कला साहित्य एवं संस्कृति

कवितायें बागबहरा के ” रजतकृष्ण ” की : छतीसगढ़ लिटरेरी फोरम से .

कविता छत्तीसगढ़ से ●५
【रजतकृष्ण 】
—————————–
26 अगस्त 1968 को जन्मे रजतकृष्ण बागबाहरा छत्तीसगढ़ के एक कृषक परिवार से आते हैं और इनदिनों बागबाहरा के कॉलेज में अध्यापन के पेशे में संलग्न हैं । “छत्तीस जनों वाला घर” उनका कविता संग्रह है । रजतकृष्ण ऐसे प्रतिबद्ध कवि हैं जिनकी रगों में कविता की धार बहकर पहले अपने आस-पड़ोस को आलोकित करती है । कविता की यह धार , भले ही धीरे-धीरे आगे बढ़ती है पर अपने वैचारिक स्वरूप में आकर जनपदों के पार जाती हुईं उनकी कविताएं दुनियाँ के भूगोल में व्यापक हस्तक्षेप करने लगती हैं । कवि की कविताओं में उनके आस-पड़ोस , घर का पहले आना बीज से पेड़ बनने की प्रक्रिया की तरह है जो सहज और स्वाभाविक रूप में दृश्यमान है । रजतकृष्ण के पास एक ऐसी संवेदना है जो बहुत तरल होते हुए भी कई बार हथोड़े जैसी प्रहार करती हुई पाठक को सर्जनात्मक दुनियाँ में ले जाने को आतुर लगती है । रजतकृष्ण सर्वनाम जैसी व्यापक और जनपक्षधर विचारों वाली पत्रिका के सम्पादक भी हैं , तो जाहिर है उनकी कविताएं भी हमारे समय में हस्तक्षेप करती हुईं हलचल मचाती हैं । आइए रजतकृष्ण की कविताओं को पढ़ें , आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा की तरह अपेक्षित हैं .

★★★★★★★

● छत्तीस जनों वाला घर

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से जनपद
बागबहरा में छत्तीस जनों वाला एक घर है
जहाँ से मैं आता हूँ कविता के इस देश में

छत्तीस जनों वाला हमारा घर
९० वर्षीया दादी की साँसों से लेकर
डेढ़ वर्षीय ख़ुशी की आँखों में बसता और ख़ुश होता है
यहाँ आने जाने को एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, चार दरवाज़े हैं
और घर का एक छोर एक रास्ते पर
तो दूसरा दूसरे रास्ते पर खुलता है

घर के दाएँ बाजू पर रिखीराम का घर है
तो बाएँ में फगनूराम का
रिखी और फगनू हमारे कुछ नहीं
पर एक से जीजा का रिश्ता जुड़ा, तो दूसरे से काका का

घर के ठीक सामने गौरा, चौरा और पीपल का पेड़ है
जो मेहमानों को हमारे घर का ठीक-ठीक पता देते हैं
यही, हाँ यही घर है मोहनराम साहू का, सावित्री देवी का
मोहित, शैलेश, अश्वनी, धरम, भूषण, महेश, रामसिंह, रामू और रजत कृष्ण का

आँगन में तुलसी और तुलसी के बाजू में छाता
छाता के बाजू में विराजता है बड़ा-सा सिलबट्टा
जो दीदी भैया की शादी का स्वाद तो चखा ही
चखा रहा है अब स्वाद भांजी मधु और भतीजी मेधा की मेहंदी का

आँगन के बीच में एक कुआँ है
और कुआँ है बाड़ी में
बाड़ी से लगा है कोठा
कोठा से जुड़ा है खलिहान
जहाँ पर कार्तिक में खेत से आता है धान
और लिपी-पुती कोठी गुनगुना उठती है

स्वागत है
आओ नवान्न स्वागत है
आओ नवान्न स्वागत है…

२●कुछ और चम्मच दुख

जीवन की मेरी प्याली में
दुःख की चीनी
क्या कम थी
जो तुमने उड़ेल दिये
कुछ और चम्मच दुःख!

खैर
कोई बात नहीं
पियूंगा इसे भी…
पीता आया हूँ जैसे गरल
फेनिल काली रातों का।
जीता आया हूँ
लड़-भिड़ कर
साक्षात यम से जैसे
मैं जीऊँगा…।
चिथड़े साँसों की
फिर-फिर सिऊँगा।।

३●चुप्पी के विरूद्ध

बहुत चुभते हैं तुम्हारे शब्द
जब तुम डाँट रही होती हो।
लगता कि अब तक मुझे
छोटे बच्चे से ज्यादा तुम
कुछ नहीं समझती हो।

बहुत बार सोचता हूँ मैं
बस अब और नही…
ज्यादा छूट की हकदार नहीं तुम
न ही मैं तुम्हारा गुलाम कोई।

पर यह क्या…!
जब तुम कई दफे
मेरी बड़ी-बड़ी गलतियों पर भी
कुछ नहीं कहती
और चुप रहती हो प्रायः
जान-बूझ कर की गई
मेरी मूर्खताओं पर भी
तब लगता है… काश एक बार
डाँट लेती तुम मुझे
और कान उमेठ कर कहतीं
आखिर कब जाएगा बचपना?
कब आएगी अक्ल तुम्हे?

बहुत चुभती है तुम्हारी चुप्पी
हाँ बहुत चुभती
जब तुम्हारे तन बदन में
आग सुलगाते मेरे गुस्से को भी
चुपचाप तुम ठंडे जल सा पी लेती !!

४●रोटी और आँगन

रोटी बँट कर के खुश होती है?
आँगन खुश होता है
एक रह कर के।

इस बखत
कुछ लोग
इसे फिर उलटना चाहते हैं।

सावधान रहें साथियों,
सावधान ओ देश!
चेहरा नया
लक्ष्य पुराना है।

५●पक्षधर

खंजर हो
नागरिक के हाथों में
और नागरिक की पीठ ही
हो एक मात्र लक्ष्य
ऐसे वक्त क्या करेंगे आप?

पहचानेंगे हम
खंजर लिए हाथ
और खड़े होंगे
जीवन के पक्ष में।
जीवन के पक्ष में बोले गए शब्द
चुभते हैं
धारदार खंजर को भी।

खंजर चाहे काट ले
जुबान हमारी
हम होंगे पक्षधर
जीवन के ही
हाँ……. जी….व…..न…. के ही।।

६●गवाही

तालाब में फेंका गया कंकड़
कितना ही छोटा हो
हलचल मचाए बिना
नहीं रहता।

प्रतिरोध का स्वर
चाहे एक ही कण्ठ से
क्यों न फूटा हो
पूरा हवा में गुम नहीं होता।

पीड़ा दबाए कुचले गए लोगों की पीड़ा
कभी पोते को कहानी सुना रहे
दादा की आँखों में उतरता है
तो कभी उन कण्ठों से
फूट पड़ती
जो जमींदार के खेतों में
कटाई करने आई बनिहारिनों की
होती है।

कितने ही जतन कर लिए जाएँ छुपाने के
खून रंगे हाथों की गवाही
कई बार
कटे हुए नाखून ही देते हैं।।

७●सन्नाटा

भारी होता है सन्नाटा वह
जो फसल कटने के बाद
खेतों में पसरा करता।

सन्नाटा वह भारी होता
उससे भी ज्यादा
बेटी की विदाई के बाद
बाप के सीने में
जो उतरता है।

कम भारी नहीं होता
उत्सव के बाद का सन्नाटा

यों सबसे भयावह होता
सन्नाटा वह
जो उस माँ के सीने में
हर सांझ सचरा करता
जिसके दोनों के दोनों बच्चे
भरी दीवाली में भी
घर से दूर होते।।

८●व्रत

तुमने आज व्रत रखा
पति के लिए
कुछ दिनों पहले
व्रत रखा था
पुत्र-पुत्रियों के लिए।

तुम व्रत रखती हो
शिव-शंकर को याद करते हुए
राम-कृष्ण और उनके
अन्य अवतारों के नाम भी।

धरती तो धरती
तुम्हारे हिस्से मढ़ा है
व्रत चाँद का, सूरज का
और अमावस्या का भी

वट, पीपल, आँवला
तुलसी सहित रखती हो
व्रत तुम
जानें कितनी ही
वनस्पतियों का!

स्त्री एक बात तो बताओ
क्या कोई व्रत है ऐसा
जिसमें वह पुरूष
तुम्हारा साथ देता
जिसके लिए तुम
रहती हो निर्जला
पुजती हो समझ कर उसे
दुनिया का सबसे बड़ा देवता।।

९●खाली आदमी

खाली आदमी के पास
शब्द बहुत होते
पर उन्हें सुनने वाले कान कम।
उनके पाँवों के हिस्से में
यात्रा बहुत होती
पर न सुस्ताने को ठौर कोई
ना ही होता कोई अता पता
उनके मुकाम का।

खाली आदमी का
जीना क्या, मरना क्या?
सौ साल की ठोकर
वह पल-पल जीता है…
हर सुबह
एक और अंधेरी सुरंग में
पाँव धरता है।

यों खाली आदमी
भीतर से पूरा खाली
कभी नहीं होता…
खालीपन की सलाइयों से
भविष्य के नाप का स्वेटर बुनना
वह बुन रहा होता है।।

१०●तुम्हारी बुनी हुई प्रार्थना

बुझे मुर्झाए
मेरी हँसी के पेड़ में
टिमटिमा उठी हैं
जो पत्तियाँ आज
उनकी जड़ें
तुम्हारे सीने में टहल रही
मेरे नाम की
मिट्टी-पानी में है ।

मेरी आँखों के
डूबते आकाश में
गुनगुनाने लगी हैं
जो तितलियाँ
उनकी साँसें
तुम्हारी हथेलियों में
बह रही
मेरे हिस्से की हवा में है ।

ओ जलधार मेरी
हार-हताशा
टूटन और तड़कन के
बीहड़ में बिलमे
जो मुकाम और रास्ते
खटखटा रहे हैं कुण्डियाँ
मेरे पाँवों की
मेरी खातिर बुनी हुई
वह तुम्हारी प्रार्थना है ।।

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