कला साहित्य एवं संस्कृति महिला सम्बन्धी मुद्दे

कविता . आस्था को जनतंत्र में बदल दो . हेमलता महीश्वर .

आस्था को जनतंत्र में बदल दो –

तीजन बाई
किसके गीत गाती हो तुम?
तुम्हारी व्यथा तुम्हारे गीतों में क्यों नहीं है?

गाथा जो गा-बोलकर सुनाती हो
उसमें तुम अकेली नहीं
संगत देते संगतकार हैं
और साथ है तुम्हारे रागी
कथा के साथ हँसती हो
रोती हो कथा के साथ
कई बार रौद्र रूप धारण कर लेती हो
साधारणीकरण कर ले जाती हो
दर्शक दीर्घा के साथ
तीजन बाई
तुम ज़िंदा कर ले जाती हो
कथा पात्रों को
तीजन बाई
तुम कैसे ज़िंदा कर ले जाती हो
कई सौ सालों से चली आ रही कथा
हैरान कर देती हो

तीजन बाई
वो कौन-सी कथा है
जिसमें तुम खो जाती हो
सिर्फ तुम ही नहीं
जो सुनता है वही आनंद मगन हो जाता है
जब सुई की नोक बराबर ज़मीन का क़िस्सा सुनाती हो
क्या उसमें कहीं बेदख़ल किए गए आदिवासी शामिल है?
क्या किसान की वो ज़मीन शामिल है जिसका मुआवज़ा भी न मिला?
या शामिल है डूब के विस्थापितों की ज़मीन
तीजन बाई
घुमंतू का दर्द भूल गईं

तीजन बाई
किसके गीत गाती हो तुम
द्रौपदी के?
भरी सभा में अपमानित द्रौपदी की कथा कातर स्वर में सुनाती हो
क्या उसमें निर्भया होती है?
सोनी सोढी की व्यथा नहीं व्यापी तुम्हें
मनोरमा या इरोम शर्मिला को जानती हो तुम
और खैरलांजी की प्रियंका
ये तुम्हारे गीत क्यों नही?

तीजन बाई
क्या तुम्हारी पंडवानी
पानसरे, दाभोलकर, कुलबुर्गी या गौरी लंकेशवानी हो सकती है
क्या भारत सरकार इसके लिए तुम्हें पद्मश्री दे सकती है
तीजन बाई
तुम्हारे गीतों में कंठ्य आस्था का लोकवृत्त
क्या जनतंत्र में बदलेगा?

हेमलता महिश्वर

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