राजनीति

ओपी चौधरी ; बाजारवाद में छत्तीसगढ़ की कलेक्टरी बिक गई. : गणेश कछवाहा

27.08.2018/ रायगढ.

बाज़ारवाद का असर पूरी दुनिया में स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।बाज़ार बहुत क्रूर होता है।बाज़ार में हर चीज बिकाऊ होती है।रिश्ते नाते, आदर्श,नैतिक मूल्य, कला साहित्य ,संस्कृति सभ्यता, संस्कार,सबकुछ बाजार में बिकने वाली वस्तु में तब्दील हो जाती है।केवल एक ही मकसद होता है येनकेन प्रकारेण लाभ कमाना, पूंजी बढ़ाना।

इसी बाजारवाद में छत्तीसगढ़ की कलेक्टरी बिक गई।
छत्तीसगढ़ के युवा कलेक्टर द्वारा कलेक्टरी छोड़कर राजनीति में आने का निर्णय लिया गया। जिसकी चर्चा जोरों पर है।सही निर्णय, गलत निर्णय,आदर्श वादी,दूरदृष्टि,जीत हार ,चुनोतियाँ,आदि के जुमले गढ़े जा रहे हैं और पक्ष विपक्ष में चापलूसी पूर्ण आधारहीन कशीदे कसे जा रहे हैं।पर सवाल यह उठता है कि भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा को छोड़कर राजनीति में आकर कौन सी व कैसी सेवा करना चाहते हैं?इसका बहुत स्पष्ट और ईमानदारी पूर्ण जवाब जनता को देना चाहिए।

जनता यह भी जानना चाहेगी की श्रीमान पूर्व कलेक्टर महोदय जो अकेडमी खोलकर गरीब युवाओं को बड़ा अफसर बनने का सपना दिखाते थे तो क्या वह भी प्रशासनिक जुमला था?अगर नहीं तो कलेक्टरी छोड़कर उन युवाओं के सामने कौन सा आदर्श प्रस्तुत किये हैं?और यदि वह महज जुमला था तो जनता तुम पर क्यों और कैसे विश्वास करेगी?

समाजशास्त्रियों एवं अनुभवी बुजुर्ग पीढ़ियों का यह मानना था कि राजनीति से बेहतर सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा (कलेक्टर )ज्यादा अच्छा, स्थायी एवं सम्माननीय होता है।पर अब यह सवाल बहुत जटिल हो गया है कि क्या सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा से राजनीति बेहतर है ?क्या सेवा के लिए राजनीति में आना जरूरी है?वर्तमान में युवाओं के लिए बहुत बड़ा प्रश्न है।

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गणेश कछवाहा
जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा एवं
ट्रेड यूनियन काउंसिल, रायगढ़

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