कला साहित्य एवं संस्कृति

ईद मिलादुन्नबी ःः भारत के सुन्नी “वाक़ई” उम्मते मोहम्मदी हैं……? ज़ुलैख़ जबीं

21.11.2018

इस्लामी महीना रबीउल अव्वल शुरू हो चुका है. इस्लामी लेहाज़ से इस महीने में अल्लाह के आख़िरी नबी रसूल (सअव) की पैदाइश और वफ़ात (मौत) दोनों हुई है. इसी के बारहवें दिन रसूले ख़ुदा (सअव) की यौमे पैदाइश हुई है जिसे ईद मिलादुन्नबी कहा जाता है. दुनिया भर के तमाम मुसलमान (सुन्नी) इस पूरे महीने को बड़े एहतराम और धूमधाम से अलग अलग तरह सेलिब्रेट करते रहे हैं. हिन्दोस्तान ही एक ऐसा मुल्क है जहां के मुसलमान “ईद मिलादुन्नबी” का जश्न बहोत ही भोंडे, अमानवीय और ग़ैर इस्लामी तरीक़े से मनाने लगे हैं.

चूंकि ईद मिलादुन्नबी के जश्न का सीधा ताल्लुक़ नबी (सअव) की पैदाइश की ख़ुशी से है इसलिए ख़ुद नबी (सअव) के दिखाए गए रास्तों, बताए गए कामों और दी गई सख़्त नसीहतों पर अमल करने वाले ही सही मायनों में इस जश्न में शामिल होने के हक़दार हो सकते हैं
आईये देखते हैं अल्लाह के इस रसूल (सअव) ने अपनी उम्मत (सुन्नी) को क्या क्या हुक्म दिये हैं-?

10 वीं हिजरी में अपने आख़िरी हज (हज्जे अकबर के दौरान ) के मौक़े पर वहां मौजूद तमाम मुसलमानों को मुख़ातिब (सम्बोधित) करते हुए अल्लाह के रसूल ने कुछ (बातें) एलान किये थे, जिसे “आख़िरी ख़ुत्बा” के नाम से जाना जाता है इसे इस्लाम का निचोड़ भी कहा जा सकता है. अपनी बात शुरू करते हुए आप (सअव) ने फ़रमाया–
“ऐ लोगों, ग़ौर से सुनो, उसको, जो कुछ मैं कहूँ- के आईन्दा बरस तुमसे मुलाक़ात का मौक़ा न आ सके.
ऐ इंसानों, तुम्हारा ख़ुदा एक है और सभी ईमान वाले आपस में भाई भाई हैं- तो जब तुम्हारा कोई भाई, अगर तुम्हारे पास अपनी कोई चीज़ अमानत के तौर पर पे रखे, तो उसमे से कुछ भी उसकी मर्ज़ी के बग़ैर हरगिज़ न इस्तेमाल करना.

ऐ मुसलमानों, अल्लाह की किताब और उसके रसूल (सअव) की सुन्नत को मज़बूती से थामे रखोगे तो कभी गुमराही में न पड़ोगे.

ऐ भाईयों, तमाम इंसानों की इज़्ज़त और जान-माल की हिफ़ाज़त रखना, न तुम दुनियां में इंसानों पर ज़ुल्म करना न क़यामत में तुम्हारे साथ ज़ुल्म किया जाएगा.
आप (सअव) ने ऐलान जारी रखते हुए आगे कहा कि—
दौरे जेहालत (अज्ञानता काल) के सारे अनैतिक, नियम और क़ानून ख़त्म किये जाते हैं.

इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून मुआफ़ कर दिए गए (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं है) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान (राबिया इब्ने हारिस) का ख़ून मुआफ करता हूँ.

आज और अभी से हर तरह का ब्याज हराम ठहराया जाता है, सिवाय पूंजी वापसी के.

इस्लाम से पहले के सभी ब्याज मुआफ़ किये जाते हैं. सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से (अब्बास इब्ने मुत्तलिब का) ब्याज मुआफ़ करता हूं.
अपना ख़ुत्बा जारी रखते हुए आप कहते हैं- औरतों के मामले में अल्लाह का डर रखो.
उनके साथ हुस्ने सुलूक (अच्छे बर्ताव) से हाथ न खींचो.
तुम्हारा, तुम्हारी औरतों पर और तुम्हारी औरतों का तुम पर हक़ है.

औरतों के मामले में तुम्हें “वसीयत” की जाती है के उनके साथ “भलाई का रवैय्या” अपनाओ.
तुम्हारे ग़ुलामों के मामले में तुम्हें “हुक्म” दिया जाता है-के जो कुछ ख़ुद खाओ-वही ग़ुलामों को खिलाओ, जो ख़ुद पहनो-वही अपने ग़ुलामों को भी पहनाओ.
इस्लाम में न तो किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर, कोई बड़ाई दी गई है और न किसी ग़ैर अरबी को किसी अरबी पर. न गोरे को काले पे बड़ाई दी गई है और न काले को गोरे पे.

बड़ाई अगर किसी को है तो उस को, जो तक़वा व परहेज़गारी का व्यवहार अपनाने में दूसरों से आगे है.
रंग, नस्ल, मुल्क और ख़ानदान (वंश ) की वजह से इस्लाम किसी इंसान को दूसरों से बेहतर नहीं मानता, बल्कि उसे बेहतर मानता हैं-जिसके आमाल (व्यवहार)नेक हैं.
ख़िताब पूरा करने के बाद आप (सअव) ने मौजूद मजमे (जनसमुदाय ) से पूछा- ऐ लोगों, क्या मैंने अल्लाह का पैग़ाम तुम तक पहुंचा दिया? इस पर मजमे ने एक आवाज़ से जवाब दिया- “हाँ रसूले ख़ुदा” तब आप (सअव) ने तीन बार कहा “ऐ अल्लाह तू गवाह रहना”. (उसके बाद क़ुरआन की आख़िरी आयत नाज़िल हुई- “आज मैंने तुम्हारे दीन को पूरा कर दिया. तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दी है और तुम्हारे लिए इस्लाम को पसंद कर लिया”. क़ुरआन- 5:3 )

भारत के (मर्द) मुसलमानों का जश्ने ईद मिलादुन्नबी (भव्य) जुलुस हर बरस की तरह इस बार भी
(डीजे की तेज़ कानफाड़ू शोर सहित) गांव शहरों की गलियों और सड़कों में ठाठे मार रहा है. इस जश्न की ख़ातिर मस्जिदें दुल्हन की तरह सजाई गयी हैं गली मोहल्ले सड़कें रंगीन झंडियों और क़ुमक़ुमी रंगीन झालरों से जगमगाते हर तरफ़ नज़र आ रहे हैं. अगर पिछले दो दशकों पे ग़ौर किया जाए तो हर बरस यौमे पैदाइश जुलुस/ जलसों का तामझाम ज़्यादा से ज़्यादा दिखावों में बदलने लगा है-ये कहना ग़लत न होगा कि ʺपरंपरागत तौरʼʼ पे अब ईद मिलादुन्नबी का शालीन जश्न ʺहिंसक ज़िदʼʼ की तरह दिखाई पड़ने लगा है जिसका ग्राफ़ हर बरस बढ़ता ही जा रहा है-

बड़े पैमाने पे की जा रही तैयारियां, शहर भर को सजाने के लिए झंडियां, बैनर्स, झालरें, आतिशबाज़ियां, रौशनियां और इस दिन के लिए दौड़ने वाली गाड़ियां और दूसरे कई तरह के इन्तेज़ामात के लिए पानी की तरह रूपया भी ख़ूबबहाया जाता है. इतने आला दर्जे के इन्तेज़ामात को देखकर तो कहीं से नहीं लगता कि मुल्क का मुसलमान ग़रीब, पिछड़ा और ख़स्ताहाल है. हर उस जगह जहां मुस्लिम हैं जश्न मनाने के लिए बजट बनाया जाता है औरफिर इलाक़े के मुसलमानों से वसूला जाता है.ये वो दर्द है जो बाहर से नज़र नहीं आता.

ये सब जानते हैं कि ज़्यादातर मुसलमान मोहल्ले, बस्तियों में रहते हैं. ये बताने की ज़रूरत नहीं कि उनका रोज़गार भी छोटा मोटा, रोज़ कमाने, रोज़ खाने जैसा होता है. इनमें ज़्यादातर मज़दूर होते हैं वो भी असंगठित क्षेत्र के. अतः रोज़ी भी कोई हज़ारों रूपए दिहाड़ी की नहीं होती. मोटर मेकैनिक] ऑटो चालक, सायकिल रिक्शा चालक, चाय पान की गुमटी लगाना, रेहड़ियां लगाना] सब्ज़ी का ठेला लगाना, हाथ ठेला खींचना या फिर कपड़े या अन्य सामानों की फेरी लगाने जैसे रोज़गार से कितनी आमदनी हो सकती है\ उसपर सुरसा के खुले मुंह सी बढ़ती महंगाई. कमाने को सिर्फ़ दो हाथ खाने वाले कई पेट. गुनाह में भागीदारी के डर से ऐसी ग़ैर इस्लामी रवायत को बेबस ग़रीब मुसलमान ढ़ोने के लिए मजबूर हैं–

हर बरस के दर्ज़नों दिनों के ^^जश्न मनाने के रिवाज़ का अगर मोटा मोटी हिसाब लगाया जाए तो मुल्क भर में अरबों रूपए इलेक्ट्रीशियन, टेंट वालों, फ्लैक्स से झंडे, बैनर बनाने वालों डीजे और टैक्सियां चलाने वालों पर ख़र्च किये जाते हैं. अगर इसका पांचवां या छठा हिस्सा भी इस्लामी तौर तरीक़ों को नज़र में रखते हुए ख़र्च किया जाए ¼जिसकी मिसाल अल्लाह के रसूल सअव अपनी ज़िन्दगी में मय सहाबा और सहाबियों के क़ायम कर गए हैं½ तो एक भी मुसलमान ग़रीब ] बीमार ]अशिक्षित ]बेरोज़गार ]पिछड़ा ] नशेड़ी ]अपराधी बन ही नहीं सकता..

जो इस्लाम- इंसानी समाज से ग़ैरबराबरी, बेइन्साफ़ी, ग़ैरइंसानी ¼अमानवीय) ज़ुल्म&ज़्यादतियों ¼उत्पीड़न अत्याचार) बूढ़ों, बच्चों, औरतों, ग़ुलामों के साथ शोषण के ख़िलाफ़ रणनीतिक योजना के तहत 1500 बरस पहले एक किताब(क़ुरआन) की शक्ल में लिखित आदेश की तरह आया. जिस नीति से समाजी ज़िन्दगी जीने के तौर तरीक़े और दिक़्क़तों से उबरने के लिए, मौजूदा व्यवस्था के तहत फ़ैसले लेकर, नीतियां बनाकर, समाज में सुकून, अमन, चैन और सभी को बराबर से इन्साफ़ देने की मंशा के तहत] यह मानते हुए कि इंसान सामाजिक प्राणी है] विविधताओं वाले समाज में आपसी मोहब्बत ]ख़ुलूस ] इख़लाक़ ] रहमदिली, हमदर्दी के साथ किस तरह रहा जाए, इस तरीक़े का किरदार लेकर एक मुसलमान की ज़िन्दगी का ख़ाका तैयार किया गया हो & उस मज़हब की छीछालेदर उसके मानने वालों ने ही कर रखी है.

ग़ौरतलब है कि मिलादुन्नबी के निकाले जाने वाले जुलूस में एक ख़ास मर्दाना हुलिये में, निश्चित ड्रेसकोड में ] कलफ़ लगे कपड़ों की तरह अकड़ कर चलते मर्दों के हुजूम में कितने ऐसे होंगे जो ख़ुद को सुन्नी कहाने में फ़ख़्र महसूस करते हैं मगर अपने रसूल सअव की एक भी सुन्नत पे ज़र्रा बराबर भी अमल नहीं करते. उस जुलूस में ज़्यादातर ऐसे मर्द होंगे जो शराब ] गुटखा या दूसरे कई तरह के नशे के आदी होंगे और बेशर्मी से सड़कों पे पीक उड़ाते नज़र आएंगे. ब्याज और सूद का धंधा करके] रिश्वतें खाकर अपनी बिल्डिंगें खड़ी किए हुए कई मर्द उस जुलूस में नज़र आएंगे ¼जबकि क़ुरआन और अल्लाह के रसूल ने सीधे इसे/ऐसे रोज़गार की कमाई को हरामकारी क़रार दिया है ½

 

क़ाबिले ग़ौर बात ये भी है कि उस जुलूस में शायद ही कोई मर्द ऐसा होगा जिसका पहला निकाह अपने उम्र से बड़ी किसी ग़रीब की कम ख़ूबसूरत बेवा या तलाक़ शुदा बेटी से किया गया हो.

उस जुलूस में शायद ही कोई ऐसा मर्द हो जिसने अपनी बहन और बेटियों को जायदाद में उनका हिस्सा दिया/ दिलवाया हो,

शायद ही कोई ऐसा मर्द उस जुलूस में होगा जिसने अपनी पहली बीवी की मौत के बाद दूसरी शादी किसी उम्रदराज़ या बच्चों वाली, तलाक़शुदा या बेवा से की होगी-
यहाँ ऐसे बहुत मर्द मिल जायेंगे जो बग़ैर किसी जायज़ वजह के ¼जो क़ुरआन में बताई गई है½ कई औरतों से शादी रचाए होंगे या बग़ैर निकाह के किसी औरत से जिस्मानी रिश्ता क़ायम किये होंगे ¼जो खुलेआम मौजूदा निकाही बीवी के हुक़ूक़ छीन रहे होंगे½
उस जुलूस में शायद ही कोई मर्द ऐसा होगा जो अपनी या अपने बेटों की शादी किसी ग़रीब की लड़की से बग़ैर दहेज लिए किया हो-

शायद ही कोई ऐसा मर्द उस जुलुस में होगा, जिसने अपने घर के चारों तरफ़ के 160 पड़ौसी घरों के लोगों की परवाह कर रहा हो- और जिसके पड़ौस में बीमार परेशान कई वक़्तों का फ़ाक़ा ¼भूखे पेट½ करने वाले] ग़रीबी के एवज़ जो अपने अज़ीज़ों का इलाज न करवा पा रहे हों] अपने बच्चो को अच्छी तालीम न दिलवा पा रहे हों] दहेज़ न जुटा पाने की वजह से जवान बेटी का निकाह न पढ़वा पा रहे हों] तलाक़शुदा बेटी को उसका जायज़ हक़ न दिलवा पाने की बेचारगी में ज़िंदा न हों-

उस जुलूस में शायद ही कोई मर्द ऐसा होगा जिसने अपनी बीवी की पिटाई न की हो या उसके साथ माँ, बहन की गालियों से न पेश आया हो]

उस जुलुस में शायद ही कोई मर्द ऐसा हो जिसने अपनी बीवी की मर्ज़ी के बग़ैर या उसके माहवारी के दिनों में, ज़बरदस्ती जिस्मानी रिश्ता क़ायम न किया हो-
उस जुलूस में शायद ही कोई मर्द ऐसा हो जो सर पे टोपी और चेहरे पे दाढ़ी रखी होने के बावजूद सड़क से गुज़रती पर्दा नशीन खवातीनों के जिस्म का अपनी आँखों से पोस्टमार्टम न किया हो-

उस जुलुस में शायद ही कोई मर्द ऐसा हो जो अपने ख़ुद के बच्चे को दूध पिलाने पर माँ ¼अपनी बीवी) को खुशी से तोहफ़े या सौग़ात दिया करता हो—
ये सब वे सुबूत हैं जो एक मुसलमान मर्द पे फ़र्ज़ और वाजिब दोनों हैं. जिसका पालन रसूल सअव ने अपनी ज़िन्दगी में हर रोज़ किया है- यही नहीं सहाबियों और उस दौर के आशिक़े रसूल ने भी ख़ुद पे इन नियमों को आदत बना लिया और अपनी अगली पीढ़ियों में इसे ट्रांसफ़र किया—

लेकिन आज हिन्दोस्तानी मुस्लिम समाज में ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा है- जो दिखाई दे रहा है वो बेहद डरावना और ख़तरनाक है— मुसलमानों ने अपनी तो क्या ग़ैर औरतों की भी इज़्ज़त करना छोड़ दिया है- मर्दों की तो छोड़िये- नाबालिग बेटे हैवानों की तरह छोटी बच्चियों @औरतों का बेरहमी से बलात्कार करते हैं, उन्हें जान से मार डालते हैं- अगर कोई क़ानून की गिरफ्त में आता भी है तो नाबालिग होने की आड़ में छूट जाता है- मगर मुस्लिम मआशरा ¼समाज) इस तरफ से अपनी जुबां और आँखें मूँद लेता है-

मन मुआफ़िक़ दहेज़ न ला पाने के एवज़ बहुओं की पिटाई की जा रही है उन्हें घर से बेघर किया जा रहा है— यहाँ तक की उन्हें ज़िंदा जला दिया जा रहा है- बेटियों और बहुओं के साथ घरेलु हिंसा के ऐसे ऐसे कारनामे अंजाम दिए जा रहे हैं कि सुनकर रूह कांप जाए— बग़ैर किसी गंभीर वजह के, बग़ैर औरत को बताये, उसकी मंजूरी के बग़ैर एक ही बार में तीन तलाक़ कह कर, ज़लील करके औरतों को घर से निकाल दिया जा रहा है] पारिवारिक मसलों के निपटारे के नाम पे बनी शरई अदालतें बग़ैर तफ़्सील जाने ] बग़ैर ये तफ़्तीश किये कि तलाक़ की असली वजह क्या है\ एकतरफ़ा शौहर के बताये हुए पे यक़ीन करके] तलाक़नामे पर दस्तख़त की, मुहर ठोंकते हुए अपनी शरई ज़िम्मेदारियों से हाथ झाड़ते हर कहीं दिखाई दे रहे हैं.

आज भी अब जबकि ख़ुद को “सुन्नी” समझने / कहाने वाले – (मर्द)जश्ने पैदाइश मना रहे हैं तो क्या उन हज़ारों करोड़ों की भीड़ में कोई एक भी ऐसा है जो सुन्नते नबवी में यक़ीन रखते हुए उस पे अमल करता हो ? अगर हाँ तो मुसलमान आज गरीब, भूखा बीमार, बेबस ज़लीलो ख़्वार क्यों है अगर जवाब नहीं है तो फ़िर ऐसे जश्न का मक़सद क्या है

झूठ, फ़रेब, मक्कारी और चापलूसी की बदबूदार दलदल में गले तक डूबे ये मुसलमान मर्द, किस तरह रसूल (सअव) के वारिस होने का दावा कर सकते हैं? जिनके हाथ अपने ही बच्चों, औरतों और बूढ़ों के ख़ून से सने हैं- भला ये किस तरह रसूल (सअव) की सच्चाई का अलम उठा सकते हैं? ये रसूल की सुन्नत अदा करने वाले मर्दे मुजाहिदों की सफ़ें (क़तार) हरगिज़ नहीं हो सकते हैं.
मर्दवादी नेज़ाम (व्यवस्था) के पोषक, मनुस्मृति पूजक, मिलादुन्नबी के जुलूस में उमड़े इस मरदाना हुजूम को अंधे, गूंगे, बहरे, ज़ालिम मर्दों की भीड़ ही कहा जा सकता है… आशिक़ाने रसूल नहीं ……!

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