कला साहित्य एवं संस्कृति

कविता /अगर दीवारें गूंजती तो पूछती , क्या जानते हैं हम ,क्या जान नहीं पाए – शुभांगी बाजपेयी

शुभांगी बाजपेयी
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अगर दीवारें गूंजती तो पूछती ,
क्या जानते हैं हम ,क्या जान नहीं पाए
किस सच से मुंह मोड़ लिया ,
किस दीवार की दरारों को छिपा आए ,,,
अगर अगर दीवारें गूंजती तो बतातीं
ये मट मैले पन्ने जिन्हें हमने नाम दिया इतिहास ,
ये तो सिर्फ हमारी सोच की खिड़की के पास हैं,
इन्हें खोलें तो मिलेगा इतिहास
उस पेड़ के तने की दरारों में जिनसे बना ये पन्नों का इतिहास।
अगर दीवारें गूंजती तो पूछती कहां से चले थे ,कहां आ खड़े हैं ?
पहले चिड़िया सोने की थी ,आज पिंजरा सोने का है ।
कल नदी पवित्र थी ,आज घुला हुआ विष पवित्रता है।
कल हमने संयमता को जन्म दिया,
आज घोट घोट कर मारा है।
कल भिन्नता गुरूर थी हमारी ,
आज भिन्नता को अभिशाप बना डाला है ।
अगर दीवारें गूंजती तो बतातीं
सूरज कल भी उगा था ,सवेरा आज भी होगा ।
सूरज कल भी ढला था ,अंधकार आज भी होगा।
ना इतिहास तेरा है ना मेरा ।
फिर इतिहास पकड़ने की नहीं ,
बनाने की जरूरत है।
अब दीवारों की ईटें जरजरा गई हैं।
मिट्टी सूख गई है दरारें दिख रही हैं।
इमारतों के खंडहर बन चुके हैं।
अब इस एकांत से आती है तो सिर्फ इतिहास की गूंज….

shubhangi Bajpayee ।

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