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आर्टिकल 15 : इस फिल्म को अगर एक शब्द में कुछ बोला जाए, तो मेरे पास सिर्फ एक शब्द है..”शानदार” . प्रिंयंका

फिल्म की शुरुआत एक ऐसे गीत से होती है, जो अक्सर हम प्रोटेस्ट में या जन गीत के तरह गाते है, कहब तो लग जाय धक से…शुरुआत में ये गीत ऐसे दिखाया गया, जैसे मानो एक सच को सुनने के लिए आपके दिमाग को तैयार करके आपको अलर्ट किया जा रहा हो।
देसी भाषा में बोले तो मानो कह रहा हो कि सच सुनने और देखने के लिए तैयार हो जाओ, कहेंगे तो मिर्ची लग जाएगी……

फिल्म में मुख्य किरदार में आयुष्मान खुराना है, जो एक आईपीएस अधिकारी है और विदेश में पढ़ा है, नई ऊर्जा के साथ पहली पोस्टिंग में ही बतौर सजा एक ऐसी जगह , जो जातिगत भेदभाव का गढ़ है,(उत्तर प्रदेश)
जहा गले तक जाति का भेदभाव भरा हुआ है और सीधे सीधे बोलने या करने में कोई अपराध की तरह नहीं समझा जाता।

अब ऐसे जगह पर जब एक नौजवान जिसने भारत को मीडिया वाला भारत देखकर हमेशा गर्व किया था भारत पर, और चुकी ब्राह्मण होने के साथ ही एक संपन्न परिवार और पढ़ाई विदेश से है, तो सीधे तौर पर जाति का इतने गहरे घाव 21 वी सदी में भी इतने गहरे हो सकते है कि मंदिर में घुसने से रोकना, औकात याद दिलाने के लिए बलात्कार करके गांव के बीच लटका देना आदि आज भी है, ये बात

फिर वही से शुरू होती है फिल्म
फिल्म का एक एक दृश्य आपको अपने आस पास होने वाली घटना से मुखातिब करता दिखाई देता है, कहानी तो दो बच्चियों के साथ हुई बलात्कार की पर है, पर उसके मारकर लटकाए जाने का दृश्य आपको साफ तौर पर बदायूं में मारकर पेड़ पर लटका दी जाने वाली दो दलित लड़कियो की याद दिलाता है, या कह सकते है कि उसी घटना के तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए अपील है वो दृश्य।

उसके अलावा ऊना में बांधकर दलितों के साथ हुई मारपीट की घटना का दृश्य भी आपको देखने को मिलता है, जो सीधे तौर पर उस घटना के लिए भले ना कहे या दिखाए गए हो, पर इस दृश्य से आपको अपने आप वो घटना याद आ ही जायेगी।

दो बूढ़े बाप का अपनी बेटियो को खो देने के बाद खुद ही रिक्शा पर दोनो का लाश को ढोकर ले जाना और पीछे से चल रहा बिदाई गीत आपको कोई ड्रामा नहीं बल्कि हकीकत के और भी कई अन्य घटनाओं का चित्रण आपको और भी घटनाओं को याद दिलाएगा, जो हमारे आस पास घटी है।

फिल्म के सभी किरदार बेहद महत्वपूर्ण है और सभी ने अपने काम को बहुत ही बेहरीन काम से किरदार के साथ न्याय किया है।

फिल्म में एक ऐसा दृश्य भी है कि अचानक से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते है और दो लड़कियो के अलावा तीसरी लड़की की खोज की जिद लिए आईपीएस अयान (आयुष्मान) जाते है एक ऐसे युवा नेता के पास जिस पर एनएसए लगा है, उसको देखकर आपको चन्द्र शेखर रावण की झलक भी आसानी से दिखेगी।

एक दृश्य में जब एक सफाई कर्मचारी सीवर में उतरकर गंदे पानी में डुबकी लगाते दिखाई देता है, तो मानो अपने आप से एक प्रश्न करने की अपील हो रही हो जैसे कि सोचो कि हम सब नागरिक आखिर कितने एक समान है , उस पर सीधा एक प्रश्न छोड़कर आगे निकल जाता है।

फिल्म में एक मजबूत दलित युवा नेता एक दृश्य में अपनी महबूबा से मिलकर खूब रोते भी दिखाई देता है, ये बात इसलिए बता रही हू क्युकी यहां कोई फालतू का डायलॉग नहीं चेपा गया है कि मर्द नहीं रोते, क्या लड़कियों की तरह रो रहा है टाइप।

पूरी फिल्म में एक और खास बात ये है कि एक पुरुष को जब जब भी कहीं कुछ समझने में ता हल ढूंढ़ने की दिक्कत होती है, तो वो अपनी प्रेमिका जो कि एक पत्रकार है और जेंडर इक्वालिटी पर काम करती है और उसको उसकी समझ बेहतर है, तो उससे चर्चा करके चीज़ों को समझता है।
कुल मिलाकर एक रथ का सारथी जैसा भूमिका अदा करती है नजर आती है आयान (हीरो) की प्रेमिका।

फिल्म में कहीं कही वन्दे मातरम, वैष्णव जन जैसे गीत की धुन और बोल का इस्तेमाल किया गया है।

फिल्म बहुत ही शानदार और जबरदस्त है क्युकी यहां बहुत ही आम भाषा में दृश्यों से और जाति व्यवस्था की प्रत्येक परत को उधेड़कर रख दिया है।

यहां कोई सिंघम या दृश्यम चुलबुल पाण्डेय जैसा एक हीरो नहीं है, इसके सभी किरदार प्रमुख है और महत्वपूर्ण है। इसलिए सभी हीरो और सभी हीरोइन है। एक भी व्यक्ति को अगर कम कर दिया जाए, तो फिल्म पूरी नहीं हो सकती है।

अंततः फिल्म में बार बार ये संदेश साफ तौर पर दिया गया है कि ये देश संविधान से ही चलेगा, उसके ऊपर कुछ नहीं।

प्रियंका शुक्ला

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