आदिवासी कला साहित्य एवं संस्कृति विज्ञान

कहानी दादा जोकाल की : राजीव रंजन प्रसाद

बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ (भाग – 236)
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बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक  राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

( दैनिक सांध्य छतीसगढ )

दादा जोकाल Dada Jokal बस्तर के लिये काम करने वाले प्रतिबद्ध किन्तु खामोश सिपाही हैं। उनकी संघर्ष भरी कहानी में अनन्त उपलब्धियाँ हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि सिकंदर खान ही दादा जोकाल हैं जो राष्ट्रीय ग्रामीण शिक्षा मिशन में सहायक परियोजना समन्वयक के रूप में दंतेवाड़ा में कार्यरत हैं।

वे बस्तर के एकमात्र ऐसे साहित्यकार है जिसकी दक्षता सात भाषा-बोलियों में है। आर्य भाषा परिवार एवं द्रविड भाषा परिवार के बीच उनका समान वरदहस्त है। दादा जोकाल का शाब्दिक अर्थ है ‘साथी भाई’ जिसे वे केवल अपने नाम ही नहीं अपितु काम से भी चरितार्थ कर रहे हैं। उन्हें हल्बी, गोण्डी, दोरली, तेलुगू, दक्किनी, उर्दू तथा हिन्दी में समान दक्षता प्राप्त है। भाषाई ज्ञान में इतना वैविध्य होने का प्रमुख कारण उनका दक्षिण बस्तर में व्यतीत हुआ सम्पूर्ण जीवन है।

 

दादा जोकाल का जन्म दिनांक 2/10/1954 को कोण्टा (सुकमा जिला) में हुआ था, प्राथमिक शिक्षा उस जगरगुण्डा नगर में हुई जो आज नक्सली तथा सलवाजुडुम की विभीषिका में पिस कर तबाह हो गया है, भोपालपट्टनम बीजापुर में उनके जीवन का बड़ा हिस्सा व्यतीत हुआ है और वर्तमान में दंतेवाड़ा कर्मस्थली है। जगरगुण्डा नगर की प्राचीनता को भौगोलिक दृष्टि से देखा जाये तो यह ऐसा मध्यमार्ग था जो एक ओर सड़क द्वारा दोरनापाल-कोण्टा से जुडता था, दूसरी ओर बीजापुर से जुडता था और तीसरी सड़क अरनपुर-दंतेवाड़ा होते हुए जगदलपुर से जुड जाती थी। तीनों ही बस्तर के सांस्कृतिक व भाषाई विविध छोर हैं अत: यह प्रमुख कारण था कि दादा जोकाल जगरगुण्डा में रहते हुए अपने विद्यार्थी जीवन में ही आदिवासी सहपाठियों के साथ खेलते-बढते हल्बी, गोंडी, दोरली और तेलुगु भाषाओं को बोलना, पढना और लिखना सीख गये थे।

 

दादा जोकाल साहित्यकार हैं तथा सभी ज्ञात सात भाषाओं में उन्होंने कहानी, कविता, गज़ल, नाटक, आलेख, बाल-साहित्य आदि की रचना की है। दादी से सुनी हुई एक लोरी ने उन्हें कविता और लेखन की दिशा प्रदान की थी, बालवय में उठायी गयी कलम अब तक अनवरत चल रही है, सात भाषाओं में सैंकड़ों रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों आदि के माध्यम से निरंतर सामने आ रही हैं। दादा जोकाल ने अनेक पुस्तकों का लोक भाषा में अनुवाद किया है। उन्होंने आकाशवाणी तथा दूरदर्शन में अनेक अवसरों पर अपनी रचनाओं का वाचन किया, साथ ही, अनेक राष्ट्रीय मंचों पर वे बस्तर के प्रतिनिधि के रूप में वक्ता रहे हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय तथा राजकीय पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए हैं। यह सभी उपलब्धियाँ अपनी जगह हैं लेकिन दादा जोकाल को आदिवासी शिक्षा के क्षेत्र में किये गये उनके महत्वपूर्ण कार्य के लिये कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। यह प्रश्न बार बार उठता रहा है कि आदिवासी विद्यार्थियों को उनकी भाषा-बोली में ही प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध होना चाहिये। बातें होती रहीं लेकिन ठोस परिणाम तब सामने आये जब प्राथमिक कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों को दादा जोकाल के अनन्य श्रम ने गोण्डी और हल्बी में उपलब्ध करा दिया।

 

दादा जोकाल की कुछ पुस्तकें नितांत महत्वपूर्ण हैं जिनमे से एक गोण्डी में ‘मावा किताब’ के रूप में सामने आयी है। यह पुस्तक प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थियों को गोण्डी से हिंदी और अंग्रेजी सिखाने में सरल व सुबोध है। उदाहरण के लिये पुस्तक में जहाँ अंग्रेजी वर्णमाला के ‘सी फॉर कैट’ का अर्थ बिल्ली की तस्वीर के साथ सामने रखा गया है वहीं गोण्डी शब्दार्थ ‘वेरकाड़’ को भी स्थान दिया गया है। पुस्तक में रैपिडैक्स की शैली में नैतिक शिक्षा के पाठ हैं जैसे ‘दांत साफ करें’ को अंग्रेजी में ‘ब्रश योवर टीथ’ लिखा है साथ ही गोण्डी वाक्यार्थ ‘नियव पलकिन ब्रश कीम’ को स्थान दे कर पाठ्य पुस्तक की पठनीयता और सार्थकता दोनो ही बढा दी गयी है। बच्चों की मानसिकता को तथा लोकजीवन को दादा जोकाल ने इतनी बारीकी से समझा है कि चित्रों के साथ वे अत्यधिक संप्रेषणीय हो जाते हैं, उदाहरण के लिये कुकुरमुत्ते (फुटू) के चित्र के साथ वाचन सिखाने के लिये लिखा गया है ‘फुटू ला, बांट कर खा’ साथ ही गोण्डी में ‘कूक तरा तूसी तीन’। दादा जोकाल की सहभागिता से प्रकाशित एक अन्य पुस्तक गुरुमित्र का उल्लेख भी आवश्यक है जो हिन्दी भाषी शिक्षकों को गोण्डी तथा हल्बी सिखाने में सहायक है। यह पुस्तक आम तौर पर कक्षा में बोले जाने वाले वाक्य, खानपान की बातें, रहन सहन की बातें, शरीर के अंग, रिश्ते-नाते, वृक्ष-फलों के नाम आदि को हिन्दी, गोण्डी और हल्बी में सरल विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करती है। दादा जोकाल हिंदी-अंग्रेजी-गोंडी-हल्बी डिक्शनरी के निर्माण के लिये भी कार्य कर रहे हैं।

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(छत्तीसगढ www.dailychhatisgarh.com में आज प्रकाशित)
Kewal Krishna Rudranarayan Panigrahi Harihar Vaishnav Dada Jokal

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