राजनीति

कांग्रेस से निकले दलों का कांग्रेस में विलय हो और ममता एकीकृत कांग्रेस का नेतृत्व करे.

उपेन्द्र प्रसाद : देशबंधु में प्रकाशित लेख .

उपलब्धि और सफलता में क्या संबंध है, यह अलग विचार का विषय है। लेकिन पिछले चुनाव के बारे में हम यह कह सकते हैं कि मोदी की सरकार एक बार फिर इसलिए बनी, क्योंकि उसके विरोधी कमजोर थे और वे नरेन्द्र मोदी के सामने टिकने की सामर्थ्य नहीं रखते थे। भाजपा के सामने सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी और उसके नेता थे राहुल गांधी। राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी की बराबरी नहीं कर सकते थे। उनके पास न तो मोदी वाला राजनैतिक अनुभव है और न ही भाषा है और न विचार।

मोदी विरोधी कहते हैं कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में कुछ नहीं किया और सारे वादे अधूरे रहे। अब यदि बिना कुछ किए उनकी अपनी पार्टी को 303 सीटें मिल गईं और राजग को 350 से भी ज्यादा सीटें मिल गईं, तो अनुमान लगाइए कि यदि उन्होंने अपने वायदे को पूरा कर दिया होता, तो फिर उनको तो अकेले 404 सीटें मिल जातीं और राजग को 500 सीटें मिल जातीं। तब तो भारत की लोकसभा लगभग विपक्ष मुक्त हो जाती। मोदी को एक और कार्यकाल मिल गया है। इस कार्यकाल में यदि उन्होंने अपने वायदे पूरे कर दिए, तो फिर 2024 में कहीं उन्हें कुछ वैसा ही बहुमत नहीं मिल जाए, जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है।

उपलब्धि और सफलता में क्या संबंध है, यह अलग विचार का विषय है। लेकिन पिछले चुनाव के बारे में हम यह कह सकते हैं कि मोदी की सरकार एक बार फिर इसलिए बनी, क्योंकि उसके विरोधी कमजोर थे और वे नरेन्द्र मोदी के सामने टिकने की सामर्थ्य नहीं रखते थे। भाजपा के सामने सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी और उसके नेता थे राहुल गांधी। राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी की बराबरी नहीं कर सकते थे। उनके पास न तो मोदी वाला राजनैतिक अनुभव है और न ही भाषा है और न विचार। राजनीति की उनकी समझ भी बहुत कमजोर है, इसलिए वे मन्दिर मन्दिर चक्कर लगाते रहे और लोगों को अपनी जनेऊ दिखाते रहे। उन्हें पता होना चाहिए था कि मन्दिर भाजपा का अखाड़ा है और अपने अखाड़े में पहलवान ज्यादा मजबूत रहता है। राहुल को यह भी पता नहीं था कि जनेऊ विरोधी अनेक आंदोलन भारत में हो चुके हैं और आम हिन्दू की पहचान जनेऊ से नहीं होती, बल्कि जनेऊ एक आम हिन्दू के लिए उपहास का विषय बन चुका है।

राहुल के अलावा मुलायम, अखिलेश, लालू, तेजस्वी और मायावती भाजपा को हिन्दू हृदय प्रदेश में चुनौती दे रहे थे। इन दलित और पिछड़े नेताओं की खुद दलितों और पिछड़ों के बीच जातिवादी, वंशवादी और महाभ्रष्ट नेताओं की छवि बन चुकी है और उनकी अपनी-अपनी जातियों के बाहर कहीं भी अपील नहीं है। सच कहा जाए, तो हिन्दी हार्टलैंड के दलित और पिछड़े दलविहीन और नेताविहीन हो चुके हैं। इसका फायदा नरेन्द्र मोदी को मिल रहा है। इसके कारण उनके ऊपर भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति भी असर कर रही है, क्योंकि लालू, मुलायम और माया जैसे नेता अपनी अपनी जातियों के साथ मुसमलमानों का समीकरण बैठाते रहते हैं। इसलिए उनका विरोध मुस्लिम विरोध में बदल जाता है। एक तरफ मोदी का अति पिछड़ी जाति का होना और दूसरी तरफ हिन्दुत्ववाद भाजपा को अजेय बना देता है।

और भाजपा के रथ को रोकने वाला कोई नहीं। यदि यही स्थिति अगले 5 साल तक बनी रही, तो फिर मोदी के नेतृत्व में भाजपा को और भी भारी बहुमत से सत्ता में आने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन यह स्थिति बदल सकती है, यदि कांग्रेस का एकीकरण हो जाए और इसका नेतृत्व सोनिया परिवार के बाहर का व्यक्ति करे। अभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलावा तीन और उल्लेखनीय कांग्रेस पार्टियां हैं। एक पार्टी को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस है। दूसरी पार्टी जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस है और तीसरी पार्टी शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी है।

इन तीनों पार्टियों का विलय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में असंभव नहीं है। ये तीनों इसी कांग्रेस से निकली हैं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस में अपनी उपेक्षा के कारण खुद की तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। शरद पवार ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने के विरोध में कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना ली थी। जगनमोहन रेड्डी अपने पिता की मौत के बाद मुख्यमंत्री के रूप में उनकी जगह लेना चाहते थे। उनके पास विधायकों का समर्थन भी था और जनसमर्थन भी था, लेकिन सोनिया और राहुल ने उनको मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। इसलिए वे कांग्रेस से बाहर हो गए और अपनी एक अलग कांग्रेस बना ली।

राहुल गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास इस समय लोकसभा में 52 सांसद हैं। यह कुल सांसदों का 10 फीसदी भी नहीं है। लेकिन यदि तीन अन्य कांग्रेस पार्टियों का इसमें विलय हो जाय, तो यह संख्या 102 हो जाती है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के 23 सांसद, वाईएसआर के 22 सांसद और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पास 5 सांसद हैं। इनके विलय के साथ विपक्ष मजबूत हो जाएगा और लोकसभा को विपक्ष का नेता भी मिल जाएगा, क्योंकि नियम के अनुसार विपक्ष का मान्यता प्राप्त नेता वही हो सकता है, जिसके पास कम से कम 55 लोकसभा सदस्य हो। यह तो हुई संसद के निचली सदन की बात।

देश में भी भाजपा राष्ट्रव्यापी विकल्प इससे मिल जाएगी। इस समय तो भाजपा के सामने कांग्रेस भी एक क्षेत्रीय पार्टी बन गई है। इसकी दो राज्य सरकारें कभी भी गिर सकती हैं और कर्नाटक में इसके सहयोग से चलने वाली कुमारस्वामी की सरकार भी गिर सकती है। फिर कांग्रेस के पास छत्तीसगढ़ और पंजाब की सरकार ही रह जाएगी। लेकिन वह विलय हो जाता है, तो पश्चिम बंगाल में उसकी एक और सरकार हो जाएगी। महाराष्ट्र में भी एकीकृत कांग्रेस सरकार बना सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश और बिहार में दिखाई पड़ेगा, जहां समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के फिर से उभरने की संभावना समाप्त हो चुकी है। इन राज्यों में इन पार्टियों के जनाधार एक मजबूत कांग्रेस में वापस आ सकते हैं।

लेकिन यह महाविलय तभी सार्थक होगा, जब सोनिया परिवार इससे बाहर ही रहे। इसका नेतृत्व अनुभवी नेता के पास हो। शरद पवार अनुभवी नेता हैं, लेकिन अधिक उम्र के कारण वे मोदी की बराबरी शायद नहीं कर सके। जगनमोहन रेड्डी पहली बार मुख्यमंत्री बन रहे हैं, इसलिए वे अपने प्रदेश से बाहर नहीं निकलना चाहेंगे। वैसी स्थिति में ममता बनर्जी ही एक ऐसी नेता हैं, जो एकीकृत कांग्रेस का नेतृत्व कर मोदी को चुनौती दे सकती हैं और भारतीय जनता पार्टी के रथ को रोक सकती हैं।

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