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दस्तावेज़ ःः किसान व ग्रामीण अवाम के नाम अखिल भारतीय किसान सभा की अपील.

11.11.2018 नई  दिल्ली 

किसान बहनों और भाईयों,

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक विशेष परिस्थिति में हो रहे हैं। यह परिस्थिति दो तरफा है। एक तरफ दिल्ली में मोदी की और तीन हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा की सरकार की बर्बर किसान विरोधी, जनविरोधी, राष्ट्रविरोधी नीतियां लागू की जा रही है। आत्म हत्याओं की झड़ी लगी हुई है, आत्महत्याओं से जो बच गए उन किसानों और उनके बेटों को ये कारपोरेट परस्त सरकारें गोली से भून रही है। दूसरी तरफ किसान है जो पूरे दमखम के साथ लड़ाई के मैदान में डटा है। पूरे राजस्थान को किसान सभा के लाल झंडे की अगुआई में अपनी दम पर जाम करके अनेक मांगे जीत लेता है तो कभी दसियों हजार की तादाद में नाशिक से पांव पांव मुंबई पहुंच जाता है और बेशुमार नागरिक समर्थन के साथ महाराष्ट्र सरकार को घुटने टेक देने के लिए मजबूर कर देता है। मजदूरों के साथ मिलकर 5 सितम्बर को लाखों की तादाद में दिल्ली में पहुंच जाता है और अपनी धमक से संसद को गुंजा देता है।

इसी एकता को और आगे बढाकर करीब 84 संगठन भूमि अधिकार आंदोलन के झंडे तले इक ठ्ठा होकर लड़ाई का एक नया अध्याय शुरू करते है तो मंदसौर के नृशंस गोली कांड के बाद 200 से किसान संगठन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति बनाते है। जिसने संसद के बाहर बैठकर किसान और देश के हितों वाले कानून बनाये और सांसदों को सौंपे-इन्हें पारित करने तथा किसानों व खेती के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए संसद का विरोध सत्र बुलाने की मांग उठाई। अब 29-30 नवंबर को यही संगठन दसों दिशाओं से दिल्ली में प्रवेश कर इन्हीं मांगों के आंदोलन को आगे बढ़ायेंगे।

देश के किसानों के ये दोनों आयाम इन 5 विधानसभा चुनावों को अतिरिक्त महत्वपूर्ण बना देते है। यह प्रश्न खड़ा करते है कि क्या इस बर्बर किसान विरोधी भाजपा को इन चुनावों में निर्णायक रुप से हराकर इन नीतियों को धूल नहीं चटाई जानी चाहिए?

कुछ सवाल और है जो इस जिम्मेदारी को और बढ़ा देते है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य का सवाल

देश के किसान आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने, तो विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारों को किसानों के कर्जों को माफ करने की घोषणा करने के लिए मजबूर कर दिया है, लेकिन इन घोषणाओं की आड़ में किसानों को धोखा देने वाली नीतियां जारी है। इन घोषणाओं के बावजूद वास्तविक धरातल पर किसानों को कोई राहत नहीं मिली है, इससे ही उनकी नीयत का भी पता चलता है। ठगी का आलम यह है कि स्वामीनाथन आयोग ने स्पष्ट रूप से फसलों की लागत मूल्य में जमीन का किराया और किसान परिवार द्वारा अपने खेत में किए जा रहे श्रम की मजदूरी को शामिल कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र सरकार इन लागतों को समर्थन मूल्य में जोडऩे से ही इंकार कर रही है।

A-2+FL के आधार पर सरकार के लागत आंकलन और वर्ष 2019-20 के लिए मोदी सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर C-2 फार्मूले के आधार पर आंकलित समर्थन मूल्य और इन दोनों समर्थन मूल्यों का अंतर तालिका में दिखाया गया है। यह अंतर दिखाता है कि किसानों को उनकी फसलों के लिए प्रति क्विंटल कितना घाटा हो रहा है। किसानों को यह घाटा इसलिए उठाना पड़ रहा है कि सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तविक लागत मूल्य से बहुत कम है और उन्हें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार जो लाभकारी समर्थन मूल्य मिलना चाहिए, उससे वंचित किया जा रहा है। विभिन्न फसलों पर उन्हें यह घाटा 12 प्रतिशत से लेकर 47 प्रतिशत तक हो रहा है। छत्तीसगढ़ में धान पैदा करने वाले किसान को प्रति क्विंटल 33.71 प्रतिशत, तो मध्यप्रदेश में गेहूं पैदा करने वाले किसान को 12.67 प्रतिशत, महाराष्ट्रके कपास पैदा करने वाले किसान को 47.22प्रतिशत और तेलंगाना के चना उत्पादक किसान को 25.93 प्रतिशत का घाटा प्रति क्विंटल उठाना पड़ रहा है। इस लगातार घाटे ने किसानों की कमर ही तोड़ दी है, इसलिए खेती-किसानी घाटे का सौदा हो गई है।

पिछले एक वर्ष में ही कृषि लागतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। खाद की कीमतों में 25 प्रतिशत, तो डीजल की कीमतों में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन समर्थन मूल्य घोषित करते समय इस महंगाई को ध्यान में नहीं रखा गया है। पंजाब सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य 2180 रूपये, आंध्र प्रदेश सरकार ने सरसों का समर्थन मूल्य 5583 रूपये तथा तेलंगाना सरकार ने चना के लिए समर्थन मूल्य 5398 रूपये प्रति क्विंटल देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अपने किसान विरोधी रूख के चलते केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की सिफारिशों को भी ठुकरा दिया।
फसल सरकार द्वारा लागत 2019-20 हेतु घोषित स्वामीनाथन आयोग के किसानों को हो
का आंकलन समर्थन मूल्य आधार पर समर्थन रहा घाटा .

(रु./क्विंटल) (रु./क्विंटल) मूल्य का आंकलन (रु./क्विंटल)
धान 1166 1750 2340 590
ज्वार हाइब्रिड 1619 2430 3275 845
कपास 3433 5150 6771 1621
रागी 1913 2897 3555 658
मक्का 1131 1700 2220 520
अरहर 3432 5675 7472 1798
मूंग 4650 6975 9242 2267
उडद 3438 5600 7484 1884
मूंगफली 3260 4890 6279 1389
सूरजमुखी बीज 3596 5388 6752 1364
सोयाबीन 2266 3399 4458 1059
तिल 4166 6249 9080 2831
काला तिल-
रामतिल 3918 5877 7703 1826
गेहूं 1840 2073 233
जौ 1440 1964 524
चना 4620 5818 1198
मसूर 4475 6150 1675
सरसों 4022 5092 1070

समर्थन मूल्य से भी वंचित किसान

लेकिन केवल समर्थन मूल्य का ही सवाल नहीं है। सवाल यह भी है कि किसानों की मेहनत को हड़पने वाला जो मूल्य केंद्र सरकार घोषित करती है, उस मूल्य पर खरीदने की तैयारी होती भी है कि नहीं। आंकड़े बताते हैं कि किसानों के कुल उत्पादन का केवल 30 प्रतिशत ही बिकता है और केवल 6 प्रतिशत किसान ही इस व्यवस्था का लाभ उठा पाते हैं. बाकी तो सोसाईटियों व मंडियों की सही व्यवस्था न होने के कारण बाजार में बिचौलियों के हाथों लुटने-पिटने को मजबूर हैं. उन्हें औने-पौने दामों पर, यहां तक कि घोषित समर्थन मूल्य से आधी कीमत पर ही, अनाज मगरमच्छों को अपना अनाज बेचना पड़ता है। समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के बजाये अब भाजपा सरकारें भावांतर योजना की घोषणा कर रही है, जो वास्तव में सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदी करने की जिम्मेदारी से हटने और किसानों को इस मूल्य से वंचित करने और बिचौलियों को मालामाल करने की ही योजना है।

नोटबंदी के बाद नगद मुद्रा-संकट के कारण भाव न मिलने से किसानों द्वारा आलू, प्याज, टमाटर व अन्य सब्जियों तथा दूध को सडक़ों पर फेंकने की तस्वीरें अभी तक आम जनता के जेहन में है। इस नोटबंदी ने लाखों किसानों को बर्बाद कर दिया। सब्जियां सडक़ों पर किसानों द्वारा फेंकने की घटनाएं हर बाजार में हमें देखने को मिलती है।
यही कारण है कि बेहतर वैकल्पिक रोजगार मिलने पर 50 प्रतिशत किसान आज खेती-किसानी छोडऩा चाहते हैं. जिन्होंने समर्थन मूल्य की मांग की, उन पर राज्यों की भाजपा सरकारों ने लाठियां-गोलियां ही बरसाई हैं। जून 2016 में मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में भाजपा सरकार ने 6 किसानों को गोलियों से भून दिया था। गोलीचालन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को बरी कर दिया गया है और वे छुट्टे घूम रहे हैं। इस सरकार के हाथ किसानों के खून से सने हुए हैं और उनकी शहादत हमसे यह आह्वान कर रही है कि इस किसान विरोधी सरकार को सत्ता से हटायें। यह हमारी अर्थव्यवस्था की दुखद तस्वीर ही है कि मुनाफाखोर कॉर्पोरेट हमारी जमीन का पानी निकालकर हमें 20 रूपये लीटर बेच रहा है, लेकिन किसान का एक किलो धान या गेहूं 20 रूपये में भी कोई खरीद नहीं रहा है।

कर्ज मुक्ति का सवाल

खेती-किसानी घाटे में हैं, तो किसानों को तो कर्ज में डूबना ही था। वे व्यावसायिक बैंकों, ग्रामीण बैंकों और सहकारी सोसाईटियों के बोझ तले डूबे ही हैं, महाजनों और सूदखोरों के कर्ज के बोझ के तले भी कराह रहे हैं। हमारे देश में 14 करोड़ किसान परिवार हैं। वर्ष 2016-17 की नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 50 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं, उन पर 12.60 लाख करोड़ का सरकारी कर्ज चढ़ा हुआ है। सरकार के ही वर्ष 2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार, इन किसान परिवारों की औसत सालाना आय 20 हजार रूपये से कम ही है और अपनी आजीविका के लिए उन्हें दिहाड़ी मजदूरी कमानी पड़ती है। देश में जीडीपी की औसत वृद्धि दर तो 7 प्रतिशत है, लेकिन कृषि आय में वृद्धि का औसत केवल 0.44 प्रतिशत ही है। अनिश्चितता से भरी खेती-किसानी-मजदूरी से बचत होती है केवल 4552 रूपये ही, और इस बचत से कर्ज चुकाया नहीं जा सकता। यह कर्ज पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। कर्ज वसूलने के लिए बैंकों और सूदखोरों द्वारा केवल उसके जमीन की ही कुर्की नहीं की जाती, उसे इतना जलील भी किया जाता है कि आत्महत्या के सिवा और कोई दूसरा रास्ता उसके पास नहीं बचता।

अखिल भारतीय किसान सभा किसानों की कर्ज माफी नहीं, बल्कि कर्ज मुक्ति चाहती है। वह किसानों पर लदे बैंकिंग कर्ज ही नहीं, बल्कि साहूकारी कर्ज से भी उनकी मुक्ति की बात करती है। उन पर यह कर्ज इसलिए लदा है कि पिछले तीन दशकों से, नव-उदारवादी व्यवस्था के तहत उन्हें सुनियोजित रूप से लाभकारी मूल्य से वंचित किया जा रहा है और कर्ज मुक्ति से उनके हुए शोषण और लूट की भरपाई नहीं की जा सकती।

लेकिन जब किसानों को कर्ज से मुक्त करने की बात की जाती है, तो पैसों का रोना रोया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले चार सालों में बजट में करों में छूट के जरिये इस देश के पूंजीपतियों को 25 लाख करोड़ रुपयों की छूट दी गई है। किसानों पर चढ़ा कर्जा इसका आधा ही है। ये धनकुबेर बैंकों से लिए गए ऋ ण को चुकाने से इंकार कर रहे है और दिसम्बर 2017 की स्थिति में सभी बैंकों का सम्मिलित एनपीए (फंसा हुआ कर्ज) 8.41 लाख करोड़ रुपयों का था, जिसका एक-चौथाई से ज्यादा 2.41 लाख करोड़ रूपये बट्टे-खाते (ऋ ण माफी) में डाल दिए गए थे। पूंजीपतियों के एनपीए की तुलना में किसानों का बैंकों पर एनपीए केवल 66176 करोड़ रूपये ही था। यह पूंजीपतियों के एनपीए का 13वां हिस्सा ही है। इसका यह भी अर्थ है कि बैंकों से लिए गए कर्जों को चुकाने के मामले में किसान बेहद ईमानदार हैं। लेकिन इस सरकार के पास उनकी इस ईमानदारी की कोई कद्र नहीं है।
इस देश में नव-उदारवादी नीतियों को 1991 से लागू किया जा रहा है। तब यह आश्वसन दिया गया था कि ये नीतियां किसानों सहित आम जनता के सभी तबकों के लिए खुशहाली लाएगी। आज हम देख रहे हैं कि इन नीतियों ने मेहनत करके कमाने-खाने वाले सभी लोगों को बर्बाद किया है। पिछले 15 सालों में इस देश में लगभग साढ़े तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की हैं। वर्ष 2013-14 की तुलना में मोदी राज में किसान आत्महत्याओं में डेढ़ गुना वृद्धि हुई है और पिछले साढ़े चार सालों में लगभग 30 हजार किसानों व खेत मजदूरों द्वारा आत्महत्या किए जाने का अनुमान है। ये आंकड़े बताते हैं कि आज देश में हर आधे घंटे में एक किसान या खेत मजदूर आत्महत्या कर रहा है. लेकिन सरकार केवल उन लोगों को ही किसान मानती हैं, जिनके नाम भू-स्वामी पट्टा है। उसके परिवार में शामिल खेती-किसानी करने वाले सदस्यों, बंटाई में खेती करने वाले भूमिहीन दलितों व खेत मजदूरों को, वनाधिकार से वंचित आदिवासियों, को तो यह सरकार किसान मानने से ही इंकार करती है। यदि लोगों को शामिल कर लिया जाएं, तो आत्महत्या करने वाले किसानों के आंकड़े दुगुने हो सकते हैं।

किसानों के नाम पर दी गई राहतें जुमले ही साबित हुए हैं, ये फिर चाहे शून्य ब्याज-दर पर ऋ ण देने की घोषणा हो या भावांतर योजना। इन योजनाओं का कोई लाभ गरीब किसानों, आदिवासियों और दलितों को नहीं मिला। लाभ मिला है तो केवल बड़े किसानों और बिचौलियों को ही।
बीमा योजना का हाल बेहाल हमारे देश के किसान हर साल सूखा, बाढ़, पाला और अन्य प्राकृतिक प्रकोप से जूझते हैं। उनकी फसल भी बर्बाद होती है, लेकिन उनको राहत पहुंचाने की सारी योजनायें केवल कागजों पर ही चल रही है। कथित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू होने के बाद भू-राजस्व संहिता व राजस्व पुस्तक परिपत्र के अंतर्गत उन्हें पहले मिलने वाली राहत सहायता/मुआवजा चुपचाप बंद कर दिया गया है। किसानों को फसल बीमा करने वाली उन निजी और कार्पोरेट कंपनियों के हवाले कर दिया गया है, जो किसानों को पूछे बगैर ही उनका व्यक्तिगत बीमा कर देती है, लेकिन फसल-नुकसान का आंकलन गांव को इकाई मानकर करती है। इस आंकलन में भी वह हेरा-फेरी करती है। नुकसानी का आंकलन किसी सरकारी या निष्पक्ष संस्था से करवाया जाना चाहिए, लेकिन इस जिम्मेदारी से भी यह सरकार हाथ झाड़ लेती है।

मध्यप्रदेश में इन कंपनियों ने 2100 करोड़ रुपयों की राशि तो प्रीमियम के रूप में वसूली, लेकिन किसानों को लौटाए केवल 70 करोड़ रूपये ही! इसी प्रकार, छत्तीसगढ़ में इन कंपनियों ने 9041 करोड रूपये वसूले और 2324 करोड़ रुपयों के दावे के एवज में बांटे केवल 1200 करोड़ रूपये ही!! ऐसे किसानों की संख्या हजारों में है, जिन्हें राहत के नाम पर केवल 5-10 रूपये का ही भुगतान किया गया है. इस प्रकार इन बीमा कंपनियों ने बिना कोई निवेश किए हजारों करोड़ रुपये मुनाफे के रूप में बटोरे हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने प्रधानमंत्री के ‘‘कृपापात्रों’’ की तिजोरियों का ही बीमा किया है।

भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की लूट

इस देश में भूमिहीनों, आदिवासियों और दलितों, गरीब किसानों को जमीन देने का काम केवल उन्हीं राज्यों में हुआ है, जहां वामपंथ का शासन रहा है. बाकी देश में तो भूमि सुधार कानून लागू ही नहीं किए गए। जमींदारों और भू-स्वामियों की जमीन को इस तरह हस्तांतरित किया गया कि उनके असल कब्जे आज भी बने हुए हैं। नतीजन देश में आज भी 95 प्रतिशत सीमांत, लघु व मध्यम किसानों के पास केवल 40 प्रतिशत कृषि भूमि का ही स्वामित्व है, जबकि 5 प्रतिशत बड़े किसानों के पास 60 प्रतिशत कृषि भूमि है। इन गरीबों के पास जो थोड़ी-सी जमीन है, उसे ही हड़पने और कार्पोरेटों के हवाले करने की नीतियां लागू की जा रही हैं।

किसानों के बड़े आंदोलनों और संसद में वामपंथी पार्टियों के दबाव में ही संप्रग सरकार ने किसान समुदाय के पक्ष में भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ सकारात्मक संशोधन किए थे। ये संशोधन इस तरह के थे कि जिन लोगों की जमीन कथित विकास कार्यों के लिए छीनी जा रही है, उनके पुनर्वास-पुर्नव्यवस्था-मुआवजा-नौकरी की व्यवस्था की जायेगी, लेकिन सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने बार-बार अध्यादेशों के जरिये इस कानून को बदलने की कोशिश की। अंतत: किसान समुदाय व संगठनों के देशव्यापी विरोध के बाद उसे यह कदम वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन भाजपा शासित राज्य सरकारों को उसने यह इशारा भी कर दिया कि अपने स्तर पर वह इन कानूनों में बदलाव कर लें, ताकि कार्पोरेटों को भूमि सौंपने के उसके इरादों में कोई बाधा न पहुंचे। इसके बाद सभी भाजपा सरकारों ने भूमि अधिग्रहण कानून के सकारात्मक पहलुओं को कमजोर और निष्प्रभावी बनाने के लिए काम किया है। उसने भू-राजस्व संहिता में ऐसे आदिवासी विरोधी संशोधन भी किए हैं, जिससे आदिवासियों की भूमि को गैर-आदिवासियों व कार्पोरेटों को हस्तांतरित किया जा सके। इस नीति के कारण छत्तीसगढ़ में लगभग एक लाख हेक्टेयर भूमि, तो मध्यप्रदेश में ढाई लाख हेक्टेयर भूमि इन कार्पोरेट कंपनियों को सौंपी गई है। इस जमीन से गरीब आदिवासियों और किसानों को ही विस्थापित किया गया है। इसी के साथ भाजपा नेताओं के संरक्षण में अवैध-खनन के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। पिछले चार सालों में 106 प्रतिशत की वृद्धि के साथ मध्यप्रदेश सबसे आगे है, तो अवैध-खनन के मामलों में गुजरात में भी 53 प्रतिशत और राजस्थान में 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। मध्यप्रदेश में तो जिन कर्मठ प्रशासनिक अधिकारियों ने खनन माफियाओं का विरोध करने और उन पर कार्यवाही करने की कोशिशें की, उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया और हत्यारे सरकारी संरक्षण में घूम रहे हैं।

आदिवासी निशाने पर

नव-उदारवादी नीतियों का ही नतीजा है कि जल-जंगल-जमीन-खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का समाज पर अधिकार खत्म हुआ है। पेसा कानून, वनाधिकार कानून और 5वीं अनुसूची के प्रावधान इन अधिकारों को स्थापित करते हैं, लेकिन इन्हें लागू करने से भाजपा सरकारें इंकार कर रही हैं और पूरे देश में आदिवासी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। वनाधिकार कानून कहता है कि सामुदायिक और व्यक्तिगत वनाधिकारों की स्थापना किए बिना वन भूमि से किसी को विस्थापित नहीं किया जा सकता। ‘पेसा कानून’ ग्राम सभा को सर्वोच्चता प्रदान करता है, जिसकी मंजूरी के बिना अनुसूचित क्षेत्र में किसी भी प्रकार के काम नहीं किए जा सकते। ये कानून आदिवासियों के साथ सदियों से जारी ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाए गए थे। यदि इन कानूनों को लागू किया जाता, तो स्व-शासन की प्रक्रिया में कमजोर तबकों की भागीदारी होती और ग्राम-समाज मजबूत ही होता।

लेकिन भाजपा सरकारों ने लाखों आदिवासियों के वन भूमि पर दावों को न केवल निरस्त किया है, बल्कि जिन गांवों और लोगों को सामुदायिक और व्यक्तिगत पट्टे दिए भी गए थे, खनन और विकास के नाम पर वे भी उनसे छीने जा रहे हैं। इसका विरोध होने पर नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों को कुचला जा रहा है. कॉर्पोरेटों के लिए जमीन हड़पने के लिए आदिवासी क्षेत्रों को पुलिस छावनी व सैनिक अड्डों में तब्दील कर दिया गया है और जो लोग उनके आदिवासियों और दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, उन्हें ‘‘माओवादी/नक्सली या देशद्रोही’’ करार देकर जेलों में डाल दिया जाता है।
वनों पर निर्भर आदिवसियों, दलितों व अन्य परंपरागत समुदायों की आजीविका पर दूसरा बड़ा हमला यह किया गया है कि वनोपजों के समर्थन मूल्य में 60 प्रतिशत तक की कमी कर दी गई है। (देखें तालिका)

 

वनोपज वर्तमान समर्थन मूल्य (रूपये/किलो)
हर्रा 8.00
साल बीज 12.00
इमली बीज सहित18.00
महुआ बीज 20.00
चिरौंजी गुठली 93.00
कुसुमी लाख 167.00

सब जानते हैं कि इससे दस गुनी कीमत पर ये वनोपज बाजार में बिकते हैं। इन वनोपजों की खरीदी भी बिचौलिए और व्यापारी ही करते है, जो ये छोटी-सी कीमत भी उन्हें नहीं देते। सरकर की भूमिका मूकदर्शक की ही होती है।
मनरेगा

आज किसान परिवारों की औसत आय का 35 प्रतिशत हिस्सा ही खेती-किसानी से आ रहा है, जबकि इतनी ही आय वे दिहाड़ी मजदूरी से प्राप्त करते हैं। ऐसे में मनरेगा आजीविका का एक बड़ा सहारा है। सर्वे बताते है कि इस योजना के कारण ग्रामीणों की खेतों में मजदूरी के लिए सौदेबाजी की ताकत बढ़ी है और गैर-सरकारी कामों में उनकी मजदूरी में 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है। इस तरह यह योजना आम ग्रामीणों के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाने में मददगार साबित हुई है।

लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार इस योजना को जारी रखने के पक्ष में नहीं है और उसने योजनाबद्ध ढंग से मनरेगा को कमजोर और निष्प्रभावी बनाने का काम किया है। उसने मनरेगा के लिए केन्द्रीय आवंटन में भारी कटौती की है। उसने मनरेगा मजदूरी को कृषि के लिए घोषित न्यूनतम मजदूरी से जोडऩे से इंकार कर दिया है। पहले मनरेगा के लिए आवंटित कुल राशि का 60 प्रतिशत मजदूरी में खर्च करना अनिवार्य था, अब इसे घटाकर 52 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे मनरेगा में श्रम-दिवसों की उपलब्धता में भारी कमी आई है। मनरेगा के कार्यों पर ग्राम-समाज की निगरानी रखने के लिए सामाजिक अंकेक्षण की जो व्यवस्था थी, उसे भी ध्वस्त कर दिया गया है। पूरे देश में 10 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवार इस योजना में काम करने के लिए पंजीकृत हैं, लेकिन धन के अभाव के कारण 57 प्रतिशत मजदूरों का भुगतान अटका हुआ है।

मनरेगा को कमजोर करना यह बताता है कि भाजपा सरकारें गांवों के अंदर प्रभावशाली सामंती-भूस्वामी ताकतों के हितों के साथ हैं और ऐसा कोई भी कदम, जो इन ताकतों को कमजोर करें, उसे स्वीकार नहीं है. ये सामंती-भूस्वामी ताकतें ही भाजपा का ‘‘वर्गीय आधार’’ हैं।

आवारा पशु – भीषण तबाही

सरकार की नव-उदारवादी नीतियाँ, खेती-किसानी की बढ़ती लागत, खेती में विदेशी पूंजी निवेश और संविदा (ठेका) कृषि – खेती – किसानी को बर्बाद करने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन भाजपा सरकार इतने-भर से ही संतुष्ट नहीं है। उसने पशुधन की बिक्री पर भी कानूनी रोक लगाने की कोशिश की है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में उसे मात खानी पड़ी। लेकिन अघोषित प्रतिबंध आज भी जारी है और गौ-रक्षा के नाम पर बजरंग दल, विहिप सहित संघी गिरोह के दर्जनों संगठन उत्पात मचा रहे हैं। वे सभी गौ-पालकों और किसानों पर सांप्रदायिक भीड़ जुटाकर हमले कर रहे हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और उत्तरप्रदेश में पिछले वर्ष ही गौ-गुंडों ने हिंसा की 37 वारदातें की हैं और इनमें 11 लोग मारे गए हैं और कई घायल भी हुए हैं। इन हताहतों में हिन्दू धर्म के लोग भी शामिल है. गाय को सांप्रदायिक तत्वों ने राजनीति करने का सबसे बड़ा हथियार बना रखा है।

पशुधन की बिक्री पर लगे अघोषित प्रतिबंध के कारण आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या आज गांवों की सबसे बड़ी समस्या है. हजारों हेक्टेयर की फसलें नष्ट हो रही है और दुर्घटनाओं के कारण कई लोग मारे जा चुके हैं। पूरे देश में किसान इन प्रतिबंधों के खिलाफ जुझारू आंदोलन कर रहे हैं। परंतु भाजपा सरकार इस प्रतिबंध को हटाने, आवारा पशुओं का प्रबंधन करने तथा सांप्रदायिक-उत्पाती गौ-गुंडों को नियंत्रित करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही हैं।

खाद्यान्न-सुरक्षा व आत्मनिर्भरता खतरे में

नव-उदारवादी नीतियों की उपज किसान व कृषि विरोधी नीतियों का कुल नतीजा यह है कि देश की खाद्यान्न-सुरक्षा व आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ गई है। खाद्यान्न-उपलब्धता घट रही है और इसी के साथ गरीब जनता का पोषण-आहार भी। कुल 25 करोड़ भारतीयों को 2100 कैलोरी से कम पोषण-आहार मिलता है।

देश में खाद्यान्न के विपुल भण्डार हैं, लेकिन आम जनता की क्रय-शक्ति इतनी नहीं हैं कि स्वस्थ रहने के लिए बाजार से खरीदकर खा सके। भुखमरी के मामले में दुनिया के 119 देशों में भारत 103 वें स्थान पर है। आधे से ज्यादा आबादी और ग्रामीण आबादी के अधिकांश बच्चे और महिलायें कुपोषण का शिकार हैं। अन्न उपजाने वाला किसान परिवार ही भूखे सोने को मजबूर है, यही इस देश के कथित विकास की सच्चाई है।

स्वाधीनता के बाद कुपोषण और भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों के फसल की खरीदी, सरकारी गोदामों में उनका उचित भंडारण और सस्ते राशन दुकानों के जरिये सभी लोगों को इसके वितरण की नीति अपनाई गई यही. विश्व व्यापार संगठन के दबाव में भारतीय कृषि और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, ताकि हमारे घरेलू बाजार में विदेशी खाद्यान्न की खपत बड़ी और वे अकूत मुनाफा कमाए। इसके लिए उन्होंने किसानों को खेती में और आम जनता को सस्ते अनाज के लिए मिलने वाली सब्सिडी को खत्म किया है।

आपको याद होगा कि अटलबिहारी बाजपेयी के राज में 1500 से ज्यादा खाने-पीने की चीजों के आयात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध को खत्म कर दिया गया था। इसके बाद अकाल के दौर में भी राशन दुकानों से सस्ते में गेहूं-चावल वितरित करने की मांग को ठुकरा दिया गया था, जबकि इसी अनाज को सस्ते में 3 रूपये किलो की दर पर अमेरिका को वहां के सुअरों को खिलाने, शराब और पेट्रोल जैसा ईंधन के लिए बेच दिया गया था। इसी तरह मोदी-राज भी किसानों को लाभकारी समर्थन मूल्य देने से इंकार कर रही है और खाद्यान्न के पर्याप्त भंडार होने के बावजूद उसने महंगी दरों पर पाकिस्तान से 60,000 टन शक्कर और मोजाम्बिक से 1.5 लाख टन दाल का आयात किया है।

सांप्रदायिकता ही सहारा

आम जनता के असंतोष को दबाने के लिए भाजपा और संघी गिरोह सांप्रदायिक मुद्दों को उछालने में लगा है. इसके लिए भाजपा-आरएसएस राम मंदिर, गौ-रक्षा, लव जेहाद, पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, देशभक्ति जैसे मुद्दे उठा रही हैं, ताकि एक हिन्दू-सांप्रदायिक मानसिकता का निर्माण करके चुनावी लाभ बटोरा जा सके। संघी गिरोह के संगठनों ने देश में बड़े पैमाने पर चर्चों पर धर्मांतरण के नाम पर हमले किए गए हैं। उन्होंने दलितों और अल्पसंख्यकों की रोजी-रोटी को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया है।
‘‘इंडिया स्पेंड’’ की रिपोर्ट के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा के मामले में पूरी दुनिया में भारत का चौथा स्थान है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-17 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 2930 घटनाएं हुई हैं, जिसमें 8000 से ज्यादा लोग हताहत हुए हैं। वर्ष 2017 में ही देश में सांप्रदायिक हिंसा की 822 घटनाएं हुई हैं, जिसमें 2495 लोग हताहत हुए है।

इसी प्रकार, पिछले एक दशक में दलित उत्पीडऩ की घटनाओं में 746 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2013 में दलित-उत्पीडऩ के 29408 मामले दर्ज किए गए थे, उनकी संख्या बढक़र वर्ष 2016 में मोदी-राज में 40801 हो गई है। हिंदुत्व की राजनीति दलितों को मनुवादी व्यवस्था में बांधना चाहती है। दलितों के लिए बनाए गए आरक्षण के वे प्रावधान भी आज मनुवादी ताकतों के निशाने पर है, जिसका लाभ उठाने का अवसर दलितों को कभी दिया ही नहीं गया है। इसलिए आज पूरे देश में दलित उन पर हो रहे जातिवादी उत्पीडऩ के खिलाफ, सामाजिक न्याय के लिए और अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं।

स्पष्ट हैं कि भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियां देश को बर्बाद करने वाली तो हैं ही, उसकी आस्था धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समानता और भाईचारा जैसे संवैधानिक मूल्यों में भी नहीं है। इसलिए वह हमारे देश के संविधान, जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए भी खतरा है।

इस पृष्ठभूमि में ये चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं। देश को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होने से रोकना आज सबसे बढ़ी राजनैतिक चुनौती है। सभी किसान संगठनों को मिलकर इस चुनौती को स्वीकार करना होगा और पूरे देश के किसान समुदाय को इस सरकार की जनविरोधी, किसानविरोधी, सांप्रदायिक-फासीवादी नीतियों के खिलाफ एकजुट रखना होगा। सवाल देश बचाने का है और देश तभी बचेगा, जब आम जनता निर्णायक रूप से देश को बर्बाद करने वाली भाजपा को ठुकरायें।
अखिल भारतीय किसान सभा चाहती है कि पांच राज्यों के लिए हो रहे विधानसभा चुनावों में कृषि और किसानों की मांगें प्रमुख मुद्दे बने। किसान सभा चाहती है कि इन किसान समुदाय की इन मांगों-मुद्दों पर बात करने के लिए संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया जाएं। किसान सभा यह चाहती है कि संसद में कानून बनाकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए और उनकी फसल को खरीदने के लिए आने वाली हर सरकार को कानूनन बाध्य किया जाएं। किसान सभा चाहती है कि सभी गरीब किसानों पर चढ़े बैंकिंग और साहूकारी कर्जे को माफ करने के लिए संसद में कानून बनाया जाए। किसान सभा चाहती है कि आदिवासियों और दलितों के हितों के लिए जो संवैधानिक प्रावधान हैं, उसे पूरी भावना के साथ लागू किया जाएं।
यहां यह ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि यह सब उन विनाशकारी नीतियों का नतीजा है जिन्हें इस देश के शासक वर्गों की पार्टियों वो भाजपा हो या कांग्रेस मिलकर लागू किया है। जरूरत इन नीतियों को खिलाफ जनादेश सुनाने की है।

यह किसानों की बेहतरी और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए जरुरी हो जाता है कि इन पांचों राज्यों के किसान भाजपा को निर्णायक रुप से ठुकराये, उसे पराजित करें। जहां जहां किसान हितैषी संघर्ष शील शक्तियां, खासतौर से वामपंथ का विकल्प मौजूद है, वहां उसे जितायें। इन दोनों कामों को पूरा करने के साथ ही एक ऐसा माहौल बनायें जो आने वाली सरकारों को भी मौजूदा विनाशकारी नीतियों को उलटकर नई वैकल्पिक नीतियां लाने के लिए विवश कर दे।

अखिल भारतीय किसान सभा, 36 कैलिंग लेन, नई दिल्ली 110001 की ओर से महासचिव हन्नान मौल्ला द्वारा प्रकाशित एवं ……………………….द्वारा मुद्रित।

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