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कांकेर : कुपोषण के शिकार आदिवासी : मैदान से अंकुर तिवारी की सघन रिपोर्ट.

 

4.04.2018

कांकेर छतीसगढ 

कांकेर जिला कुपोषण का गढ़ बनता जा रहा है। तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी दावों की हकीकत कागजों में दम तोड़ दे रही है। जिले के ग्रामीण अंचलों में ग्रामीण कुपोषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। जिले के कई इलाकों में ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य योजनाओं और मितानीन का दूर-दूर तक अता-पता नहीं है। अब जैसे कोटकोड़ो को हीं लें। अंतागढ़ विकासखंड के आलानार ग्राम पंचायत के आश्रित कोटकोड़ो गांव के रूमजीत कोर्राम गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है। गांव में लगभग  25 परिवार रहते है। इनसे बात करने पर पता लगता है कि ये लोग शासन की योजनाओं से अनजान है। सरकार भले ही इस इलाके के विकास के लिए करोड़ों रूपये भेजती हो मगर ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। 

इस गांव में रहने वाली चार साल की बच्ची दिनेश्वरी कोर्राम का पेट फूल गया है और उसके हाथ पांव दूबले पतले है। देखकर समझ में आता है कि दिनेश्वरी गंभीर रूप से कुपोषण की चपेट में है तथा उसे जल्द ही मदद की जरूरत है। दिनेश्वरी की तरह ही गांव के दिनेश कोर्राम, बिरेंद्र कोर्राम और महेश कोर्राम की हालत भी ऐसे ही है, जिन्हें इलाज की जरूरत है। गांव के दूसरे बच्चों की हालत भी कुछ ठीक नहीं है। इस गांव के बच्चों और महिलाओं में कुपोषण को जानने-समझने के लिए किसी सरकारी आंकड़े की जरूरत नहीं है। 

हालांकि सरकार ने इनके लिए बुनियादी सुविधाओं का प्रवाधन किया है। लेकिन रूमजीत और उसके जैसे कई ग्रामीणों से बात करके पता चलता है कि ये लोग सरकारी योजनाओं से अनजान है। 

रूमजीत कहते है कि बीते दो साल से उसके बच्चे कुपोषण के शिकार है, उन्होंने कहा कि सरकार हमारा ठीक से पालन-पोषण करें, और बेहतर इलाज की व्यवस्था करायें। 

आदिवासी इलाकों में कुपोषण को बढ़ाने व इसे कायम रखने वाले कारणों को खत्म करने या कम करने के उपायों पर जोर नहीं दिया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा कुपोषण मिटाने के लिए पोषण पुनर्वास योजना सहित तमाम प्रयास करने के दावे किये जा रहें है। बावजूद इसके कुपोषण को रोकने जिला प्रशासन नाकाम साबित होता दिख रहा है। बच्चों और महिलाओं में कुपोषण एक संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन कुपोषण से जंग लड़ने के सरकारी प्रयास कागजों पर कितने भी शानदार दिखते हो मगर जमीन पर हकीकत कुछ और है।

*ग्रामीणो के लिए पीने का साफ पानी नहीं*

गांव में पेयजल के लिए चार सरकारी हैंडपंप लगाया गया है। जिसमें से तीन हैंडपंप खराब है, और एक हैंडपंप गांव से दूर होने के कारण ग्रामीण को झरिया का पानी पीना पड़ रहा है। 

बस्तर के आदिवासियों को जीवन यापन के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में पानी की किल्लत और रोजगार के अभाव में गांववालों को सब्जी भाजी नसीब नहीं हो रहा है। कोटकोड़ो गांव में लोग एक सूखे हुए गड्ढे में मछली पकड़ रहें थे। और उसी मछली से एक वक्त की सब्जी का जुगड़ा से भोजन किया गया

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अंकुर तिवारी ,फ़्री लांसर 

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