाते नहीं थकते, उसे जीवन-व्यवहार और राजनीति में सिद्ध करके दिखाएं, अन्यथा यह सोचें कि आपकी ‘बौद्धिकता’ की परिणतियां क्या हो सकती हैं.

कृपया ध्यान दें कि मैंने सावधान प्रयास किया है कि जिन्हें आप लोग ‘परकीय’ मानते हैं, ऐसे अरबी-फारसी-तुर्की मूल के शब्दों का प्रयोग न करूं. किन्तु आप बाबा तुलसीदास का क्या करेंगे? सबसे पहले तो बाबा शब्द ही ले लीजिए, यह तुर्की भाषा का शब्द है, अब क्या करें? तो चलिए तात, ‘गोस्वामी’ तुलसी की अकेली कवितावली का अकेला उत्तरकांड ही ले लें, और इस पंक्ति का पाठ करें, “जाहिर जहान में जमानो एक भांति भयो…”. है न सुंदर छटा अनुप्रास अलंकार की, समस्या बस यह कि अलंकार ‘परकीय’ शब्दों की सजावट से संभव हुआ है… जाहिर, जहान, जमाना… इसी कवित्त की अंतिम पंक्तियों पर भी दृष्टिपात करें, मान्यवर “रंक के निवाज रघुराज राजा राजनि के/ उमरि दराज महाराज तेरी चाहिए.”

बाबा (क्षमा करें, गोस्वामी) तुलसीदास तो कबीर नहीं थे, जायसी नहीं थे, वे तो वर्णाश्रम समर्थक और इसी कारण निर्गुणपंथियों के कठोर आलोचक थे, उच्च कुलोद्भव ब्राह्मण थे, किंतु अपनी जाति के बारे में काशी के ब्राह्मणों के तानों से तंग आकर वे उसी कवितावली में कहते हैं, “तुलसी सरनाम गुलाम है राम को”; और इसी सवैया में वह बात, “मांग कै खैबो, मसीत को सोइबो, लेवे को एक न देवे को दोऊ”.

कवितावली में ही नहीं, ‘मानस’ समेत अन्य रचनाओं में भी कितनी बार बाबा (फिर क्षमायाचना तुर्क शब्द के प्रयोग के लिए) तुलसीदास ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो आपके राष्ट्रवाद के अनुसार परकीय या विदेशी कहलाएंगे— आप तो निश्चय ही जानते होंगे.

साहेब, गुलाम, निवाज, ग़रीब, ग़रीबनेवाज, उम्र, जहान, हबूब जैसे शब्द उनके यहां बांरबार आते हैं. इलाहाबाद को प्रयागराज करने के बाद, मुरादाबाद को मन की बात नगर करने के बाद, आपके सुयोग्य प्रशासन का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए कि तुलसीदास की त्रुटियों का परिमार्जन किया जाए, गरीबनेवाज को दीनबंधु, साहेब को स्वामी, उम्र को वय आदि किया जाए.

और हां, ये जो कथाएं, लोकजीवन से लेकर इतिहास तक में मान्य रही हैं, अकबर के नवरत्नों में से एक रहीम और तुलसीदासजी के बीच संवाद की, रहीम द्वारा हिन्दी के विविध रूपों में काव्य-रचना की; रहीम की दानवीरता की (आपको निश्चय ही स्मरण होगा कि तुलसीदासजी के प्रश्न के उत्तर में ही रहीम ने कहा था, “देवनहार कोऊ और है, देत रहत दिन रैन/ लोग भरम हमपे करें तातें नीचे नैन”)

इन सब बातों को विलुप्त करने में लग जाइए, तभी आपकी कल्पना का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद स्थापित हो पाएगा. यह बात और है कि अपने मित्र रहीम को विस्मृत किये जाने पर गोस्वामी तुलसीदासजी प्रसन्न नहीं होंगे. ना हों, आपके राष्ट्रवाद में तुलसीदास हों, या कबीर सूरदास हों या जायसी मीरां हों या सहजो…किसी भी संवेदनशील रचनाकार का स्थान ही कितना है…

अंत में बस, एक बात और. अत्यंत लोकप्रिय व्यंजन हलवा, जलेबी और समोसा भी भारत-भूमि में तुर्कों के साथ ही आए थे. अब इन्हें परकीय और इनका सेवन करने वालों को देशद्रोही घोषित करने का समय आ गया है.

माननीय, जैसा राष्ट्रवाद आप लोग स्थापित करना चाहते हैं, भाषा, संस्कृति और लोक-जीवन में उसकी परिणतियां क्या होंगी, इसके कतिपय उदाहरण ही यहां दिये गए हैं. आशा तो नहीं, बस प्रभु से प्रार्थना है कि आप जैसे लोग किंचित विचार करें कि आप संस्कृति और परंपरा का क्या हाल कर रहे हैं, देश को किधर ले जा रहे हैं.

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