मानव अधिकार

एक शहरी नक्सली का बयान….

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा नजरबंदी और ट्राजिंट रिमांड निरस्त करने के बाद बाहर आने के बाद गौतम नवलखा का बयान .

1.10.2018

मैं सर्वोच्च नयायालय के उन न्यायाधीशों को धन्यवाद देना चाहता हूं. जिन्होंने बहुमत (majority) और असहमत (dissenting) में फैसला सुनाया, और राहत पाने के लिए हमें चार सप्ताह का समय दिया ; भारत के उन सभी सभी जीवंत नागरिकों और का आभारी जिन्होंने हमारी ओर से एक जाबांज लड़ाई लड़ी, जिनकी याद मैं हमेशा अपने दिल में संजो कर रखूँगा . मैं इस एक जुटता के
प्रदर्शन से अचंभित हुआ हूँ , जो सरहदों को पार कर इस मुद्दे पर समर्थन जुटाने में  एक अभूतपूर्व कदम है.
दिल्ली उच्च न्यायालय से मैंने आज़ादी प्राप्त की है. इससे मुझे नितांत ख़ुशी मिली है.

मेरे प्रिय मित्रगण और अधिवक्ता गण जिनकी अगुवाई नित्या रामकृष्ण , वारीषा फरासत, अश्व्र्, और उनके साथ अन्य क़ानूनी और तार्किक टीम के सदस्यों का, जिन्होंने मेरी आज़ादी के लिए असली मायने में “आसमान और
ज़मीन” एक कर दिया . मैं नहीं जानता की उनके इस क़र्ज़ को में कैसे उतारूंगा. और उन वरिष्ठ अधिवक्ताओं का जिन्होंने उच्चत्तम न्यायालय में हमारे पक्ष में पैरवी की. घर में नज़रबंदी का समय का मैंने उत्तम उपयोग किया , इसके बाबजूद की कुछ पाबंदियां लगे गई थी. इसलिए मुझे इसकी किसी से कोई शिकायत नहीं हैं .

लेकिन इस समय मेरे सह-अभीयुक्तों, और भारत में सैकड़ों-हज़ारों अन्य राजनेतिक बंदियों को को भुला नहीं सकता जो अपनी वैचारिक प्रतिब्धता के कारण या जिन्हें झूठे आरोपों में फंसाकर या दमनात्मक कानून यू ए पी ए , विधि विरुद्द कार्य कलाप निवारण अधिनियम [Unlawful Activities
(Prevention) Act] के तहत गलत तौर पर जेलों में कैद रखा गया है. इसी प्रकरण  में मेरे साथी अभियुक्त जेलों में दुर्व्यवहार के खिलाफ भूख हड़ताल पर रहे, और
उन्होंने मांग की कि उन्हें राजनेतिक बंदियों (political prisoners) का दर्ज़ा दिया जाये.  या फिर अपने विवेक के चलते बनाये गए बंदियों को (prisoners of
conscience) का अन्य राजनेतिक बंदियों ने भी समय-समय पर इन्ही मांगों के लिए भूख हड़ताल का सहारा लिया ,नागरिक आज़ादी और जनतांत्रिक अधिकारों के आन्दोलन (Civil Liberties & Democratic Rights Movement) के लिए उनकी आज़ादी और अधिकार काफी बहुमूल्य हैं.

लेकिन ,उत्सव मानाने के भी कई कारण हैं.

मैं एल जी बी टी क्यू के कामरेड साथियों को हाल ही में हासिल उनकी विशाल जीत पर  जिसे उन्होंने सघन और जुझारू संघर्ष के बार हासिल किया और जिसने एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार आन्दोलन के द्वार खोल दिए हैं. ठीक उसी तरह जैसे बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा जाति को जड़ से नस्तेनाबूद करने, और उन्हें “ संगठित ,शिक्षित और विद्रोह ” करने के लिए हम सभी को प्रोत्साहित किया . उनके साथ एकजुटता दर्शाने में हमें समय तो लगा, लेकिन आपके लगन और दृढ़ता ने हमें खुद को बदलने पर मजबूर कर दिया . आप हमारे चेहरे पर मुस्कान वापस ले आये, और हमारे जीवन में में इन्द्रधनुषी रंग बिखेर दिया .
और इसके साथ ही भीम सेना के चन्द्र शेखर रावण और उनके साथी कामरेड सोनू और शिवकुमार ने निवारक निरोध (preventive detention) से आज़ादी जीती वह हमारे यकीन को और भी पुख्ता करती है, क्योंकि वह सामाजिक तौर पर जातिगत आतंकिय शासन के खिलाफ ज़मीनी स्तर से ऊपर तक अपराजित प्रतिरोध की ताकत को दर्शाता है.

जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के मेरे दोस्तों को संयुक्त वामपंथी पैनल की एतिहासिक जीत को मैं सलाम करता हूँ . जिसे एक बार फिर यह साबित करती है की एकीकृत प्रतिरोध आज समय की ज़रुरत है – केवल इसके जरिये ही हम सताव का सामना और संघर्ष कर सकते हैं, ताकि जन आधारित निर्णायक समर्थन जुटाया जा सके.

दोस्तों, सच्चाई और ईमानदारी से लादे शब्द गोली और गाली से ज़्यादा
ताकतवर होते हैं, आज यह साबित हो रहा है , हमारे गीत और कविताओं में जोश है, और हमारे काम और लेखन का आधार तर्क और तथ्य हैं.

सभी निकट और प्रियजनों को प्रेषित , आइये हम अपनी संवेधानिक आज़ादी  की लागू करने के लिए और सभी तरह के शोषण और दमन के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते रहें.

आइये हम सब मिलकर पाश के यह अनमोल बोल दोहराएँ :

  1. हम लड़ेंगे साथी
    की लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता
    हम लड़ेंगे
    कि अभी तक क्यों लडे क्यों नहीं
    हम लड़ेंगे
    अपनी सज़ा कबूलने के लिए .
    लड़ते ही मर जाने वालों की
    याद जिंदा रखने के लिए
    हम लड़ेंगे साथी
    लाल सलाम !

गौतम,
सोमवार . 1 अक्टूम्बर 2018

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