कला साहित्य एवं संस्कृति

इब्ने सफ़ी की जासूसी दुनिया : अनिल जनविजय .

(तस्वीर में अब्बास हुसैनी और इब्ने सफ़ी)

किताबी पन्ना

आज किसी ने मेरी पोस्ट पर इब्ने सफ़ी का नाम लिया । जी हाँ, वही इब्ने सफ़ी, जिनकी जासूसी दुनिया ने सन १९६०-७० के दशक में तहलका मचा रखा था । ढाई सौ से अधिक उपन्यास, एक से बढ़कर एक हैरतंगेज़ प्लॉट्स, उस ज़माने में कहानी में यू० ऍफ़० ओ ०का इस्तेमाल…। यह खुद से पचास साल आगे की दुनिया देख सकने वाले इब्ने सफ़ी ही कर सकते थे ।

जावेद अख़्तर का कहना है कि शायद इब्ने सफ़ी के उपन्यास पढ़ने की ललक न होती तो मैं उर्दू पढ़ना नहीं सीख पाता….।

ये उपन्यास हर महीने रिलीज़ होते थे । छपाई इलाहाबाद में और कवर पेज बम्बई से छप के आया करता था । एक बार पब्लिशर ने कवर पेज को लेकर यह दावा छापा कि अगली नावेल का कवर पेज ऐसा आएगा कि देखने वाला दो मिनट तक अपनी आँख नहीं फेर सकेगा । यह दावा अख़बारों की हेडलाइन बना और पहली बार यू० ऍफ़० ओ० से गिरती रौशनी से झाँकती चार आँखों वाला कवर पेज आया, क्यूँकि उड़नतश्तरी उस समय के लिए एक अजूबा थी तो कैसे आँख हटाता कोई ।

निकहत पब्लिकेशन की शुरुआत जनाब अब्बास हुसैनी ने सन १९४८ में २४ साल की उम्र में की थी । १९५२ में उनके दिमाग में जासूसी उपन्यासों की सिरीज़ पब्लिश करने का आइडिया आया । दो लेखक ऐसे थे जिनका इलाहबाद में इनके घर काफी उठाना बैठना लगा रहता था । एक असरार अहमद साहब और दूसरे राही मासूम रज़ा । हुसैनी साहब ने दोनों को ही एक नावेल लिखने को कहा, लेकिन शर्त थी कि नावेल सिर्फ सात दिनों में लिखा जाय । और असरार साहब ने ये कर दिखाया ।

तो जनाब असरार अहमद साहब सात दिनों में नावेल लिख कर ले आए जबकि कुछ मसरूफ़ियत की वजह से राही मासूम रज़ा नहीं लिख पाए और असरार साहब को हुसैनी साहब ने ऐज़ अ राइटर साइन कर लिया । लेकिन अब नया पंगा आ गया । असरार साहब ने कहा — जनाब कहानी तो दे दूँगा, लेकिन अपना नाम न दूँगा।

असल में असरार साहब उस वक़्त शायरी का शौक़ फरमाया करते थे और उसी में करियर बनाना चाहते थे । नावेल राइटिंग तो, बस, गुज़ारा चलाने के लिए करने को तैयार हो गए थे । असरार नाम से चूँकि शायरी करते थे तो वोह ख़ुद ही जासूसी उपन्यास को अदब का हिस्सा न मानते हुए अपना नाम इसमें नहीं देना चाहते थे ।

काफ़ी मान-मनव्वल के बाद हुसैनी साहब ने नाम सुझाया ’इब्ने सफ़ी’, क्यूँकि असरार साहब के पिताजी का नाम सफी अहमद था । इब्ने सफ़ी मतलब ‘सफ़ी का बेटा’ ….। इस पर असरार साहब राज़ी हो गए, लेकिन अभी भी नाम जँच नहीं रहा था । फिर हुसैनी साहब ने पूरा नामकरण किया डिग्री जोड़कर ’इब्ने सफ़ी, बी ए’ ।

और ऐसे जन्म हुआ हिन्दी-उर्दू जासूसी उपन्यासों के महान राइटर इब्ने सफ़ी बी० ए० का ।

असरार अहमद साहब के अपना नाम न देने की जिद पर अब्बास हुसैनी साहब ने उन्हें नया नाम दिया — ’इब्ने सफ़ी, बी०ए०’ । जो पहली नावेल वोह लिख कर लाए थे ,वो मार्च १९५२ में छपी “दिलेर मुजरिम” के नाम से । जैसे-जैसे बाज़ार में नोवेल आती गईं, निकहत पब्लिकेशन और इब्ने सफ़ी लोगों के जेहन पर छाते चले गए, और एक वक़्त वो भी आया जब हिन्दी के पाठक बेचैन हो उठे और हिन्दी में भी इस नोवेल को निकालने की डिमाण्ड शुरू हो गई। नावेल अब जासूसी दुनिया के नाम से आते थे — हर महीने एक हिंदी और दूसरा उसी का उर्दू। कैरेक्टर्स के नाम बदल जाते थे लेकिन कहानी वही रहा करती थी, जैसे इमरान हिन्दी में राजेश हो जाते थे।

आजादी के बाद १९५२ में इब्ने सफ़ी पाकिस्तान चले गए, लेकिन तहरीर वहाँ से रेग्युलर भिजवाते रहे । साठ के दशक में इब्ने सफ़ी ने पाकिस्तान में अपनी नावेल की कहानी पर फ़िल्म बनवाने की भी कोशिश की, किन्तु असफल रहे । लेकिन नावेल की पोप्युलैरिटी वैसे ही बरक़रार रही । उस समय नावेल ख़रीद कर नहीं, बल्कि पान की दुकानों से किराए पर लेकर पढ़े जाते थे, जिसकी वजह से पब्लिशर्स और राइटर की कमाई कम होती थी । लेकिन ज़िया भाई (अब्बास हुसैनी साहब के बेटे) बताते हैं, उस दौर में भी ५० से ६० हज़ार कॉपियाँ बड़े आराम से बिक जाया करती थीं ।

नावेल की कीमत चार आने से शुरू हुई थी, जो अन्तिम नावेल में आठ रूपये तक पहुँची । इसका अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि १९६२ में जब अब्बास हुसैनी साहब के पिता का इन्तेक़ाल हुआ तो उनके घर चालीस दिनों तक बड़ी मजलिसें की गईं, जिनका कुल खर्च २५ से ३० हज़ार रूपये तक आया था । उसी महीने नई नावेल “मौत की माला” आई थी, जिस अकेली नावेल ने यह पूरा खर्च अकेले निकाल दिया था ।

जब भारत पाकिस्तान युद्ध छिड़ा तो भारत-पाकिस्तान डाक व्यवस्था बन्द हो गई, जिस वजह से एक बार लगा के युद्ध के दौरान यह नावेल पाठकों को नहीं मिल पाएगी। लेकिन इसकी भी एक तरकीब निकाली गई। इब्ने सफ़ी तहरीर को लन्दन भेजते थे और लन्दन से घूमकर वो भारत आती थी, और यह सिलसिला कभी नहीं टूटने पाया। सिलसिला टूटा तो सन ६२ और ६३ में, जब इब्ने सफ़ी दिमाग़ी तौर पर बीमार हो गए. लेकिन ऊपर वाले की दया और मजबूत इरादों वाले सफ़ी ने दो सालों में ही खुद को रिकवर कर लिया और ये सिलसिला फिर से शुरू कर दिया ।

इब्ने सफ़ी ने बीमारी से बाहर आते ही जो पहला नोवेल् लिखा वो था — ’डेढ़ मतवाले’, जिसकी लाँचिंग लाल बहादुर शास्त्री जी ने की थी ।

ऐसा नहीं है कि दूसरे पब्लिशर ऐसी सीरीज नहीं चलाना चाहते थे । इब्ने सफ़ी को भारत और पाकिस्तान के कई पब्लिशर्स ने तोड़ने की कोशिश की किन्तु इब्ने सफी ने अब्बास हुसैनी के अलावा किसी और के लिए लिखने से साफ़ मना कर दिया ।

इस ईमानदार और ज़बान के पक्के लेखक ने कभी अपने वादे नहीं टूटने दिए । अब्बास हुसैनी साहब को सारी ज़िन्दगी इब्ने सफ़ी के नावेल सात दिनों में लिख कर मिल जाते थे, कभी आठवाँ दिन नहीं आया । जुलाई १९८० में इस महान लेखक ने अपना आख़िरी नावेल ’आखिरी आदमी’ उसी तय समय सीमा में भेजा और अपना वादा निभाकर दुनिया से रुखसत हो गया ।

आज सिर्फ इब्ने सफ़ी का नाम सुन कर ही उस दौर के लोगों की रगें फड़क उठती हैं और नज़रें फिर से जासूसी दुनिया सीरीज़ का कोई नया नावेल मोहल्ले की पान की दूकान पर तलाशने लगती हैं ।

अनिल जनविजय

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