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कन्हैया का घर ,चुनाव प्रचार : नरेश सक्सैना और विनीत तिवारी

बेगूसराय 26 अप्रैल ’19
कन्हैया के घर में, कन्हैया की मां और
विनीत तिवारी के साथ।


टीन का दरवाज़ा, लकड़ी और बांस की चटाइयों से बना परिसर वैसी ही छतें। विनोद कुमार शुक्ल ने शिव जी के एक बहुत छोटे मंदिर को देख कर कहा था , यह एक ग़रीब शिव का घर है। लेकिन यह घर कितना संपन्न कि 30-40 लोगों से भरा, सबका भोजन बन रहा, मां का चेहरा शांत और आतिथ्य के लिए उत्सुक.
पूरे देश से स्वेच्छा से, अपने ख़र्चे पर आये फ़िल्म, थियेटर, राजनीति , विश्वविद्यालयऔर अन्य क्षेत्रों से आये
पचासों लोग।
शैलेन्द्र का एक गीत है। बहुत दिया देने वाले ने तुझको
आंचल ही न समाये तो क्या कीजे।
बहुत अफ़रातफ़री का माहौल। दिल्ली दयाल सिंह कालेज के असि. प्रोफेसर अभयकुमार ने एक पोर्टेबल
साउंड सिस्टम का इंतजाम करलिया है। कल मेरे साथ
सिंघौल गांव जायेंगे।
कन्हैया की लहर गति पकड़ रही है।

नरेश सक्सैना की वाल से वाया विनीत तिवारी

2015 के विधानसभा चुनाव में और उसके बाद से जब भी बेगूसराय आया तो हर बार कन्हैया के घर जाना हुआ ही। तो 26 अप्रैल को जब नरेश जी और विभूति नारायण राय जी के साथ शबाना आज़मी और प्रकाश राज की सभा से बलिया के की शाम मैंने नरेश जी से कहा कि चलिए,चमरिया मैदान की सभा से जल्द वापस लौट आये तो मैंने दोनों से पूछा कि कन्हैया के घर चलेंगे क्या? विभूति जी किसी सभा मे जा चुके थे तो मैं और नरेश जी ही चले गए।

बिहट बेगूसराय से 12-14 किलोमीटर है। कन्हैया के छोटे भाई प्रिंस ने जाने की व्यवस्था कर दी। घर पहुंचे तो बाहर ही धनंजय मिल गया। धनंजय, वरुण, साकेत और उनके जैसे अनेक नौजवान साथियों ने अपनी ज़िंदगी के पिछले 2-3 साल कन्हैया के लिए परछाईं बनकर बिता दिए हैं। कन्हैया के लिए दोस्त के तौर पर दोस्ती निभाना एक बात है लेकिन ये वक़्त उन्होंने भारत की राजनीति में पैदा हुई सच्चाई की जीत की उम्मीद की ख़ातिर भी लगाये हैं। अपनी पढ़ाई, अपना काम, अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, अपनी सेहत – सबसे एक बड़े उद्देश्य के लिए उन्होंने वक़्त लिया है और उस शख्स को दिया है जो झूठ की सत्ता के ख़िलाफ़ आम इंसान की एक ताक़तवर ज़मीनी आवाज़ है। ऐसे सभी साथी कन्हैया की ताक़त है और हम सबकी रौशन उम्मीद भी। उनके घरवालों को भी सलाम जिन्होंने उन्हें इस बड़े मक़सद की ख़ातिर सम्बल, सहयोग और हौसला दिया।

तो हम घर पहुँचे तो कन्हैया के बड़े भाई मणिकांत मिले। देखकर ख़ूब प्रसन्न हुए। नरेशजी का परिचय करवाया। बोला माँ से मिलाने लाया हूँ। माँ आईं। गॉड में एक छोटी बच्ची। बच्ची के चेहरे पर एक लगातार मुस्कान थी। आसपास के चुनावी माहौल के तनाव से बिल्कुल अंजान। नाम पूछा। जवाब में मुस्कुराहट। और गहरी। अंदर के कमरे में 10-15 महिलाएँ थीं। मैंने कन्हैया की माँ से कहा – जैसे एक ही महीने में 10-15 शादियाँ हो रही हों, ऐसा माहौल लग रहा है।
वो बोलीं – हाँ, शादी की चहल-पहल तो 4-5 दिन में ही ख़त्म हो जाती है। यहाँ तो बहुत दिन से बहुत लोग जमा हैं।
तब तक बच्ची बड़ों की बात में अपनी जगह न पाकर थोड़ा बेचैन होने लगी थी। ये देखकर नरेश जी ने और मैंने उससे बात करना शुरू किया।

नाम हुआ मानवी। थोड़ी देर मानवी से बात की। मानवी ने अपने साथ – साथ अपनी बड़ी बहन का नाम भी बता दिया – जाह्नवी।मानवी के साथ थोड़ी और बातचीत की और एक-दो फ़ोटो-शोटो खींचीं तो वहीं पलंग पर अलसा रहे मानवी से थोड़े बड़े और बहुत गंभीर दिखते हज़रत ने भी गर्दन मोड़कर हम नाचीज़ अतिथियों पर निगाह डाली। उनका नाम पूछा गया। उन्होंने बताया कौशिक। कौशिक जी की उम्र होगी 9-10 बरस। नरेश जी का कैमरा देकर उनसे कहा कि एक तस्वीर आप खींच दो। उन्होंने खींच दी। फिर नरेश जी ने कहा कि अब आप आ जाइए, हम खींच देंगे। तो कौशिक ने वहीं खड़े-खड़े कैमरे की दिशा बदली। खुद कैमरे की तरफ देखा, और बोले, “सेल्फ़ी में सब आ जाएँगे।” नरेशजी प्रसन्न और हतप्रभ।

कैमरे की चटर-पटर सुनकर तब तक दो बच्चे और आ गए। नाम बताया प्रीत और आयुषी। मैंने कहा – चलो, अब सब बच्चों का फोटो खींचेंगे। तो सब बच्चे बिना संकोच और दुविधा के नरेशजी के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए और मुस्कुराते हुए नरेश जी के गले मे हाथ भी डाल दिये। चंद मिनटों में इतनी दोस्ती। मैंने नरेश जिनसे कहा “वाकई, सब बच्चे ही हैं इस फोटो में, आप सहित।” नरेशजी भी मुस्कुराये, माँ भी और बच्चों की मुस्कराहट से ही तो बाक़ी चेहरे मुस्करा रहे थे।

ये बच्चे कन्हैया के भाई मणिकांत और बहन के बच्चे थे। चुनाव में क्या होगा, सरकार किसकी बनेगी, लोकतंत्र पर ख़तरा किसके आने से बढ़ेगा और किसके जाने से घटेगा, ये इतने लोग क्यों आये हैं – इन सवालों से बेफ़िक्र ये बच्चे अपने घर मे एक 80 के हो चुके और 81 के हो रहे बुज़ुर्ग की अपने घर मे बच्चों जैसी मौजूदगी से खुश थे।

ये बच्चे और दुनिया के सारे बच्चे खेलें, कूदें, पढ़ें और जैसी दुनिया हम उनके लिए छोड़कर जाएं, वे उससे बेहतर बनाएँ, इसी ख़याल में डूबे हम कन्हैया की जीत की शुभकामना माँ को देकर और पीछे बने सामूहिक किचन से होते हुए बाहर जाने को घर से निकले ही थे कि पीछे से बच्चों ने आग्रह से आवाज़ दी – खाना खाकर जाओ ना।

और हमारा पेट और दिल उन बच्चों की मोहब्बत से पूरा भर गया।

लौटते में इप्टा के साथी अमरनाथ जी से मिलते हुए जब हम रात वापस बेगूसराय पहुंचे तो एक अलग ही संतोष से, जो जीत – हार की चिंता से ऊपर और सही लड़ाई का हिस्सा बनने से हासिल होता है, हम दोनों भरे हुए थे।

विनीत तिवारी की वाल से .

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