कला साहित्य एवं संस्कृति

|| आनंद व्यास की लघुकथाएँ || दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र


|| लकड़ी ||

मैंने एक आदमी को हाथ में कुल्हाड़ी लिए देखा जिसने कमर पर मटमैली चादर को लपेट रखा था और ऊपर ऊघाड़े बदन था। उसके सिर पर एक कपड़ा बंधा था जिसे उसने पीछे से गांठ देकर कस लिया था। मैंने पूछा कि वह अब तक कितनी लकड़ियाँ काट चुका है। उसने कहा वह पूरा जंगल काटना चाहता है और जंगल ही क्यों वह तो इस धरती पर मौजूद सारी लकड़ियाँ काटने को उतारू था। जो राजा के महल में लगी हैं, जिनसे खाने की मेजें बनी हैं, लोगो की बैठकें सजी है, दफ्तर में  फर्नीचर है- सभी। मैंने पूछा इतनी लकड़ी का क्या करोगे तो वो आसमान की तरफ देखकर बोला कि उसे बहुत कुछ जलाना है और बहुत से ताबूत तैयार करने हैं।

*|| अपवर्तन ||*

गाँव के सरकारी विद्यालय में कक्षा दस के छात्रों को भौतिक शास्त्र के शिक्षक समझा रहे थे – जब प्रकाश किरण जल में जाने के बाद अपने मार्ग से कुछ अंश के कोण पर मुड़ती है और मार्ग से वक्री हो जाती है तो इसे अपवर्तन कहते हैं। अरुण सोचने लगा ये विज्ञानी भी अविद्या को विद्या बताने के लिए कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं। वह आज नदी में जाकर इसे देखेगा – नहीं नहीं वहां तो सब लोग तैरते रहते हैं; नौका चलती है; फूल पत्ते बहते हैं; मछलियाँ आटे की गोलियों के लिए मचलती हैं; जाल भी बिछा होता है -बड़ी हलचल है वहाँ। फिर सोचा सड़क किनारे तालाब पर जाकर देखूंगा लेकिन उसकी सोच भी वक्री हो गई-अरे उसमें गन्दगी है, एक रेस्तरां ने कब्जा किया हैआधे तालाब पर; मछली का जाल वहां भी है; कुछ जानवर भी उसमे मस्ती करते हैं; कुछ फटेहाल बच्चे भी नहाते हैं और कुछ लोग तो अपनी मोटरसाइकिल भी धोते हैं। फिर सोचा चलो कुएँ में देखूंगा वहाँ तो कोई अब पानी भी नहीं भरता बस प्लास्टिक व् कांचके टुकड़े, कुछ फटे कागज, उपयोग किये गर्भनिरोधक, टूटे खिलौने, बासी भोजन और दो चार कुएँ के मेंढ़क वगैरह होते हैं…. नहीं ये भी ठीक नहीं। कहाँ देखूँ। फिर विचार किया घर में बाल्टी को आँगन में धुप में रखकर देखूंगा। तब तक कक्षा में हिंदी के शिक्षक आ गए। वे मुहावरे पढ़ा रहे थे जैसे- नाच न जाने आँगन टेढ़ा, गिरगिट की तरह रंग बदलना आदि। अरुण ने पूछा -“मास्टर जी अपवर्तन का कोई मुहावरा या उदाहरण बताओ न।” मास्टर जी बोले ” बेटा ये समाज पूरा उदाहरणों से भरा पड़ा है लोग मार्ग से भटक कर वक्री हो गए हैं कुछ दस बीस अंश तो कुछ उससे भी ज्यादा ,सभी गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं। अरुण ने सूची बनाई जिसमे प्राचार्य, मंत्री जी,अफसर, दोस्त, चाचा, ताऊ, सरपंच सब तो थे। वो खुश हुआ अब विद्यालय में विज्ञान प्रयोगशाला की भी क्या जरुरत है पूरी दुनिया है मेरे पास।

*|| दिवास्वप्न ||*

“इस बार हम छुट्टियाँ मनाने मलेशिया जायेंगे” बन्टी के चाचाजी ने ऑफिस से लौटने के बाद कुकीज़ के साथ चाय पीते हुए घोषणा की। पूरा परिवार प्रफ्फुलित हो गया। बच्चे तो पागल हो रहे थे। अनुभूति और अनिमेष ने बन्टी से कहा -” भैया अभी तक तो हम लोग इण्डिया में ही घूमने जाते थे लेकिन आप यहाँ पढ़ाई के लिए क्या आये, छह महीने में पापा ने सीधे मलेशिया जाने का प्लान बना लिया, बड़ा मजा आयेगा।” अध्ययन के लिये गांव से विस्थापित बन्टी के पिता ने बीस बरस पहले आगे पढ़ने के लिए उसके चाचाजी को भी इसी तरह शहर भेज दिया था और खुद बैलों के साथ खेतों में जुट गये थे। उसी का प्रतिफल या ऋण अदायगी जो भी समझा जाये, बन्टी चाचा के पास पढ़ने को आया था। कई दिनों तक नये सपने और ‘मलेशिया ट्रूली एशिया’ जैसे विज्ञापन दूरदर्शन में देखने के बाद बन्टी तो इतना खुश था मानो वह पेट्रोनस टावर पर खड़े होकर दुनिया निहार रहा हो। हवाई जहाज में बैठना भी तो एक रोमांचक और अद्भुत अनुभव होगा उसके लिये। वह तो अभी तक ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे में भी नहीं चढ़ा था। रविवार दोपहर में वह दिवास्वप्न देख रहा था- चाचाजी कितने अच्छे हैं पिताजी तो कभी जयपुर भी घुमाने नहीं ले गये। उधर चाचाजी ने बन्टी के पिता को फ़ोन किया ” भैया हम बीस तारीख को स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस से मुम्बई जायेंगे, वहां से रात की फ्लाइट है। आप बन्टी को लेने कोटा स्टेशन पर आ जाना । आपका आशीर्वाद भी मिल जायेगा। लौटने पर हम गांव आयेंगे।” बन्टी का दिवास्वप्न ऐसे टूटा जैसे वह कांच के मर्तबान से छुप कर काजू निकाल रहा हो और चाची के डर से वह हाथ से छूट कर चकनाचूर हो गया हो।

*|| आक्रोश ||*

वह ढोल बजा रहा था, बहुत जोर से बजा रहा था अपनी पूरी शक्ति के साथ । शायद वह उसे फाड़ देना चाहता था ।उसके दोनों हाथों की अंगुलियां लाल हो चुकी थीं।कलाई की नसों और भुजाओं की मांसपेशियों में भी दर्द उठने लगा।  फिर किसी के इशारे पर वह रुका। आधी से ज्यादा रात बीतने पर वह अपने घर पहुंचा। उसकी पत्नी उसके हाथों पर मल्हम लगाते हुए कह रही थी -” इतना जोर से क्यों ढोल को पीटते हो ये उत्सव हमारा नहीं है जितना पैसा मिलता है और जितनी शक्ति हो उतना ही काम करो।” ढोल बजाने वाले उस आदमी ने पानी पिया। वह अपने आक्रोश और भूख दोनों को शांत कर गहरी नींद में डूब गया।


*|| मार्केट शेयर ||*

मासिक रिव्यु मीटिंग में मार्केटिंग मेनेजर ने आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर बाजार में अपनी कंपनी की स्थिति को प्रोजेक्टर पर ग्राफिकल रूप में दिखाया। वहां बैठे राज्य विक्रय प्रमुख ने प्रतिस्पर्धी कंपनियों की सीमाओं तथा उत्पादों और बिक्री पश्चात् सेवाओं की निन्म गुणवत्ता पर लंबा भाषण दिया। अंत में उन्होंने कहा-” जेंटलमैन वी नीड टू इंक्रीज आवर मार्केट शेयर फ्रॉम ट्वेंटी फाइव टू फिफ्टी परसेंट इन कमिंग क्वार्टर” सभी अधीनस्थ अपनी रणनीति बनाने और उसके क्रियान्वन के लिये तत्पर थे। सुबह दस बजे से चल रही मीटिंग तीन बजे तक भी अनवरत जारी थी। भारत भाई जो पुराने ऑफिस बॉय थे इस बीच दो बार बिस्किट्स चाय और अंत में समोसे सर्व कर चुके थे। मीटिंग समाप्त होने पर प्रतीक्षारत अन्य ऑफिस बॉय गुलाब, कमल और नैनसिंह बिस्किट्स पर टूट पड़े। तभी भारत भाई ने कहा -“आज नैनसिंह की बीवी बीमार है वह खाने का डिब्बा नहीं लाया है इसलिये उसको फिफ्टी परसेंट शेयर मिलेगा” यह उसका सुझाव था जिसे सबने आदेश समझ स्वीकार कर लिया।

✍? *आनंद व्यास*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र*

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