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ऑनलाइन पिज़्ज़ा और स्कूलों में दयालुता सीखना : नथमल शर्मा , संपादक ईवनिंग टाईम्स

31.12.2017

अब हम एक नए दौर में हैं। सब – कुछ, उलट -पलट रहा है। बदल रही है दुनिया। बदल रहे हैं लोग और समाज में सब कुछ बदल जाने की होड़ मची है। राजनीति ने तो खुद को बदल ही लिया है। सारे नैतिक मूल्यों को बांधकर राजनीतिक दलों की किसी बहुत पुरानी और मजबूत अलमारी में बंद कर दिया गया है। ऐसे बदलते दौर में बच्चे पढ़ रहे हैं। किताबों से वह सब कुछ सीख रहे हैं जो जिंदगी में कहीं है ही नहीं।

इस आधुनिक समय में अब नैतिक मूल्य, संवेदना, दयालुता, इंसानियत ये सब स्कूलोंमें सिखाया जाएगा। या कहें कि स्कूल से “सीखना पड़ेगा ” । इतना ही नहीं अपने माता-पिता का सम्मान कैसे करना है यह भी शिक्षक सिखाएंगे। इसके लिए बाकायदा मातृ – पितृ पूजन दिवस मनाया जाएगा। अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन ने इस तरह की शुरुआत की है। वहां और भी कई स्कूलों में बच्चों को बताया जाएगा कि दयालुता और इंसानियत क्या है। वहीं अपने देश में झारखंड से खबर है कि वहां स्कूलों में मातृ पितृ पूजन दिवस मनाया जाएगा।

सरकार का मानना है कि इससे बच्चे माता-पिता का सम्मान करना सीखेंगे। सरकार ने अपनी सभी करीब चालीस हजार स्कूलों को ये निर्देश ज़ारी कर दिए हैं। पड़ोसी मध्य प्रदेश में भी इस तरह की पहल हुई थी। कुल मिलाकर अमरीका से लेकर अपने देश तक सभी जगह मानवीय मूल्यों को लेकर चिंता है। जो चीजें हमें सहज ही , बहुत ही स्वाभाविक तरीके से सीख जानी चाहिए या कि सीखना ही नहीं आत्मसात कर लेना चाहिए । उसके लिए स्कूलों का सहारा लेना पड़ रहा है। मतलब यह कि समाज से , परिवार से भी यह सब गुण गायब ही तो हो गए हैं/हो रहे हैं। इसके लिए राजनीति ने कभी कोई चिंता नहीं की बल्कि धर्म गुरु दलाई लामा सामने आए और उनकी चुनौती के बाद अमरीका की यूनिवर्सिटी ने इस तरह का पाठ्यक्रम तैयार किया है।

ज़ाहिर है कि समाज तेज़ी से बदल रहा है। गुरुकुलों वाला ज़माना अब रहा नहीं। उसकी अब ज़रूरत भी नहीं। लेकिन आज जो कुछ है उसकी भी ज़रूरत नहीं है। परिवार और समाज के माहौल का असर देश पर होता ही है। हां यह भी सच है कि नेतृत्व का असर भी समाज पर होता है।

गांधी-नेहरू या सुभाष-भगतसिंह के बाद हमें ऐसे नायक ही नहीं मिले कि जिन्हें देखकर हम अपने बच्चों से कह सकें कि उनके जैसे बनना। यह एक गंभीर स्थिति है। स्कूलों का जहाँ तक सवाल है, तो बहुत ही दयनीय और चिंता जनक हालात हैं। सरकारी स्कूलों में कोई पढाना नहीं चाहता तो निजी स्कूल दुकानों में तब्दील हो चुके हैं। अपने देश में तो कहावत चल पड़ी है कि सरकारी स्कूल से कई गुना बेहतर हालत मंदिरों की है। वैसे भी स्कूलों में शिक्षक नहीं अब शिक्षा कर्मी होते हैं। बाकी अंग्रेजी स्कूलों में भी सर या मैम होते हैं। जहां भारी भरकम फीस और चमचमाती इमारतें तो हैं पर संवेदना ,करूणा या दयालुता के लिए कोई जगह नहीं है। समाज को इसकी कोई चिंता भी नही । वह तो एक अंधी दौड़ में भाग रहा है जहां उसके बच्चे “कम्प्यूटर लेबर” में तब्दील हो रहे हैं। सारी कोशिश के बावजूद ऑनलाइन पिज़्ज़ा मंगाते युवा किसी और ही धुन पर थिरक रहे हैं। भले ही मां के हाथ की रोटियों के स्वाद से दूर रहने की पीड़ा भी है उन्हें। जब माता-पिता पूजन दिवस मनाने की नौबत आ जाए तब साफ है कि नैतिक मूल्य कहां है ? हम सब साल भर लगभग रोजाना ही कोई न कोई दिवस मनाते हैं।

गांधी जयंती या बाल दिवस या कि शिक्षक दिवस या तिलक जयंती। ऐसे अनेक दिवस है और आजकल तो दिवस नहीं डे है। मदर्स डे, फादर्स-डे और सबसे लोकप्रिय (?) है वेलेंटाईन डे। इन सारे दिवसों या डे के बाबजूद नैतिक मूल्य या कि संवेदनशीलता या एक- दूसरे के प्रति सम्मान लगातार कम ही हुआ है। हो रहा है। निज़ता और स्वार्थ हावी है। हां,बातें जरूर की जाती है। चिंता भी जताते मिलते हैं लोग पर कुछ होता दिखता नहीं। यह गंभीर स्थिति है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म ही हो गया है। आज भी ईमानदार और प्रतिबद्ध लोगों की संख्या ज्यादा है। ज्यादातर लोग अपने बिजली पानी का पूरा बिल भरते हैं। अधिकांश लोग टैक्स भी जमा करते हैं और एक-दूसरे का साथ भी निभाते हैं। दोस्ती भी । लेकिन ऐसे लोग हाशिए पर ही हैं और राजनीति- ब्यूरोक्रेसी व उद्योग जगत का त्रिगुट हावी है। सारी चमक वह अपने हिस्से में किए हुए है। हमारे हिस्से की प्यास छीन कर अपने लिए बिसलेरी बना रहा है। ऐसे में नैतिक मूल्यों के लिए स्कूलों की तरफ देखते समाज के हालात समझे जा सकते हैं। दरअसल बोलने वाले चुप हैं और चुप समाज की निर्मिति अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ़ ही जाती है। इसे भी समझने की जरूरत है। सर्वेश्वर दयाल

सक्सेना की कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं –
भीतर कौन देखता है 
बाहर रहो चिकने 
यह मत भूलो 
यह बाज़ार है 
सभी आए हैं बिकने 
राम राम कहो 
और माखन मिश्री घोलो।
व्यंग्य मत बोलो।
– नथमल शर्मा

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