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इनके डपोरशंखी विकास पर इलिका प्रिय की यह कविता क्या कहती है जरा गौर करें .

इनके डपोरशंखी विकास पर इलिका प्रिय की यह कविता क्या कहती है जरा गौर करें 


सुना है हमने
सरकार कहती है चल रहा है नक्सलमुक्त अभियानक्योंकि,नक्सलवाद ने बाध्य कर रखा है गांवों के विकास को,


अगर यह सच है तबपूर्ण विकसित होना चाहिए वह क्षेत्रजहां नहीं हैं हथियारबंद दस्तायानी जहां नहीं है नक्सलवाद
यानी शहरों में, कस्बों में….पर सुना है हमने


देश के खदानों में कैद है कई मुर्देशायद सुरंग धंस जाने से मर जाते हैं मजदूर।सुना है हमनेफोर लेन सड़कों के किनारेंबड़े मॉल के बाहरस्टेशनों और चौराहों परमिलते हैं मासूम बच्चेभीख मांगते या प्लास्टिक चुनतेशायद आज भी उनके भविष्य काकोई ठिकाना नहीं
सुना है हमनेआज भी शहरों मेंघुमते हैं खानाबदोशढुंढते रहते हैं दर—बदर आशियानाशायद उनके सर परआज भी छत नहीं है.


सुना है हमनेआज भी अस्पताल के सामनेतोड़ देते हैं दम लोगशायद महंगा इलाज उनकी क्षमता के बाहर होता है
सुना है हमनेईंट ढोतीं मजदूर औरतेंसहती है जुल्म और अपमानगंदी नजरों का शोषणफिर भी साधती हैं चुप्पीशायद बच्चों के भूखे चेहरेउसे मजबूर करते हैं अपमान सहकर भी काम करने को


सुना है हमनेएक औरत अपनी बच्ची कोडरती हैअकेले कहीं भेजते वक्त शायद महसूस करती हैबेटियों की असुरक्षा को
सुना है हमनेआज भी हर बच्चों की पहुंच सेदूर है पढ़ाईक्योंकि सरकारी स्कूलेों की इमारतेंहैं बस ढांचे बनकर खड़ीऔर दूसरी तरफ बिक रही है शिक्षा बहुत महंगें दामों में
सुना है हमनेआज भी युवा करते हैं सुसाइडशायद सारे सर्टिफिकेट भी उन्हेंनहीं दिला पाता एक रोजगार
सुना है हमनें जगह जगह चल रहा है मजदूरों का संघर्षशायद इतना तीखा है शोषण का रूप .


सुना है हमनेचार पांच मंजिलों वाले क्वाटर के लोग भीजूझ रहें हैं पानी बिजली की समस्या सेमहंगाई, बेरोजगारी की समस्या से.


सुना है हमनेफैक्टरियों के अंदर धूं—धूं करकेजल जाते हैं मजदूर असुरक्षा के कारणकोई कानून उनकी रक्षा नहीं करताशायद कानून उनकी रक्षा करना भी नहीं चाहता
सुना है हमनेआज भी संतोष के नाम परकुछ नहीं है लोगों के पासऔर लगता है हमें

हमने जो सुना है बहुत कम सुना हैसमस्याओं की सच्चाई इससे कहीं जटिल हैंक्या सरकार बता सकती हैऐसा क्यों हैं?जहां रोड हैं, इमारतें हैं,फैक्टरियां हैं कारखानें हैंस्कूल हैं, अस्पताल हैंवहां समस्याएं क्यों हैं?किसने किया है वहां विकास को बाधितसरकार के मनसूबे साफ हैंनहीं चाहिए उन्हें जनता का विकासचाहिए पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का विकासइसलिए चल रहा है

नक्सलमुक्त अभियानअभियान के नाम परजो मासूम और भोले आदिवासीनहीं जानते किसी का हिस्सा भी छीननाछीनी जा रही है उनसेउनकी शांतिपूर्ण जीवन जीने की आजादीऔर सरकार चाहती है कि हम चुप रहेंक्योंकि सरकार कहती हैचल रहा नक्सलमुक्त अभियानऐसे में हमें तय करना होगा किहमें कहां खड़ा होना हैऐसे शोषणमूलक अभियान के पक्ष में याशोषण के विरूद्ध जनता की लड़ाई के साथ


– इलिका प्रिय

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