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इन आदिवासी लडकियों को मिलना था सरकारी अनुदान पर 3 साल से एक रुपिया भी नहीं मिला

अपना मोर्चा .काम से आभार सहित 

28.02.2019/रायपुर 

रायपुर. बस्तर जगदलपुर के डोंगाघाट स्थित गायत्री इंस्टीयूट में अध्यनरत कुछ बच्चियां पिछले तीन दिनों से राजधानी में भटक रही है. वे स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक से मिलकर अपनी समस्या बताना चाहती है ताकि कोई हल निकल सकें, लेकिन मैडम को फुरसत नहीं है. गुरुवार को बच्चियों ने बकायदा मंत्रालय में पास बनाया और मुलाकात करने की कोशिश की, लेकिन बच्चियों के आगमन की सूचना मिलते ही मैडम भाग खड़ी हुई.

दफ्तर में मौजूद कर्मचारियों ने कहा- अब मैडम कब आएगी पता नहीं… आप  लोग जाइए… कल फिर आइए.

खेत बेचकर भरनी पड़ रही है फीस

बच्चियों की व्यथा यह है कि अब उन्हें अपनी मां के जेवर और पिता के खेत को बेचकर इंस्टीट्यूट की फीस भरनी पड़ रही है. दरअसल वर्ष 2015 में भाजपा की सरकार ने बस्तर और सरगुजा क्षेत्र की अनुसूचित जनजाति वर्ग की छात्राओं को यूरोपीय कमीशन के अनुदान से तीन साल तक नर्सिंग का निःशुल्क प्रशिक्षण देने का निर्णय लिया था.

इस योजना में बस्तर संभाग से 63 एवं सरगुजा संभाग से 37 उन बच्चियों का मेरिट के आधार पर चयन किया जाना था जिन्होंने 12 वीं कक्षा पास कर ली थीं. नर्सिंग के प्रशिक्षण के लिए छात्राओं को यह छूट दी गई थीं कि वे किसी भी संस्थान चाहे वह प्राइवेट हो या सरकारी… एडमिशन ले सकती है.

सरकार ने वर्ष 2015-2016 के बजट में यह भी तय किया कि जिन छात्राओं का नर्सिंग के लिए चयन हो जाएगा उनके खाते में हर साल 80 हजार रुपए डाल दिए जाएंगे ताकि वे 42 हजार रुपए टयूशन फीस, 36000 रुपए भोजन व आवास व्यय का वहन कर सकें. सरकार ने पहले साल तो योजना के तहत चयनित सभी छात्राओं के खाते में पैसे भेजे, लेकिन वर्ष 2016 से बच्चियों के खाते में पैसा आना बंद हो गया. अब फीस के अभाव में इंस्टीटयूट वालों ने दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया है.

हाल के दिनों में बच्चियों ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते से मुलाकात कर अपनी पीड़ा बताई है. पराते ने बच्चियों को मंत्रालय ले जाकर स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक से रु-ब-रु करवाने की कोशिश की, मगर उन्हें भी सफलता नहीं मिली. पराते ने बताया कि वे कई बार मैडम को फोन लगा चुके हैं, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं किया गया. बच्चियां अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात करना चाहती है.

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