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एक मुलाकात भिलाई के आध्यात्मिक इंजीनियर से : भिलाई एक नंबर रहा लेकिन अब इस गौरवगाथा से बाहर आना होगा, स्टील सेक्टर अपने कार्यकाल पर बोले-मेरे कामकाज का मूल्यांकन समय करेगा : अरुणकुमार रथ से मुलाकात की मोहम्मद जाकिर हुसैन ने .


भिलाई स्टील प्लांट के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अरूण कुमार रथ एक काबिल इंजीनियर होने के साथ-साथ आध्यात्मिक अभिरूचि वाले व्यक्ति हैं। उनके इस्पात भवन स्थित दफ्तर में एक ध्यान केंद्र बना हुआ है। उनके बुलावे पर भिलाई आने वाले खास मेहमान हो या फिर किसी तरह की विभागीय बैठकों में शामिल होने वाले अफसर, सभी यहां कुछ देर शांत भाव से ध्यान जरूर लगाते हैं। बीते साल 9 अक्टूबर को भिलाई में अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी के चलते संकट की घड़ी में उन्हें अचानक से भिलाई स्टील प्लांट की जवाबदारी सौंप दी गई थी तब वे दुर्गापुर स्टील प्लांट के सीईओ थे। भिलाई में अपना 7 महीने का संक्षिप्त कार्यकाल बिताने के बाद अरूण कुमार रथ 31 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इस सेवानिवृत्ति से पहले मैनें उनसे इंटरव्यू के लिए वक्त मांगा था। उन्होंने इनकार नहीं किया लेकिन उनकी ”हां” के फलीभूत होने में करीब 20 दिन लग गए। खैर, 23 मई को जब देश और दुनिया का ध्यान लोकसभा चुनाव परिणाम  के अपडेट जानने में था, तब इस्पात भवन के सीईओ दफ्तर में अपने रूटीन कामकाज के बीच उन्होंने करीब 50 मिनट का वक्त मुझे दिया। बातें राऊरकेला से लेकर भिलाई तक और स्टील इंडस्ट्री के भविष्य से लेकर उनके अपने निजी व्यक्तित्व तक पर हुई। सभी मुद्दों पर उन्होंने खुल कर बात की। अखबार की अपनी सीमा है, इसलिए इस लंबे इंटरव्यू की कुछ बातें 30 मई के ”हरिभूमि” के अंक में प्रकाशित हो चुकी हैं। अब पूरा इंटरव्यू आप मेरे ब्लॉग में  { http://bhilaise.blogspot.com}
लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।

मुहम्मद जाकिर हुसैन 


भिलाई स्टील प्लांट में 14 कार्मिकों के लिए जानलेवा साबित हुए 9 अक्टूबर 2018 के दर्दनाक हादसे के बाद अचानक जब दुर्गापुर के सीईओ अरूण कुमार रथ को भिलाई की जवाबदारी मिली तो वह खुद हैरान थे। लेकिन इससे वे हड़बड़ाए नहीं, बल्कि पास के एक आध्यात्मिक केंद्र में जाकर ध्यान लगाया और फिर अपनी जवाबदारी स्वीकार करते हुए भिलाई के लिए रवाना हो गए। अब दो दिन में सेवानिवृत्ति के साथ रथ इस जवाबदारी से मुक्त होने जा रहे हैं। 7 महीने का उनका छोटा सा कार्यकाल बहुत ज्यादा उथल-पुथल वाला रहा। रथ कहते हैं कि भिलाई स्टील प्लांट में बिताए सात महीने सेल में पूरे 37 साल के उनके सेवाकाल का सार हैं। 

अपनी सेवानिवृत्ति से हफ्ता भर पहले 23 मई 2019 की सुबह जब देश-दुनिया भर के लोग लोकसभा चुनाव परिणाम का अपडेट जानने में व्याकुल हो रहे थे, तब सीईओ अरूण कुमार रथ आम दिनों की तरह इस्पात भवन के अपने दफ्तर में रोजमर्रा का कामकाज निपटा रहे थे। इस बीच फुरसत निकाल कर उन्होंने बातचीत के लिए समय भी दे दिया। इस खास मुलाकात के दौरान करीब 45 मिनट तक उनसे कई मुद्दों पर बात हुई। उनके ठीक पीछे  खिड़की पर लगे कांच से अनवरत सृजन में डूबा भिलाई स्टील प्लांट साफ नजर आ रहा था। ऐसे माहौल में सीईओ अरूण कुमार रथ ने अपने 37 साल के स्टील सेक्टर के सेवाकाल के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी बात की। इस लंबी बातचीत के दौरान मेरे सवालों के जवाब अरूण कुमार रथ ने बड़ी तसल्ली के साथ दिए।

0 बचपन में आपके मन में भिलाई को लेकर कैसी छवि थी? 

00 सच कहूं तो बचपन में हमारी पीढ़ी के लोग भिलाई के बारे में बिल्कुल नहीं जानते थे। हम लोग स्कूली पाठ्यक्रम में राउरकेला स्टील प्लांट के बारे में पढ़ते थे कि-राउरकेला दिनो रात्ति, ढलई लुहा केते जाति (राउरकेला दिन-रात, अलग-अलग प्रकार का ढलाई लोहा बनाता है)। तो ओडिशा की हमारी पीढ़ी का स्वाभाविक लगाव राउरकेला स्टील प्लांट से ही था। लेकिन (राउरकेला इंजीनियरिंग)कॉलेज पहुंचने पर भिलाई स्टील प्लांट के बारे में भी जानकारी मिली। हालांकि हम ओडिशावासियों को कॉलेज के स्टडी टूर में भी राउरकेला स्टील प्लांट ही देखने का मौका मिला था। उन दिनों मुझे याद है भिलाई हमेशा खबरों मेे बना रहता था। तब कभी सोचा नहीं था कि स्टील सेक्टर में करियर बनाउंगा और सेल की कुछ प्रमुख इकाईयों में सेवा देने का मौका मिलेगा। 

0 आपको सेल से जुडऩे का मौका कैसे मिला? 

00 उन दिनों आरईसी से इंजीनियरिंग में डिग्री के बाद मैं आईआईटी कानपुर से एमटेक कर रहा था। तब मैनें 50 जगह सर्विस करने का लक्ष्य नहीं रखा था। मेरी इच्छा शिक्षण के क्षेत्र में जाने की थी। हालांकि एमटेक के दौरान सिर्फ अनुभव के लिए मैंनें स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) का इंटरव्यू दे दिया था। वहां सलेक्शन हो गया और मुझे राउरकेला मिल भी गया। हर कोई अपने स्टेट में अच्छा जॉब चाहता है और मुझे जब राउरकेला मिल गया तो मैनें भी 1982 मेें सेल ज्वाइन कर लिया। राउरकेला के उन शुरूआती दिनों में मैं 2-3 मरतबा भिलाई आया था। 

0 उन शुरूआती दिनों में भिलाई और राउरकेला में क्या फर्क देखा आपने?

00 राउरकेला में सेवा के दौरान जब पहली बार भिलाई आया तो यहां का वर्क कल्चर देख कर मैं दंग रह गया। फिर जब भी आने का मौका मिला तो लगता था कि भिलाई में आते रहना चाहिए। यहां का वर्क  कल्चर तब भी राउरकेला से काफी अलग था। यहां मुझे अफसरशाही नजर नहीं आती थी। सारे सीनियर अफसर बिल्कुल निश्चिंत दिखते थे और जो भी चाहे अपने वरिष्ठ अफसर से मिल सकता था। लेकिन इसके विपरीत राउरकेला में जॉब हायरकी सिस्टम था। वहां वरिष्ठ अफसरों से मिलने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। खैर, तब भिलाई में सेवा का अवसर नहीं मिला। बच्चों की पढ़ाई और उत्कल परिवेश को देखते हुए हम राउरकेला के माहौल में ही रम गए।

0 दुर्गापुर से सीधे भिलाई आने की भूमिका कैसे बनी? क्या पहले से बता दिया गया था आपको? 

00 नौ अक्टूबर 2018 को मैं दुर्गापुर स्टील प्लांट में था। भिलाई की तरह वहां भी अपने दफ्तर में मैनें एक ध्यान केंद्र बनाया हुआ है। भिलाई हादसे की खबर मिली तो मन विचलित हुआ। मैनें अपने साथियों से कहा कि आज ध्यान केंद्र में हम भिलाईवासियों के लिए प्रार्थना करते हैं। हम सब शाम को इक हुए और संकट की इस घड़ी से भिलाई को निकालने और दिवंगत व घायल लोगों के लिए प्रार्थना की। तब तक मुझे भी अंदेशा नहीं था कि अगले दिन क्या होने वाला है। अगले दिन कोलकाता में एक उच्च स्तरीय बैठक में हिस्सा लेने गया। वहां हम लोग दुर्गापुर अलॉय स्टील प्लांट का विनिवेश रोकने और उसे लाभ में लाने विचार मंथन कर रहे थे। इसी बीच अचानक सेल चेयरमैन का संदेश आया। थोड़ी देर के लिए लगा कि क्या करें? फिर लगा कि इस वक्त  सेल में किसी ना किसी को तो आगे आना होगा। फिर मैनें चेयरमैन से पूछ ही लिया कि मुझे ही क्यों..? तो, उन्होंने कहा कि हर कोई तुम्हे सपोर्ट करेगा,सब तुम्हे ही चाहते हैं। इससे मेरा खुद पर भरोसा और मजबूत हुआ। इसके बाद वहीं मेरा विदाई समारोह हो गया। मैनें तुरंत होटल छोड़ा और पास के एक आध्यात्मिक केंद्र गया। वहां संकीर्तन चल रहा था। मैं वहां 45 मिनट तक बैठा और सभी के साथ मिलकर खूब संकीर्तन किया। यहां से मुझे एक आध्यात्मिक शक्ति मिली और उसके बाद मन में कोई शंका नहीं थी।

0 हादसे के ठीक दूसरे दिन भिलाई पहुंचने पर आपके मन में क्या चल रहा था? 

0 उस हलचल भरे माहौल में आपके शुरूआती कदम कौन-कौन से रहे? 

00 इतने भयावह हादसे के बाद जाहिर है, वो दौर बहुत ज्यादा हलचल से भरा था। लगातार जांच कमेटियां आ रही थी। अलग से दिल्ली जवाब भी भेजना होता था। जांच कमेटियों के सामने हम पूरी तरह पारदर्शी रहे। हमनें कुछ भी नहीं छिपाया। मुझे मालूम था कि आप जितना छिपाओगे, उतनी मुश्किल में आओगे और पारदर्शी होने से हम बेहतर परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं। मेरा मानना है कि जब आपके पास ज्यादा समय नहीं है तो आपका थिंकिंग प्रोसेस भी उसके  अनुरूप होना चाहिए। इसके लिए जरूरी था कि मैं अपनी टीम के साथ  कितनी जल्दी हालात को समझ पाऊं। कई बार हम लोग हालात को जानते-जानते महीना लगा देते हैं। लेकिन, भिलाई में ऐसा नहीं हुआ। मुझे मालूम था कि मेरे पास महज सात महीने ही है। ऐसे में मुझे स्टील इंडस्ट्री के अपने 37 साल के अनुभव का सार यहां देना था। मैनें सेफ्टी को प्राथमिकता दी। अपने अधिकारियों से कहा तो तुरंत तीन दिन में  मेनगेट के पास सेफ्टी एक्सीलेंस सेंटर बन कर तैयार हो गया। मैनें अपने लोगों को यह कहा कि बी आनेस्ट और यह भरोसा अपने अंदर होना चाहिए। इसी दिशा में मैनें संवाद सत्र राइजिंग भिलाई की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया। चूंकि इसमें विजुअल कम्यूनिकेशन जरूरी है, इसलिए मैंनें अपने कर्मियों को बुलाकर कहा कि राइजिंग भिलाई विषय पर पेंटिंग चाहता हूं, जिससे लोगों को स्पष्ट दिखे कि मैनेजमेंट की सोच क्या है। हमारे एक कर्मी ने शानदार पेंटिंग बना दी। इसके बाद राइजिंग भिलाई  के अंतर्गत अभिलाषा, नवोदय, टाउनहॉल और अनवरत जैसे संवाद सत्र की पहल हुई, जो अभी मेरे रिटायरमेंट तक जारी है। मैं समूह में अफसरों से विभिन्न सत्र में मिलता हूं। उनसे कंपनी की बातें कम और व्यक्तिगत समस्याओं की ज्यादा बातें करता हूं। इसके बाद उनसे उनका विजन पूछता हूं। इन सत्रों में हम सब खुल कर बातें करते हैं। हमारा एक-एक सत्र औसतन 3-4 घंटे का होता है। भिलाई का मैनपावर तो दुर्गापुर से तीन गुना है। इसलिए यहां दुर्गापुर की तरह मैं नॉन एक्जीक्युटिव के लिए ऐसे संवाद सत्र का आयोजन नहीं कर पाया। कर्मियों के लिए हम लोगों ने कर्म शिरोमणि और पाली शिरोमणि जैसे सम्मान शुरू किए। जिससे कर्मियों का मनोबल ऊंचा हुआ। सेफ्टी को लेकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमीनार भिलाई में करवाए। फिर अकेले मैं ही कहते रहूं तो यह ठीक नहीं,इसलिए हम लोगों ने बाहर से विद्वान वक्ताओं को बुलाना शुरू किया। 

0उत्पादन के क्षेत्र में इन सात महीने में क्या कुछ हासिल कर पाए? 

00 एचआर प्रेक्टिस के अलावा मैनें अपनी टीम के साथ उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया। हमारे कुछ ब्लास्ट फर्नेस बेहद खस्ताहालत में थे। उसे बंद किया गया। इसी दौरान रेलपांत की डिमांड पूरी करने की चुनौती आ गई। इसके लिए बहुत से नीतिगत फैसले लिए गए। पता चला बहुत सारे आपरेटर रिटायर हो गए और यहीं रहते हैं। हमनें कार्पोरेट से मंजूरी लेकर इन रिटायर साथियों को फिर से बुला लिया। फिर इंसेंटिव स्कीम रेल मिल के लिए शुरू की। इसके साथ ही  एसएमएस-2,एसएमएस-3 और रेल मिल में तीन एक्सपर्ट की सेवाएं ली गई। इन सबके चलते मार्च-19 में हम लोग 9.85 लाख टन रेलपांत उत्पादन करने में सफल रहे। हालत यह हो गई कि हमनें रिकार्ड प्रोडक्शन तो कर लिया लेकिन रैक की कमी के चलते रेलवे वाले ले नहीं पाए। इसके बाद जो समय बचा उसमें मैनें नए वित्तीय वर्ष (19-20) की प्लानिंग पर ध्यान दिया। अप्रैल माह में मैनें सिस्टम और प्रोसीजर पर भी ध्यान दिया। इक्विपमेंट मेंटनेंस और कांट्रेक्ट सिस्टम में सुधार पर लांग टर्म स्ट्रेटेजी हम लोगों ने तैयार की। हम लोगों ने विचार किया कि अपने प्लांट की खुबसूरती और गरिमा को कैसे लाएंगे। प्लांट में हाउस कीपिंग को और बेहतर करने पर जोर दिया। वहीं टाउनशिप के लिए भी कुछ सुझाव दिए। अपने एसेट्स को कैसे सहेजें, यह सवाल भी हमारे दिमाग में था। कला मंदिर को नवीनीकृत करने का काम चल रहा था। इसे पूरा करवाया। यह सब सहज होते गया और इसके लिए कोई पूर्व निर्धारित योजना मेरे पास नहीं थी। 

0 आप किस तरह के सीईओ के तौर पर याद करना पसंद करेंगे? 

00 अपने 7 महीने के संक्षिप्त कार्यकाल में जो कुछ भी योगदान दे पाया, उसका मुझे पूरा संतोष है। मुझे मालूम है कि जो दीर्घकालीन योजनाएं मैनें बनाई, उसका परिणाम मेरे जाने के बाद नजर आएगा। इसलिए मैनें यह नहीं सोचा कि लोग मुझे किस तरह के सीईओ के तौर पर याद करेंगे। इतना तो तय है कि सीमित समय में जो बेहतर दे सकता था मैनें देने की कोशिश की। अब यह आने वाला समय बताएगा कि इसमें मैं कितना सफल हो पाया। मैनें अपने जीवन भर में जो भी हासिल किया उसे भिलाई की छोटी सी अवधि में लागू करने में सफल रहा। यहां के 7 माह मेरे लिए 7 साल से ज्यादा का तजुर्बा दे गए। यह पूरी अवधि एक्शन पैक्ड रही। मैनें अपनी पूरी सर्विस में आखिरी में इस 6-7 माह में जो हासिल किया वह मेरी पूरी सेवा का सार है। जो भी मैनें स्टील सेक्टर में सीखा वह सारा का सारा भिलाई में काम आया इसलिए, यह सात महीने मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं। मुझे कम समय मिला, ऐसा कोई असंतोष या अफसोस मुझे नहीं है। बल्कि जो मैं चाहता था उसे दुगुनी ताकत लगाक र पूरा किया। अब इसका मूल्यांकन समय करेगा कि वास्तव में मैं कितना सफल रहा। 

0 अचानक भिलाई की जवाबदारी मिलने से कोई व्यवहारिक दिक्कत नहीं आई? 

0 भिलाई में आपने कोई लक्ष्य तो तय कर रखा होगा? कोई कार्ययोजना तो बनाई होगी? 

00 ऐसा नहीं है। दरअसल मुझे यहां कुछ सोचने-समझने का मौका नही मिला। मुझे जितना समय मिला, मैनें डूब कर काम किया। आपको बताऊं,, जब मैने 2016 मेें सीईओ के तौर पर दुर्गापुर ज्वाइन किया तो मुझे मालूम था 2019 में सेवानिवृत्ति को देखते हुए मुझे यहां तीन साल रहना है। इसलिए मैनें अपनी कार्ययोजना बना ली थी। वहां पहला साल मेरा सीखने का रहा। साल भर सबसे सीखता रहा, कारखाना और वहां का वर्क कल्चर समझते रहा। फिर सब जानने-समझने के बाद जो नीतियां हम लोगों ने तय की, उसे दूसरे साल पूरी आक्रामकता के साथ लागू करने में लगाया। इसके बाद तीसरे साल में मुझे जितने दिन भी वहां रहने का मौका मिला, मैनें तब तक जितनी भी पहल की थी,उसे बरकरार (सस्टेन) रखने पर जोर दिया।  इस बीच भिलाई भेज दिया गया तो मुझे मालूम था कि यहां ऐसा कुछ करने के लिए वक्त नहीं है। यहां तो ऐसी हालत रही कि जिन हालात का आप सामना कर रहे हैं और उन हालात को देखते हुए आपके दिमाग में जो समाधान आया है, बस उसे तुरंत लागू करते चलो। एक छोटी सी बात बताऊं, मुझे लगा कि कर्मियों की सेवानिवृत्ति और बेहतर व गरिमामय ढंग से होनी चाहिए। इसके लिए जवाहर उद्यान में पौधारोपण शुरू करवाया। इस दौरान वहां ताल देखकर लगा कि यहां नारियल के बाग विकसित किए जा सकते हैं। इस पर मेरे कर्मियों ने हां भरी और वहां हर माह सेवानिवृत्ति पर वरिष्ठ कर्मी नारियल के पौधे लगा रहे हैं। आज अभी मैनें ईडी पीएंडए से कुछ पॉलिसी पर डिस्कशन किया। यह सब एक सतत प्रक्रिया है। 

0 भिलाई में कमी क्या देखते हैं? इसे दूर करने आपने क्या किया? 

00 मुझे लगता है कि हमारी जो क्षमता रही है, हम उसके मुताबिक नहीं कर पाए है। दरअसल हमारी क्षमता और हमारी उपलब्धि के बीच एक बड़ी दूरी आ गई है। हमको अपनी वास्तविक क्षमता के स्तर तक पहुंचना है उसके बाद लक्ष्य तो और दूर है, उसे भी हासिल करना है। मैं मानता हूं कि इस कमी को दूर करने बहुत छोटी कोशिश ही कर पाया। क्योंकि मैनें कुछ भी पहले से तय नहीं किया था। जैसा वक्त दुर्गापुर में मुझे मिला, वैसा यहां नहीं मिला। मैनें यहां टाउनहॉल की शुरूआत की। रोज मैं 200 अफसरों से मिलने की कोशिश करता हूं। अब इसका परिणाम क्या निकलेगा, यह तो वक्त बताएगा। इन सारी कोशिशों का एक लाभ मुझे व्यक्तिगत तौर पर मिला। जो मुझे बर्नपुर, दुर्गापुर और राउरकेला में हासिल नहीं हुआ था। वह यह है कि इससे मैं एक परफेक्ट प्रोफेशनल के तौर पर काम कर पाया। मैंनें यह नहीं देखा कि जो कर रहा हूं तो उसमें कौन क्या बोलेंगे। जबकि इसके पहले मेरे दिमाग में हमेशा उलझन रहती थी कि कौन क्या कहेगा। तो एक प्रोफेशनल वाली मैच्योरिटी मेरे अंदर भिलाई में आई। इससे मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ा। 

0 आज पीछे मुड़ कर देखते हैं तो क्या लगता है? 

00 आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं कि सेल में मैनें क्या हासिल किया तो मुझे बहुत सी बातें याद आती है। एक जूनियर इंजीनियर के तौर पर मेरी बुनियाद राउरकेला ने रखी। वहां खूब मेहनत की, डूब कर काम किया। एक जूनियर मैनेजर के रूप में मैनें सिस्टम प्रोसीजर को समझा। फिर इसके बाद मेरी वास्तविक स्ट्रेंथ बर्नपुर में दिखी। वहां आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट को पूरा करना था, नही हो पा रहा है। वहां छह साल अनवरत काम करते रहा। वहां रोजाना 40-50 कांट्रेक्टर को डील करना आम बात थी। इस दौरान 4 साल तो बेहद बेचैनी के रहे। कई बार मैं ठीक से सो भी नहीं पाता था। मैनें अपने काम में मेच्योरिटी का स्तर दुर्गापुर में पाया। क्योंकि इससे पहले तक मैं सिर्फ वक्र्स एरिया में था तो मुझे पर्सनल विभाग की कार्यशैली या मटैरियल फंक्शन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। लेकिन दुर्गापुर में मुझे सभी क्षेत्र का अनुभव हुआ। इसके बाद मैं मानता हूं कि सारे अनुभव हासिल करने पर भिलाई के संक्षिप्त कार्यकाल ने मुझे और ज्यादा गहराई व गंभीरता दी। भिलाई के सेवाकाल में समझ आता है कि आप कितने डीप और कितने समर्पित हैं। क्योंकि यहां तो आपको सिर्फ अपना बेस्ट देना ही है। इस डैप्थ ने मुझे हर तरह के लोगों का सामना करना सिखाया। पहले भी हम लोगों पर दबाव आते थे लेकिन यहां मैनें सब कुछ अपने बलबूते फेस किया। मुझे यह क्षमता भिलाई बिरादरी के कर्मठ कार्मिकों से मिली। 

0 निजीकरण की बढ़ती चुनौती के बीच भिलाई का भविष्य कैसा देखते हैं ?

00 मैं यह मानता हूं कि जब आप लगातार टॉप पर रहते हो तो यह भावना घर कर जाती है कि मैं सबसे बेस्ट हूं और मेरा वर्क कल्चर ही सबसे बढिय़ा है। ऐसी भावना के बीच आपमें गिरावट ( डिटोरियएट)  वाली स्थिति भी आते जाती है। जो अंदर के लोगों को दिखता नहीं और बाहर के लोग बखूबी देख लेते हैं। हम भिलाईवासियों के पास समृद्ध परंपरा है, उस पर गर्व करना है लेकिन हकीकत का भी ध्यान रखना है। हम अगर थोड़ा नीचे आ गए हैं तो हमको खुद के दम से उपर उठना है। इसके लिए दोषारोपण से काम नहीं चलेगा। यहां कोई अवतार नहीं आने वाला। आज भिलाई को मजबूती के साथ संघर्ष करना होगा खुद को पुर्नसृजित (रिएसेट) करने में। आज प्राइवेट सेक्टर सबसे बड़ी चुनौती है। वो लोग वहां बहुत ही एफिशिएंट प्रोसेस से आते हैं। मैं टाटा रिफ्रैक्ट्री और मेटल जंक्शन जैसी निजी कंपनी के बोर्ड में हूं। मैं जानता हूं कि वो लोग काफी टफ प्रोसेस से आते हैं। आज इसलिए ही कहा जा रहा है कि जिंदल अब टाटा से भी आगे निकलने की तैयारी में है। वैसे, टाटा में थोड़ा पब्लिक सेक्टर जैसा परिवेश भी है। खैर, इन चुनौतियों के बावजूद हमें बेहतर करना है। मैंनें तो उसी सिस्टम में अंदर में रह कर कुछ बदलाव करने की कोशिश की है। इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि यह अकेले भिलाई के लिए ही चुनौती नहीं बल्कि समूचे सेल के लिए भी है। आज स्टील सेक्टर का पूरा परिवेश ही बदल रहा है। आज भी हम सोचेंगे कि ऐसे ही रहेंगे तो हमारा कुछ नहीं हो पाएगा। स्टील सेक्टर में अगले 2-3 साल में बहुत कुछ होने वाला है। जिससे भिलाई ही नहीं समूचा सेल भी प्रभावित होगा। 

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”वोल्गा से शिवनाथ तक ”को सराहा रथ ने 



लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन ने अपनी कृति ”वोल्गा से शिवनाथ तक” की प्रति भिलाई स्टील प्लांट के सीईओ अरूण कुमार रथ को भेंट की। भिलाई स्टील प्लांट के निर्माण में तत्कालीन सोवियत संघ के योगदान पर केंद्रित इस किताब की विषयवस्तु को रथ ने बेहद रोचक बताया। उन्होंने इस पुस्तक के लेखन में लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण तथ्य जुटाना बहुत ही धीरज और समर्पण का काम है। उन्होंने इच्छा जताई कि इसकी प्रतियां वे भिलाई के कुछ भूतपूर्व वरिष्ठ अफसरों को स्वयं देंगे। 

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