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कल्पेश की मौत कहीं हत्या तो नहीं ? :  उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल.

 

15.07.2018 

कल्पेश की मौत के बाद हमारी समझ यकीनन यह साबित करता है कि मीडिया हाऊस कत्लगाह में तब्दील हो गया है | यह हम मीडिया कर्मियों के लिए मौत से कम नहीं है | सम्पादकीय विभाग क्या छापे और क्या नहीं के बीच लटका हुआ है | अखबार गुंडों का समूह और विग्यापन का दुकान बन गया है | सम्पादक और सम्पादकीय विभाग सच को उजागर करने के काम से अलग बाजार में तब्दील हो गया है | लगभग सभी पत्र और पत्रकार नेताओं के प्रवक्ता और राजनैतिक पार्टियों का भाट बन गए हैं |

संतोष यादव, विनोद वर्मा जैसे पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है | मालिनी को बस्तर छोड़ने मजबूर कर दिया जाता है | गौरी लंकेश और कश्मीर के पत्रकार सुजात बुखारी को गोलियों से मार दिया जाता है सिर्फ़ इसलिए कि वे विचारों से असहमत हैं | अन्ध्रा में पत्रकार ने परिजनों को मौत के घाट उतार कर खुद आत्महत्या कर ली | हाल ही में छत्तीसगढ़ में रेणु अवस्थी और शैलेन्द्र विश्वकर्मा ने आत्महत्या कर ली | राजेश गुप्ता के घर में घूस कर सांसदपुत्र मारपीट करता है | इन सारे मामलों का किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच नहीं करवाई जाती है | और ना ही अखबार इस पर आवाज उठाती है | स्टोरी बनाने वालों को यहां स्टोरी नहीं दिखती | कुल मिलाकर मीडिया हाऊस कत्लगाह में बदल रहा है |

कल्पेश की बात अनोखा है वह बड़े कोर्पोरेट घरानों में से एक बड़े मीडिया हाऊस के ग्रुप सम्पादक थे जो मायने तो रखता है उन पर आरोप लगता है कि वे मजीठिया कमीशन के साथ नहीं थे | कॉर्पोरेट जगत और मीडिया के बीच सच और न्याय पर बात करना कोई कल्पेश से सीखे | भाषा को लेकर उन पर आरोप था कि वो हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल कर देते हैं और जवाब गजब का कि मैं दिल से लिखता हूं भाषा से नहीं | परेशान करने वाली बात यह कि एक तो उनकी मौत हो जाती है फिर तुरंत यह खबर फ्लैश होता है कि सोसाईड कर ली | उनके शरीर भर की हड्डियां टूटी हुई थीं | हार्ट अटैक में इतनी हड्डियां नहीं टूटतीं, भले ही वो सीढ़ी से गिर गए हों | वे किसी निहायत निजी मामले को लेकर काफी तनाव और डिप्रेशन में थे | उनका आडियो साजिशाना घुमाया जा रहा था | आडियो लगातार घूम रहा था यहां वहां | कहा जाता है कि भास्कर में उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी, जिससे उनका तनाव बढ़़ रहा था स्वभाविक है बड़े मीडिया का बड़ा काम का होना भी फिक्रमंद होना बोता है |

कल्पेश कूद कर मरे हों या हार्ट सुन्न हो गया हो या फिर उनकी हत्या हुई हो तीनों ही स्थिति में उनकी मौत हुई है और इस मौत से सबक लिया जाना चाहिए | पत्रकारिता में हैं तो लोगों के बीच जाएं उनकी समस्या को सुनिए जिंदगी को धन की चक्की, मठों, गांठों, हाउसों, विचारों आदि में से किसी एक से भी हमेशा के लिए मत बांधिए| हवा की तरह बहते रहिए | करियर को प्रोफेसनल या व्यक्तिगत नहीं मिशन बना लीजिए यह बोल कर कि यहीं समाधान है | बिलकुल खाली भी मत रहें और सिर्फ अपने लिए ही ना जिएं | घूमें-भटके | पुराने दोस्त मित्र रिश्तेदार पकड़ें और साथ खाएं-पिएं-हंसें यह समझ कर कि दुनिया बहुत बड़ी है हमें जिना है और दुश्मन का सामना भी करना है |

कल्पेश का लिखा मैंने बहुत कम पढ़ा है हां असंभव के खिलाफ बदस्तूर और स्केल में लिखा बड़े ग्रुप के बड़े सम्पादक के रूप में लेखन| हमने उन्हे अपनी पत्रिका दक्षिण कोसल में भी प्रकाशित किया है | ‘असंभव के खिलाफ’ लिखना बड़ा कठिन काम है और उन्होंने इस तरह जिंदगी को नया आयाम देने के लिए जिने की भरसक कोशिश की है | हां कल्पेश होना कठिन है | हमारे बीच विचारों और समझ के भेद के बाद अब कोई इस तरह असंभव के खिलाफ नहीं लिख सकता यह मेरा दावा है |

अलविदा कल्पेश…

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