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इंदौर : मिस बिजली इस मिसिंग इन स्मार्ट सिटी नंबर 1- विनीत तिवारी

19.04.2019

एक स्मार्ट सिटी थी। उसका नाम इंदौर था। उसके एयरपोर्ट पर हर इंदौर आने वाले को एक रोबोट बताता था कि आप इंदौर में हैं। स्मार्ट सिटी आने वाले लोग इतने भी स्मार्ट नही थे कि वे बिना रोबोट के बताए जान सकते कि वे इंदौर में हैं। एक रोबोट ट्रैफिक कंट्रोल करता था। उसे देखने के लिए ही लोग इतनी देर रुकते थे कि ट्रैफिक जाम हो जाता था। फिर ट्रैफिक पुलिस वाले जाम खुलवाते थे और गुस्से में रोबोट को घूरते थे। पहले इस स्मार्ट सिटी में सड़कें चौड़ी करने के लिए हज़ारों छायादार पेड़ काटे गए थे और फिर चीन से प्लास्टिक के पेड़ बुलाकर लगवाए गए थे। रात में उनमे लाइट जलती थी। लोग दिन में उन्हें देखते और छाया महसूस करने की कोशिश करते थे। रात में रोशनी चमकाते वे पेड़ हरे भरे ज़िंदा पेड़ों के भूत लगते थे।

उस स्मार्ट सिटी में बिजली नाम की एक लड़की रहती थी। उसका घर एक ऊँची पहाड़ी पर बनी एक ऊंची मीनार में था। उसके अमीर बाप ने स्मार्ट सिटी के आर्किटेक्ट को बहुत रिश्वत खिलाकर मवेशियों के चरने के लिए छोड़ी गई चरनोई की सरकारी ज़मीन की पहाड़ी पर बिना नक्शा पास करवाये मीनार बनवा ली थी। नक्शा बाद में रिश्वत खिलाकर पास करवा लिया गया था। सब काम स्मार्ट तरीके से होता था।
बिजली को बचपन से एक बीमारी थी। उसे बड़ादेव के मंदिर पर एक ज्योतिष ने बता दिया था कि तेरी मृत्यु आँधी-पानी से होगी। बिजली इसी बात से बहुत डरने लगी थी। एक और महाठग ने उसे बताया था कि इसमें डरने वाली कोई बात नहीं है। पानी से डरने की तो कोई भी वजह नहीं। इंदौर की नदी को तो हमने तभी नाला बना ही दिया था जब हमें स्मार्ट सिटी का गौरव भी नही मिला था। पास की प्राचीन नगरी उज्जयिनी की शिप्रा के साथ भी वहाँ के लोगों ने हमारी देखा देखी वही करने की कामयाब कोशिश की लेकिन उन्हें स्मार्ट सिटी का गौरव अभी नही मिल सका है। वे आगे इसी रास्ते पर चलकर ज़रूर हमारी तरह नाम, और रोबोट कमाएँगे। बाक़ी बची नर्मदा, तो उसको तो अब तालाब कहो या पाइप में बहने वाली नदी। तो नदियों के पानी का तो कोई ख़तरा पैदा ही नही होता। पीने के पानी का भी नही होगा। आखिर केन्स्टार का वाटर प्यूरिफायर लगवाया है तुम्हारे बाप ने घर मे। आखिर हेमा मालिनी कोई नकली समान तो नहीं बेचेंगी। है न।

 

अब रही बात बारिश के पानी की । तो देखो, बारिश आती है धरती पर हरियाली देखकर। तो अपने स्मार्ट सिटी वालो ने हरियाली की वाट लगा दी है। बारिश को धोखा देकर कभी बुलाना ही हो तो गोदाम में प्लास्टिक के हरे पेड़ हैं।

और अब भी तुम्हें डर है तो सुनो।
तुम शहर की सबसे ऊँची जगह पर एक ऊँचे महल पर एक ऊंची मीनार में रहने लगो। वहाँ चारों तरफ के झरोखों से झांकती रहा करना कि कहीं आँधी या बारिश तो नहीं आ रही। वहां से तुम्हें एक दिशा में देवास और दूसरी दिशा में धार तक दिखेगा। जैसे ही 50-60 किलोमीटर दूर दिखे कि आँधी या बारिश आ रही हो तो तुम ज़मीन के अंदर बने बंकर के अन्दर घुस जाना और तब तक मत निकलना जब तक उसमे फ्रिज़ में रखे कोल्ड ड्रिंक्स, सैंडविच, पास्ता और पिज़्ज़ा खत्म न हो जाएं या सड़ न जाएँ।

बस तभी से स्मार्ट सिटी की मिस बिजली मीनार पर जाकर रहने लगीं और एक खिड़की से दूसरी, दूसरी से तीसरी के चक्कर लगाने लगीं। इस चक्कर मे वे खाने पीने का भी ध्यान नहीं रख सकीं और कमज़ोर होती गईं।

और आज उन्हें दूर से जैसे ही आँधी-बारिश की झलक मिली तो वे अपने बंकर में जा छुपीं। अब उन्हें डर के साथ भूख भी महसूस हुई। पारदर्शी, और अटूट काँच के फ्रिज़ में रखे नूडल्स, पिज्जा और सैंडविच उसे ललचाने लगे। उसने फ्रिज़ का दरवाजा खोलना चाहा तो पास खड़े एक रोबोट ने उससे आधार कार्ड का नंबर पूछा। लेकिन मिस बिजली का आधार कार्ड बना ही नहीं था।

स्मार्ट रोबोट ने उन्हें खाना देने से इनकार कर दिया। और मिस बिजली बेहोश होकर गिर गई।
और रात 10.30 बजे से अभी रात के 3:52 तक बेहोश ही हैं। बाहर कुछ कुत्ते भोंक रहे हैं – रोबोटों पर, जो चीख- चीखकर बेसुरी आवाज़ में लीगों को गाना सुना रहे थे –

इंदौर बनेगा नंबर वन
हो हल्ला, हल्ला हो हल्ला।
हैट्रिक लगाएंगे।

स्मार्ट सिटी के स्मार्ट इंसान इन रोबोटों को सिटी का गौरव मानकर खुश हो लेते हैं लेकिन स्मार्ट सिटी के योजनाकारों ने कुत्तों के विरोध की कल्पना नही की थी। शीघ्र ही या तो कुत्तों को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें केवल दुम हिलाने और कुंकुंयाने कि गतिविधि तक सीमित किया जाएगा या फिर रोबोटों के ज़रिए इनका उन्मूलन अभियान चलाया जाएगा। इस काम मे गाँधी जी के चश्मे को गंदा करने वाली 10 हज़ार करोड़ रुपये की परियोजना में बची राशि का उपयोग किया जाएगा।

(कृपया कोई ये ना बताये कि सियाचिन पर सैनिक माइनस तापमान में देश की सीमा की रक्षा कर रहे हैं, मुझे मालूम है। कुछ लोग यहां की मिस बिजली को भी बचा लें, उसमें भी देशसेवा का पुण्यलाभ होगा। गौसेवा के बराबर तो ज़रूर ही होगा।)

*****?

विनीत तिवारी .

* लेखक व्यंग्यकार नहीं है लेकिन इंसान जो बनता है, उसके लिए उसके हालात ज़िम्मेदार होते हैं।

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