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एक ही बाहुबली और चौराहे पर मुर्गा : नथमल शर्मा  :          इवनिंग टाइम्स “आज शाम की बात “

2.10.2018 : बिलासपुर.

अरपा का पानी रुक सा गया है । हालांकि हमारी अरपा अतः सलिला है । भीतर बहती है । पर इन दिनों तो लग रहा है वह भीतर भी सूख गई है, या हम ही उस बहती हुई धारा को महसूस नही कर पा रहे हैं । हम पर किसी के भी कुछ भी कहने का कोई असर नही होता । हमने अपनी अरपा,अपनी अंतः सलिला से जैसे खुद को अलग कर लिया है । तब ही तो यहां चौराहे पर मुर्गा बनाकर पिटाई जैसी बातें कही जा रही है । तभी तो इस शहर का चुना गया जनप्रतिनिधि खुद को बाहुबली कहने (और शायद कहलाने) की हिम्मत करता है । राजनीति की इस निम्नस्तरीय भाषा पर शहर शर्मसार है .

       युवक कांग्रेस की एक सभा हुई अरपा के किनारे । सभा क्या यह आंदोलन था ।’ मैं भी बेरोजगार ‘ नामक यह आंदोलन युवा कांग्रेस द्वारा किया जा रहा है । इसी में इनके एक बड़े नेता (?) आए । सभा को संबोधित करते हुए बहुत जोश में थे । यहां पुलिस ने कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं की जमकर पिटाई की थी । कांग्रेस भवन में घुसकर डंडे बरसाए थे , क्योंकि इन लोगों ने मंत्री का घर गन्दा कर दिया था । इस गन्दगी और डंडे बरसने वाली दोनों ही बातों की मुख्यमंत्री ने निंदा की थी । अब युवा नेता तो जोश में , आए थे बेरोजगारी वाले आंदोलन में और पिटाई करने का नया काम दे गए । कहा कि – इस लाठीचार्ज का बदला लेंगे । सत्ता में आने दो हमें एक – एक को चौराहे पर लाकर मुर्गा बनाएंगे और पिटाई करेंगें । कमिश्नर का दफ्तर बाजू में ही है , कल अवकाश था । वहाँ के सुरक्षा जवानों ने भी ये बातें सुनी । युवा कांग्रेस के बेरोजगारी आंदोलन करने वालों ने तालियां बजाई । युवा नेता खुश कि क्या गज़ब भाषण दिया । आज के अखबारों में यही सुर्खियां हैं ।

        कल लगभग इसी समय हमारे विधायक और प्रदेश के मंत्री (दमदार,कद्दावर वगैरह) ने कहा कि कांग्रेसी या कुछ लोग इस शहर की शांति भंग करने की कोशिश कर रहे हैं । फ़िज़ा बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं । इस शहर में दस-बारह लोग खुद को बाहुबली समझते हैं , पर बाहुबली तो एक ही है । इस बयान ने भी आज सुर्खियां बटोरी । यह भी कहा कि यह शहर अमन पसन्द है । सबको आत्मसात कर लेता है । जो यहां आया यहीं का होकर रह गया । यहीं बस गया । इस बात को यहां आकर बसने वालों से बेहतर और कौन समझ सकता है ? समझते भी हैं । 

       सवाल यह है कि राजनीति में ये किस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो रहा है । भाषा विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हम जो सोचते हैं या चाहते हैं वही शब्दों के जरिए हमारे मुंह से निकलता है । यानी हमारी बात, हमारी भाषा हमारे संस्कार बताती है । कुछ बरसों से खासकर राजनीति में तो यह स्तर बिलकुल निचले पायदान तक पहुंच गया है । एक दूसरे को सांप,नेवला,चूहे,मेंढक जैसे संबोधन । और फिर छप्पन इंच का सीना तो फिर चौकीदार चोर है तक गिर गए ये राजनेता । ये भाषा, ये भाषण किस बात के प्रतीक हैं ? इनसे क्या कोई सीखेगा ? लोकतंत्र में राजनेताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वे हमारे प्रतिनिधि होते हैं। हमारी तरक्की के माध्यम और संवाहक भी । समाज के नायक भी । बरसों पहले गांधी,नेहरू, शास्त्रीजी, पटेल, भगतसिंह जैसे नेता नायक हुए । आज कौन है ? कौन है ऐसा नायक जिसका उदाहरण देकर बच्चों से कहें
कि – इनके जैसा बनना । 

       अपना शहर इस बुराई से लगभग बचा ही रहा। यहां सारे विरोध के बावजूद आपसी सद्भाव बना और बचा रहा । पर लगता है यह ज्यादा नही बच पायेगा । अब यहां बदला लेने की बातें कही जा रही है , वह भी सार्वजनिक तौर पर । अब यहां के प्रतिनिधि खुद को बाहुबली बताने में गर्व करते दिख रहे हैं । बाहुबली शब्द यूपी बिहार से आया है । दक्षिण से भी । वहां बाहुबलियों का सम्मान नहीं आतंक है । लोग ऐसे बाहुबलियों से डरते हैं । छोटे गुंडे आगे चलकर बाहुबली बनते रहें हैं । यानी यह एक नकारात्मक या खलनायक वाला चरित्र है । ऐसे का उदाहरण देना किस बात का प्रतीक है ? जबकि लाख असहमतियों के बावजूद अमर अग्रवाल ने अपने “दुश्मन विरोधी” नहीं बनाए । बिलासपुर की परंपरा को समझते हुए यहाँ बदले की राजनीति नहीं की। कांग्रेस उनकी परम्परागत विरोधी है और कांग्रेस में ही उनके ढेरों प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समर्थक भी है । भाजपा में भी उनके विरोधी रहे पर सब किनारे लग गए । इसीलिए वे लगातार चुनाव जीतते रहे । तो फिर अब बाहुबली की क्या जरूरत पड़ गई ? या फिर यह कहने की कि “कांग्रेसियों की पिटाई कम हुई, और पड़नी थी ” । इस स्तर पर आने की क्यों जरूरत पड़ गई ? क्या इस बार चुनौती ज्यादा गंभीर है ? लगता तो नहीं ऐसा क्योंकि उनके चुनावी प्रबंधक तो एकदम निश्चिंत है । कहते हैं इस बार नया फार्मूला तैयार है । चुनाव तो हम ही जीतेंगे । तो फिर ऐसी बौखलाहट क्यों ?

        कांग्रेसी और भाजपाई दोनों ही दलों के नेताओं को यह बात समझनी ही होगी । यहां की फितरत का सम्मान करना ही होगा । करना ही चाहिए । ये अरपा किनारे बसे लोगों का शहर है । वे सब समझते हैं और अंतः सलिला की तरह भीतर ही बहने देते हैं । अवसर का इंतज़ार करते हैं । अहंकार को अरपा का पानी बहुत दूर तक बह देता है । इसे जिसने नहीं समझा वह बह गया । उसे कहीं किनारा नहीं मिला । यही इस शहर की तासीर है । लोगों की चुप्पी का मतलब कमजोरी तो कतई नही समझना चाहिए, हालांकि आज के राजनेता ऐसा ही समझने की गलती करते हैं , कर रहे हैं । फिलहाल चुप जनता इसे भी देख रही है । अतःसलिला बह रही है । 

  

नथमल शर्मा ,वरिष्ठ पत्रकार बिलासपुर 

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