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एक छात्र नेता जिसने यूं ही पत्रकारिता में कदम रखा लेकिन ये पत्रकारिता ही आज उनकी पहचान बन गई है… छत्तीसगढ़ के पत्रकार शंकर पांडे कि कहानी.तृप्ती सोनी के जब़ानी .

.जिसने इतिहास के आईने में छत्तीसगढ़ परोसा….एक मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की अधिकारिक प्रेस ब्रीफिंग करके सुर्खियों में आए….और अब बस….जी नहीं, ये तो उनके लेख की समाप्ति का सार वाक्य है…लेकिन यहां से तो कहानी शुरू होती है…ये कहानी उस पत्रकार की है…जिन्होंने छत्तीसगढ़ में लगभग 4 दशक की पत्रकारिता करके अपना लोहा मनवाया है….

नाम- शंकर पांडे
उम्र- 59 साल
पत्रकारिता में अनुभव 39 साल

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यूँ हुआ पत्रकारिता में पदार्पण

5 भाई-बहनों में चौथे, शंकर पांडे जी का जन्म 20 जून 1960 को राजिम के फिंगेश्वर में हुआ…पिता जगन्नाथ प्रसाद पांडे सरकारी नौकरी में थे…माता महाराष्ट्र से आईं थी, गृहणी थीं…शंकर पांडे जी ने रायपुर जिले में ही रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की….बॉयोलॉजी में मैट्रिक करने के बाद साइंस कॉलेज में उन्होंने बीएससी किया…साइंस कॉलेज में शंकर पांडे जी छात्र नेता के तौर पर उभरे…उनकी ज्यादातर रुचि सांस्कृति गतिविधियों में रही जो आज भी है….कॉलेज पास किया तो घर की जिम्मेदारी का भान हुआ…सोचा नौकरी कर ली जाए….फिर 1979 में यानि कि 19 बरस की उम्र में ही बड़े भाई समान इनायत अली के कहने पर शाम के दैनिक समाचार पत्र रायपुर समीक्षक से पत्रकारिता की शुरुआत की…फिर बबन प्रसाद मिश्र के साथ युगधर्म में काम किया…इस दौरान सांध्य दैनिक अखबार तरुण छत्तीसगढ़ में कौशल किशोर मिश्र के साथ भी रहे…पत्रकारिता करते हुए ही शंकर पांडे जी ने बीजे और एलएलबी की भी पढ़ाई की…तरुण छत्तीसगढ़ से नवभास्कर और फिर अमृत संदेश के बाद दैनिक समवेत शिखर में समाचार संपादक का जिम्मा शंकर पांडे जी ने संभाला है….

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जब हुई थी इंदिरा गांधी की हत्या…

31 अक्टूबर 1984, इंदिरा गांधी की हत्या हो गई…पूरे देश में कर्फ्यू लग गया…आंच रायपुर में भी कम नहीं थी…उस समय शंकर पांडे जी युगधर्म में थे…युगधर्म का कार्यालय सिक्खों के इलाके में था….शंकर पांडे जी याद करते हुए बताते हैं कि वो समय ऐसा था कि उन्हें और उनके सहयोगियों को रात अखबार के कार्यालय में बितानी पड़ती थी…खाने-पीने की भी दिक्कत होती थी…वे बताते हैं कि उस समय वे अपने साथ दो पास लेकर चलते थे…कई बार पुलिस वाले पास फाड़ देथे थे तो दूसरा पास दिखाना पड़ता था…कर्फ्यू को लेकर शंकर पांडे जी ने खूब रिपोर्टिंग की…वे याद करते हुए बताते हैं कि एक बार इंदिरा गांधी कोरबा दौरे पर आईं थी तो उन्हें इंदिरा गांधी से मिलने का अवसर मिला और ये मुलाकात काफी अच्छी थी…

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प्रांतीय चीफ बनने का रोचक किस्सा

शंकर पांडे जी ने तरुण छत्तीसगढ़ के बाद रम्मू श्रीवास्तव जी के कहने पर भास्कर ज्वाइन किया…उस समय वो अखबार नवभास्कर कहलाता था…वहां एक मोहतरमा ने उन्हें एक साथ कई जिलों की खबरें बनाने को दे दी…और कहा कि हेडिंग मत लगाइएगा…इतने में रम्मू श्रीवास्तव जी आए…उन्होंने मैडम को चैंबर में बुलाया….थोड़ी देर बाद आदेश हुआ कि वे प्रांतीय चीफ हो गए हैं….मतला ये रहा कि रम्मू श्रीवास्तव जी जानते थे कि शंकर पांडे जी की लेखनी और अनुभव किस कद की है….बाद में शंकर पांडे जी ने उन मैडम को खबरें बनाने को दी और हेडिंग भी लगाने को कहा….भास्कर में शंकर पांडे जी एक साल रहे और फिर समवेत शिखर चले गए…वे बताते हैं कि उस जमाने में समवेत शिखर मध्यप्रदेश का पहला रंगीन अखबार हुआ करता था…शंकर पांडे जी ने समवेत शिखर में समाचार संपादक को तौर पर काम किया…फिर उन्हें छत्तीसगढ़ को और करीब से जानने की इच्छा हुई….फिर उन्होंने देखा एक आईना….वे बताते हैं कि राजनारायण मिश्रा की प्रेरणा से कॉलम शुरू किया इतिहास के आईने में छत्तीसगढ़, जिसमें रायपुर के ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ी कहानियां, मिथ और किवदंतियों का संग्रह हुआ करता था…शंकर पांडे जी का ये कॉलम बड़ा चर्चित हुआ…कॉलम से किताब बनने की कहानी भी बड़ी रोचक है…खैर, रम्मू श्रीवास्तव के कहने पर शंकर पांडे जी ने हरिभूमि ज्वाइन किया…उस वक्त हरिभूमि बिलासपुर से निकला करता था…ब्यूरो चीफ के तौर पर शंकर पांडे जी ने काम किया…हरिभूमि का रायपुर अखबार निकला तो वहां भी शंकर पांडे जी ने काम किया…

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ऐसे बढ़ा पत्रकारिता का सफर

राज्य बनने के बाद शंकर पांडे जी ने 2003 में रायपुर से सांध्य दैनिक सुराज अखबार निकाला…इस अखबार का कार्यालय था रवि भवन में सबसे महंगा ऑफिस….वे बताते हैं कि छोटे अखबार निकालने में थोड़ी परेशानी होती है लेकिन उन्होंने अपने अखबार को एक अच्छी प्रतिष्ठा दिलाई…सांध्य दैनिक सुराज में काम करते-करते शंकर पांडे जी ने एम चैनल में प्रधान संपादक के तौर पर 5 साल काम किया…वे बताते हैं कि दिनभर अखबार में काम करने के बाद वे एम चैनल जाकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का काम संभाला करते थे….एम चैनल में रहने के दौरान उन्हें राज्य की राजनीति से जुड़ी बहुत सी खबरें प्रकाश में लाई साथ ही कई राजनेताओं के एक्स्लूसिव इंटरव्यू भी किए…शंकर पांडे जी बताते हैं कि उनके ब्यूरोक्रेट्स और राजनेताओं से अच्छे संबंध रहे….खबरों की तह तक जाना उनका पत्रकारीय गुण रहा है…एक खबर के बारे में बताते वो कहते हैं कि उन्होंने गांजे का खेल एक्सपोज किया था…पुलिस गांजा तस्करों को गिरफ्तार करती थी, बड़ी मात्रा में गांजा बरामद किया जाता था लेकिन बाद में पुलिस का बयान आता था कि गांजे को चूहे ने खा लिया…इसी तर्क के सहारे गांजे की रोलिंग चलती रहती थी, जिसे उन्होंने एक्सपोज किया….जेल पर भी उन्होंने खूब खबरें की, पंजाब के आंतकवादी को रायपुर सेंट्रल जेल में लाया गया…गुरुचरण सिंह टोरा को जेल में मिलने वाले स्पेशल ट्रीटमेंट पर उन्होंने सिलसिलेवार रिपोर्टिंग की…वे याद करते बताते हैं कि पहली बार सेंट्रल जेल में जब गैस से खाना बनना शुरू हुआ तो उन्होंने स्टोरी छापी सौ साल बाद बुझी जेल की आग…ये बड़ी खबर इसलिए क्योंकि रेल की आग, जेल की आग और मणिकर्णिका की आग कभी नहीं बुझती….अलीगढ़ से जेल का ताला बनकर आता था, हर 6 महीने में ताला बदल दिया जाता था, शंकर पांडे जी ने स्टोरी लगाई…2000 लोगों को अपने बीच कैद रखने वाला ताला 6 महीने बाद गुमनामी में चला जाता था…तो तथ्यों, तर्को और आंकड़ो से खेलने वाले पत्रकार के रुप में आज भी शंकर पांडे पहचाने जाते हैं….

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जब दिग्विजय सिंह के लिए की प्रेस ब्रीफिंग

जी हां, राज्य बनने के बाद पहली बार दिग्विजय सिंह नांदगांव के दौरे पर पंहुचे…उन्हें छत्तीसगढ़ी समझ नहीं आती थी…तो उन्होंने तात्कालीन मुख्य सचिव और एकमात्र पत्रकार शंकर पांडे जी को अपने साथ हेलीकाप्टर में दौरे पर लेकर गए…दौरे के बाद दिग्विजय सिंह को जल्दी भोपाल जाना था….

ऐसे में उन्होंने शंकर पांडे जी को कहा कि वे उनके बदले प्रेस को उनके कार्यक्रम की जानकारी दें….शंकर पांडे जी इस वाक्ये से भी खूब सूर्खियों में रहे….उस दौरे के बारे में शंकर पांडे जी याद करते हुए बताते हैं कि दिग्विजय सिंह जब नांदगांव पंहुचे तो एक फोटोग्राफर ने शंकर पांडे जी से पूछा कि मुख्यमंत्री की फोटो लेनी है…कितने पैसे देने पड़ेंगे….ये चौंकाने वाली बात थी…शंकर पांडे जी ने दिग्विजय सिंह को ये बात बताई, जिसके बाद दिग्विजय सिंह ने उस फोटोग्राफर को बुलाया और फोटो खींचवा कर पूरी रील खाली करवा दी….इस घटना के उन्होंने ये भी भांपा कि नेता इस इलाके में कैसी मनमर्जी कर रहे हैं…

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बस्तर से करीबी

शंकर पांडे जी ने बस्तर को बहुत करीब से देखा है और बस्तर पर खूब लिखा भी है…वे बताते हैं कि अमेरिका में महिलाओं की डिलवरी के लिए करोड़ो रुपए खर्च करके चेंबर बनाया जाता है ताकि जच्चा-बच्चा सुरक्षित रहे….उसी चेंबर की तकनीक बरसों पहले बस्तर ने विकसित कर ली थी…अबूझमाड़ में बरसों से ये प्रथा चालू है…लकड़ी के पाटे से झूला बनाया जाता है….जिसमें प्रसव कराया जाता है…शंकर पांडे जी ने खबर लगाई कि बस्तर की प्रसव पद्धति को अमेरिका ने अपनाया…लोग बस्तर को पिछड़ा बोलते हैं इस मिथ को तोड़ने के लिए कई ऐसी खबरें शंकर पांडे जी ने की, जिसने आधुनिक चकाचौंध को आईना दिखाया… वे बताते हैं कि 1964 के आसपास एक जापानी प्रतिनिधमंडल बैलाडीला का पहाड़ देखने आया, उनका कहना था कि इनमें से एक भी पहाड़ी अगर जापान में होती तो हम दूसरा विश्वयुद्ध नहीं हारते…नक्सलवाद को भी समझा और लिखा है शंकर पांडे जी ने…

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जब विद्याचरण शुक्ल का किया बहिष्कार

बुढ़ापारा में शिवाजी महाराज की प्रतिमा स्थापना होनी थी…जिसका भूमिपूजन तत्कालीन केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने किया था। कवरेज के लिए तमाम पत्रकार मौजूद थे…उस वक्त न जाने किस संदर्भ में विद्याचरण शुक्ल ने कह दिया कि रायपुर के पत्रकार खबरों में नमक मिर्च लगाकर उसे सत्यकथा जैसे प्रकाशित करते हैं। यह बात स्थानीय पत्रकारों को नागवार गूजरी और प्रेस क्लब में निर्णय लिया गया कि किसी भी रिपोर्ट या समाचार में विद्याचरण शुक्ला का नाम नहीं छापा जाएगा। करीब 9 महीने शुक्ल का नाम अखबारों में प्रकाशित नहीं होता था। खबरों में महासमुंद के सांसद या पूर्व मंत्री ही लिखा जाता था….बाद में विद्याचरण शुक्ल ने अपने कहे के लिए माफी मांगी। इस मामले में शंकर पांडे जी की भूमिका प्रमुख रही थी। एक बार तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के माना प्रवास कार्यक्रम के दौरान प्रशासन की अव्यवस्था का पत्रकारों ने बहिष्कार किया था। उस समय शंकर पांडे प्रेस क्लब के महासचिव थे।

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बकरी की मौत और समारू का सिरदर्द

खबर के प्रति कौतुहल कैसा होना चाहिए ये बताते हैं शंकर पांडे जी….एक खबर का जिक्र वो करते हैं कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय जनसंपर्क विभाग में समारू सोनकर नाम का एक बाबू काम करता था। बड़ा परिवार होने के कारण वह आफिस जाने के पहले और लौटने के बाद एक ठेला लगाकर आलू-प्याज भी बेचा करता था। एक बार जब वह आलू प्याज बेच रहा था तब एक बकरी कहीं से आ गई और आलू में मुंह मार दिया न जाने क्यों उसे भगाने के लिए समारू ने लाठी चला दी और बकरी भाग गई। बदकिस्मती से बकरी की मालकीन दूसरे संप्रदाय की थी बाद में बकरी का गर्भपात हो गया है और समारू को पुलिस ने पकड़ लिया। किसी तरह समारू की जमानत हुई। बाद में जब यह जानकारी शंकर पांडे को दी गई तो उन्होंने तत्कालीन थाना प्रभारी से समारू को मदद करने का अनुरोध किया। थाना प्रभारी ने बताया कि अब मामला और बिगड़ गया है अब तो उस बकरी की मौत हो गई है और पोस्टमार्टम में उसके पेट के अंदरूनी भाग में डंडे का निशान पाया गया है। अब तो डंडा जप्त करना पड़ेगा। बाद में समारू इस मामले में दोषमुक्त हुए पर शंकर पांडे ने यह खबर बकरी की मौत और समारू का सिरदर्द नामक शीर्षक छापकर काफी चर्चा में रहे।

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छत्तीसगढ़ी में बाईबिल

तब के समय में वरिष्ठ पत्रकार किस तरह नये पत्रकारों का उत्साहवर्धन करते थे इसका उदाहरण देते हुए शंकर पांडे ने बताया कि जब वे अपनी ससुराल मुंगेली से बस से लौट रहे थे तो बगल में एक पादरी भी बैठे थे उन्होंने बातों-बातों में बताया कि वे छत्तीसगढ़ी में बाईबिल का अनुवाद कर रहे हैं। उनसे चर्चा कर शंकर पांडे ने वह खबर अमृत संदेश में अपने नाम से प्रकाशित की थी तब वरिष्ठ पत्रकार मधुकर खेर ने उनसे इस खबर के संबंध में चर्चा की और इस खबर को राष्ट्रीय स्तर पर कई समाचार पत्रों में प्रकाशित भी कराया तथा खबर के लिए शंकर पांडे को बधाई भी दी थी। वे कहते हैं कि अब ऐसे वरिष्ठ पत्रकारों का अकाल सा हो गया है। बहरहाल, 2005 में अचानक शंकर पांडे जी की तबीयत खराब हुई…4 महीने वे बिस्तर पर रहे….इस दौरान उन्होंने अपनी कलम उठाई और छत्तीसगढ़ के आईने में कॉलम को किताब का रुप दिया…उन्होंने पुस्तकें लिखी… इतिहास के आईने में छत्तीसगढ़…छत्तीसगढ़ के राजवंश, छत्तीसगढ़ के पुरातन पुरोधा और छत्तीसगढ़ की राजनीति विशेष बात ये है की उनकी पुस्तकें इतिहास के आईने में छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ के पुरातन पुरोधा का चयन छत्तीसगढ़ के सभी मीडिल और हाई स्कूल के पुस्तकालयों के लिए किया गया और पुस्तकों की खरीदी की गई…

वे कहते हैं तथ्य और कथ्य के बीच लिखी गई यह चिरंतन धरोहर सौंपकर मैं सुख और संतोष का अनुभव कर रहा हूं। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ का कुछ तो चित्रण करने में सफल होगी। तो ऐसे पत्रकार हैं शंकर पांडे जो आज की पीढ़ी के पत्रकारों के लिए आदर्श हैं….

तृप्ति सोनी , प्रतिष्ठान न्यूज़ चैनल में एंकर और छत्तीसगढ़ लोक कला तथा पत्रकारों पर फीचर लेख. राजकुमार सोनी, रमैश नैयर और अब शंकर पांडेय पर लेख.

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