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कश्मीर फ़तहका विजय ध्वज स्त्री देह में गाड़ने को आतुर’ राष्ट्रवादी’ : बादल सरोज

अनिल करमेले के पोस्टर से आभार सहित

कश्मीर और उसके बहाने देश के लोकतंत्र, संघीय ढांचे और संविधान के साथ किये गए निर्लज्ज मखौल के साथ जो उन्माद बरपाया गया है वह बाकी अनेक दुश्चिंताओं, ताजे और आगामी भविष्य को प्रभावित करने वाले विकारों को स्थायी करने के साथ साथ खोखले राष्ट्रवाद की घोर असामाजिक आपराधिकता को भी उजागर करता है । यह उस मनोविकार की संक्रामकता को, एक बार फिर, अपने वीभत्सतम रूप में सामने लाता है, जिसे सायास और योजनाबध्द तरीके से इस राष्ट्रवादी गिरोह की ‘प्रयोगशालाओं’ में तैयार किया गया, अर्धसत्य, पूर्ण असत्य, नफ़रत और अज्ञान के तड़के से सांघातिक बनाया गया है । शुरू में जो थोड़ी सी झीनी चादर की आड़ थी अब उसे भी भी उतार कर बिना किसी लाज शरम के पूरी दीदादिलेरी के साथ खुले आम वे असभ्यता की इस बीमारी को महामारी बनाने में जुटे हैं ।


● अपने ही देश के अविभाज्य अंग, एक राज्य – जम्मू कश्मीर – को टुकड़े टुकड़े करके, प्रदेश के रूप में उसके अस्तित्व को पूरी तरह खत्म करके किसी दुश्मन देश से युध्द जीत लेने जैसा उन्माद वे ही पैदा कर सकते हैं जिनका उस देश को देश और एक बनाने में कोई योगदान नही रहा हो । जो भारत की विविधता के उसकी एकता कायम रखने में दिए गए महती योगदान को न जानते हो, न मानते हों । जिनका इस मुल्क के संविधान के साथ रिश्ता उसके अस्वीकार और तिरस्कार का हो । यह गम्भीर सवाल हैं और सिर्फ राजनीतिक प्रश्न नहीं हैं, यह तात्कालिक राजनीति, खासतौर से दलीय राजनीति से आगे का मुद्दा है ; राष्ट्रीय एकता और संविधान के राज के अस्तित्व से ताल्लुक रखता है। भारत की धारणा का नकार करता है । यहां संदर्भ सोशल मीडिया में वायरल हुई उन मंशाओं का है जो फटाफट मैदान में कूद पड़ी हैं । इसी के साथ, इसी बीच, इस उन्माद के जश्न में मुखरता से अभिव्यक्त की गई ये अनेक ‘इच्छायें – कामनायें – लालसायें’ विषाक्तता के जैसे आयाम प्रस्तुत करती हैं उन्हें भक्त-गणों का उत्साह भर मानकर अनदेखा नही किया जा सकता ।


● इनमे सबसे अधिक जुगुप्सा जगाने वाली भक्तों की वह ‘किलकारी’ है जिस की सड़ांध ने सोशल मीडिया को गटर बनाकर रख दिया । धारा 370 के हटाये जाने की खबर फ़्लैश होते ही भक्त-व्हाट्सएपियों और फेसबुकियों ने इस आभासीय मंच को कश्मीर की लड़कियों के स्वाभाविक सौंदर्य के ज़ूम कैंमरों और उनसे शादी रचाने से लेकर अनेक लिजलिजी कामकुंठित कामनाओं के गरल की बाढ़ में डुबो दिया । सांस्कृतिक संगठन की असली संस्कृति उनमे डूबती उतराती रही । खुले आम लिखा पढ़ी में अपनी तस्वीरों के साथ पब्लिक पोस्ट पर इससे आगे की भी घिनौनी कामुक कामनाओं की गोलाबारी करने वाली यह भीड़ में नौसिखिए युवा नही हैं , ये भाजपा – आर एस एस की कुख्यात आई टी सेल के “राष्ट्र समर्पित” यौद्धा हैं । पुरातन की अंधेरी ताकतों द्वारा कुत्सा के भारी निवेश और मेहनत से खड़े की गई व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के दीक्षित बटुक हैं ।


● इतिहास की युध्द गाथाओं में किसी क्रूर राजा की जीत के बाद उनके सैनिको द्वारा विजित देश की जनता की संपत्ति के लूटने के साथ लड़कियों महिलाओ पर टूट पड़ने के अध्याय दर अध्याय हैं । कश्मीर पर मोदी-02 के फैसले को उनके भक्त-गिरोह ने ठीक ऐसी ही “जीत” की तरह लिया है । इतिहास में इन्होंने यही भर पढ़ा और सिर्फ इतना भर ही सीखा हो यह उतने भर तक सीमित मसला नही है । यह एक खास तरह के भविष्य की ओर जाने वाले वर्तमान को ढालने की सुविचारित कोशिश है ।


● व्यवहार में हर कट्टरता और धर्मांधता का विजय ध्वज स्त्री की देह में ही गाड़ा जाता है । मगर हिन्दुत्व – जिसका हिन्दू जन के जीवन और परम्पराओं के साथ दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है – सिर्फ व्यवहार में ही इसमें पारंगत नहीं है, विचार में भी इसके प्रति पूरी तरह प्रतिबध्द है । इनके नेताओं द्वारा महिलाओं को लेकर समय समय पर व्यक्त किये जाने वाले उदगार इसी विचार को लोगों की चेतना में बिठाने के लिए किए जा रहे प्रचार का हिस्सा होते हैं । इनके आदिगुरु और ‘हिंदुत्व’ शब्द के जनक सावरकर बलात्कार को एक हथियार-औजार के रूप में इस्तेमाल करने की हिदायत दे गए हैं तो इसके आधिकारिक गुरु एम एस गोलवलकर पूर्वजों की उस महान परम्परा की याद दिलाते हुए उसकी ताईद कर गए हैं जिसके अनुसार ” किसी भी परिवार में पहली संतान नम्बूदिरी (या चितपावन) ब्राह्मण से पैदा होनी चाहिए” । ताकि पिछली कुछ हजार वर्षोँ में आई अशुद्धि से का नस्ल शुद्दीकरण किया जा सके । (अहमदाबाद विश्वविद्यालय में दिए उनके इस संबोधन को संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने प्रमुखता से प्रकाशित भी किया था ।) । यही बातें इनके मौजूदा नेताओं के मुखारबिंद से समय समय पर झरती रहती है । कहने की जरूरत नही कि इस मामले में उनके निशाने पर सिर्फ दलित या अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाएं भर नही होतीं, छोटी बड़ी उम्र की सभी महिलाएं होती हैं । उनके आंखों में कामुकता, दिल मे वासना, दिमाग मे मनु होते हैं ।


● जो फर्जी राष्ट्रवादी आज कश्मीर फतह के जश्न का आगाज़ कश्मीरी स्त्रियों को ‘फतह’ करने के साथ करना चाहते हैं, वे वहीं तक नही रुकने वाले । बर्बरता सिर्फ बर्बरता होती हैं, वे न सीमाएं जानती हैं, न अपने पराये में फर्क जानती हैं । कठुआ की मासूम बच्ची आसिफा के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर देने वालों के समर्थन में रैलियां करने में इन्हें शर्म नही आती । बलात्कारी आसाराम बापू की पैरवी और गुरमीत राम रहीम के पैरोल पर विचार करने में इन्हें हिचक नही हिती । कुलदीप सेंगर को सच्चा राष्ट्रवादी करार देने में इन्हें कोई उज्र नही होता । जिंदगी और मौत से जूझ रही उन्नाव की बलात्कार पीड़िता को दिल्ली के एम्स में लाने में इसे 15 दिन से ज्यादा लग जाते हैं ।


● आसमान की तरफ मुंह उठाकर “कश्मीर फ़तह” के शृगाल-नाद में कश्मीरी औरतों और अवाम पर कब्जे करने का एलान कर रहे भेड़िये भारत और उसके समाज मे जो भी सकारात्मक है उसका भोग लगाने के लिए आतुर हैं । मनुष्यता और उसके अर्जित मूल्यों को निर्वंश कर देने पर आमादा है । इसके खिलाफ अभी, फर्जी राष्ट्रवाद की इस प्रायोजित घनगरज के बीचोंबीच ही आवाज उठानी होगी और कहना होगा कि कश्मीर हमारा है, कश्मीरी अवाम हमारा है, उसकी मुश्किलें भी हमारी हैं और उस पर किये जाने वाला हमला भी हम सब पर : हम भारत के लोग वी द पीपुल ऑफ इंडिया दैट इज भारत पर है । …. और जैसा कि ताज भोपाली कह गए हैं ; “ये सब की बात है, दो चार दस की बात नही ।”


● उन्माद के तेज अंधड़ के बीच उसकी सर्वग्रासी विनाशकारी व्यापकता के बारे में सबको बताना भी उतना ही कारगर होता है जितना उसे रोकने के लिए उसके खिलाफ जनभागीदारी वाली लामबंदियो की उतनी ही या उससे ताकतवर लहर खड़ी करना । जो सबसे मुश्किल समय होते हैं वे ही अनगिनत संभावनाओं से भरे सबसे अनुकूल समय भी होते हैं ।

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बादल सरोज ,जानेमाने लेखक और मार्क्सवादी चिंतक हैं

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