कला साहित्य एवं संस्कृति

कविता: ‘गढ़ना चाहती हूं रीति-रिवाजों से अलग प्रेम की नई परिभाषा’ / सांत्वना श्रीकांत की दो कविताएं

 

* सांत्वना श्रीकांत की दो कविताएं

जनसत्ता ऑन लाइन से

27.01.2018

**
मैं तुमको यह यकीन
नहीं दिलाना चाहती
कि–
हीर जैसी मोहब्बत है मेरी।
न ही लेना चाहती हूं
कोई वादा तुमसे
कि-
तुम मेरे रांझना बन जाओ।
जीवन की लकीरें दिखती हैं
तुम्हारी हथेलियों पर,
शब्दों से उलझना चाहती हूं,
व्यक्त करना चाहती हूं,
वह सब,
जो तुम्हारी अंगुलियों के स्पर्श
से महसूस होता है मुझे।
स्वर्ग तो नहीं सोचा मैंने,
लेकिन क्षितिज के
बारे में सोच कर,
वहीं कहीं तुम्हें
देख लेती हूं मैं।
वक्त नहीं होता तुम्हारे पास
मुझे अपने में समेटने का,
समझाना चाहती हूं तुमको,
कैसे सिमटती हूं मैं
शर्माई-सकुचाई,
अपने ही खयालों में।
हमेशा किसी अनंत ख्वाबों का
बनना चाहती थी हिस्सा
और अचानक मिल गए तुम,
बिल्कुल वैसा ही जैसा मेरे
खयालों का पुरुष था।
तुम्हारे होठ जब स्पर्श कर रहे होते हैं,
मेरे कानों और गर्दन के बीच,
ऐसा महसूस करती हूं
कि
तुम्हारी गंभीरता ढल गई है।
मुझे कुछ तो कहोगे,
धीरे से नाम लोगे मेरा
और खो जाओगे, गहरा मुझमें,
समाहित हो जाओगे तुम
हमेशा के लिए।
गढ़ना चाहती हूं मैं
प्रेम की नई परिभाषा।
रीति-रिवाजों से अलग
‘मैं’ का वजूद कायम रख
गुमना चाहती हूं तुममें।
सोचती हूं तुम्हें गर्व हो
अपनी तन्हाइयों पर
क्योंकि
उनका आखिरी पड़ाव मैं हूं।

2  बुध्द बन जाना

कुछ अल्ड़ह सा, ऊंघता
हिलोरे लेता हुआ
तुम्हारे ख्वाबों का उन्माद
बड़ा जिद्दी है।
बन जाना चाहता है
तुम्हारे रूह का लिबास।
कमरे में छोड़ी तुम्हारी
अशेष खामोशी
ढूंढ़ रही है कोना,
खुद को स्थापित करने का।
हाथ पकड़ कर
मेरी चुप्पी का,
ले जाना चाहती है
कहीं दूर बहुत दूर..
लांघ कर देहरी
उस मैदान तक।
तब-
गरम सांसों की छुअन,
होठों की चुभन
समाधि तक चलेगी साथ,
वहीं घटित होगा प्रेम।
उकेर देना चाहते हो न!
मेरे शरीर के
हर हिस्से पर अपना नाम,
वहां पर बीज बो दूंगी मैं,
जब आखिरी बार मिलोगे
तब वह बन चुका होगा
बोधिवृक्ष
और-
तुम उसकी छांव में
बैठ कर बुद्ध बन जाना।

***

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