आदिवासी कला साहित्य एवं संस्कृति महिला सम्बन्धी मुद्दे

कविता ःः मौन मेरा आभूषण नहीं है… रीना गोटे

लेखिका – रीना गोटे
 भिलाई
युवा आदिवासी लेखिका
मौन मेरा आभूषण नहीं है…
क्योंकि मैं एक नारी हूं,
न किसी से हारी हूं,
अपनी कल्पना में हर रोज,
स्वयं को संवारी हूं,
नदी के जल सी,
बहती हूं अविराम,
अबला नहीं हूं,
न दबी हुई पहचान,
क्योंकि मौन मेरा आभूषण नहीं है…
लेकिन कभी परायों ने,
अजनबियों के सायों ने,
तंग किया हमेशा,
चलती हुई राहों में,
कभी शोर में,
तो कभी भोर में,
वेदना मिली,
धरती के हर छोर में,
मगर मौन मेरा आभूषण नहीं है…
ख्वाब बिखर गये,
जिंदगी अधूरी सी लगने लगी,
हसीन ख्वाब के पीछे का दर्द,
रोज पीछा करने लगी,
वह स्वयं के ख्वाब से,
मुक्त होना चाहती है,
सपनों के बिखरने का दर्द,
जमाने को बताती है,

फिर भी मौन मेरा आभूषण नहीं है…

अब मैं भी खुद को,
असुरक्षित महसूस करती हूं,
मैं भी सलामत हूं या नहीं,
इस शंका से डरती हूँ,
हमेशा बेचैनी तलाशती,
मेरे अंदर की वह नारी,
जो हमेशा सुनती है,
आज फिर लुट गई कोई नारी,
लेकिन मौन मेरा आभूषण नहीं है…

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