कला साहित्य एवं संस्कृति

आदमी स्वर्ग में : स्वर्ग में पृथ्वी की लालसा – विष्णु नागर .

अजय चंन्द्रवंशी , कवर्धा

        विष्णु नागर जी चर्चित कवि हैं।समकालीन कविता में उनका विशिष्ट स्थान है।मगर उन्होंने कहानियां, निबन्ध और व्यंग्य भी लिखे हैं, और एक उपन्यास  'आदमी स्वर्ग में' भी। 'आदमी स्वर्ग में' में कथात्मकता के साथ मुखर व्यंग्यात्मकता भी है।देखा जाय तो व्यंग्यात्मकता ही मुख्य है; कथानक महज उसका आश्रय प्रतीत होता है। कथानक में उन्होंने पौराणिक आख्यानों का प्रयोग किया है, जो बहुधा व्यंग्य में प्रचलित रहे हैं। मिथकों में व्यंग्यात्मकता के लिए फैंटेसी का सहारा लेना पड़ता है, जिससे समकालीन जीवन, समाज और राजनीति के विडम्बनाओं को सहजता से प्रकट किया जा सके;जिसका प्रयोग यहां भी किया गया है।

           उपन्यास का कथानक 'सामान्य' है; लोक प्रचलित। व्यक्ति मरने के बाद अपने कर्मानुसार स्वर्ग अथवा नरक जाता है।यह कथा भारतीय जनमानस में गहरी घुसी हुई है। स्वर्ग के 'लालच' और नरक के 'भय' में कमी भले आयी हो, खत्म नही हुई है। लोग अच्छे कर्म करके आज भी 'स्वर्ग' जाना चाहते हैं। लेकिन इस 'अच्छे कर्म' की परिभाषा अपनी सुविधानुसार होती है।भ्रष्टाचारी,पाखंडी, सूदखोर, हत्यारे तक पूरे आत्मविश्वास से 'धार्मिक' होते हैं।अपने कर्म के 'औचित्य' के प्रति इनके पास तर्कों की कोई कमी नही होती, और ये धर्म से 'डरते ' भी हैं।उपन्यास का मुख्य पात्र 'गेंदमल'  सेठ हैं, ब्याज में पैसे देता है, कभी एक पाई तक नही छोड़ता। व्यापार में कभी समझौता नही करता। किसी की कुड़की कराने की नौबत आई तो वह भी अपना धर्म समझकर करवाई। हाँ मगर पूजा-पाठ, व्रत-उपवास में कोई कमी नही। कभी नागा नही हुआ। इस तरह उनकी 'धार्मिकता' पर कोई उंगली नही उठा सकता। अब ऐसा व्यक्ति स्वर्ग न जाएगा तो कौन जाएगा?

          गेंदमल स्वर्ग पहुंच जाते हैं। कहानी वहीं से शुरू होती है। 'स्वर्ग' की जो कल्पना उनके मनस में थी, वह ध्वस्त हो जाती है।यहां पृथ्वी की तरह कोई सुख सुविधा नही है,कोई स्वाद नही, केवल सुगंधित हवा पीकर जियो। यहां सब बराबर हैं आदमी, गधा, चिड़िया, कुत्ता। किसी को कोई काम नही किसी को कोई विशेषाधिकार नही; इसलिए 'विशेष' होने की कोई अनुभूति भी नही। फिर किसलिए 'स्वर्ग'? ऐसे स्वर्ग से तो पृथ्वी भली! गेंदमल इस द्वंद्व से पीड़ित हो जाते हैं। स्वर्ग में भी उन्हें चैन नही! दरअसल स्वर्ग में भी वे पृथ्वी के अपने 'आदमीपन' को साथ ले आए हैं। जाहिर है पृथ्वी से 'स्वर्ग' के इस 'आने' में कहीं न कहीं खोट है। गेंदमल इस 'खोट' अपने पक्ष में सफल प्रयोग करते हैं।वे सेठ हैं; व्यापारी हैं, आसानी से हार मानने वाले नही थे। वे अपने 'पूण्य' का 'लाभ'  आसानी से छोड़ नही सकते थे। यदि यह स्वर्ग में नही तो फिर से पृथ्वी सही। फिर वे अपने 'वणिक बुद्धि' से  धर्मराज को 'पटाते' हैं, और अघोषित रूप से धर्मराज की जगह ले लेते हैं। इस क्रम में साम-दाम-दंड-भेद से ब्रम्हा-विष्णु-महेश सहित तमाम देवताओं को अपने पक्ष में कर कर लेते हैं। 

धीरे-धीरे स्वर्ग में अपना साम्राज्य स्थापना की ओर बढ़ने लगते हैं। 'देवता' पीड़ित होने लगते हैं; उनको गेंदमल की चालें समझ मे आती है मगर विरोध नही कर पातें। 'देवता स्वभावानुकूल' गेंदमल के पास केवल अर्जी देते हैं, शिकायत करते हैं। गेंदमल के पास ऐसे देवताओं के लिए कारगर दवा है 'आश्वासन'। वे उनको हर बार आश्वासन से संतुष्ट कर देते हैं। कुछ 'युवा' देवता महज बातों में आवेशित होते हैं, उनका भी उनके पास इलाज है। गेंदमल पृथ्वी से अपने 'भाई-बंधु', 'शुभचिंतकों' को बुलाने लगते हैं। इनमे नीले वर्दीधारी भी हैं।

          अब इंद्र को स्थिति का 'अहसास' होता है; उसे अपने सिहासन पर खतरा दिखाई पड़ता है।'इंद्र' तभी जागता है जब उसके सिहासन पर खतरा हो! वह अपने प्रचलित 'हथियार' का प्रयोग करना चाहता है; 'रंभा' , 'मेनका' , 'उर्वशी' को सहयोग को सहयोग के लिए मनाने का प्रयास करता है। वे भी इंद्र के 'अवसरवाद' का उलाहना देती हैं और अपनी असमर्थतता जताती हैं। इधर गेंदमल अपने 'अंतिम लक्ष्य' की तरफ बढ़ते हैं। वह पृथ्वी के 'सबसे शक्तिशाली' देश अमेरिका से समझौता करते हैं और वहां एक कोठी के बदले 'स्वर्ग' में उनके यान का प्रवेश करा देते हैं।ध्यातव्य है कि गेंदमल रहने के लिए अपने पूण्य देश भारत को नही अमेरिका को चुनते हैं।

      इस तरह उपन्यास में पौराणिक प्रतीकों के द्वारा समकालीन जीवन और राजनीति की विडम्बना को सार्थक ढंग से उकेरा गया है। हर पात्र में  प्रतीकात्मक व्यंजना है जो 'मानवीय जीवन' और विडम्बना से जुड़ा है। मसलन देवता केवल अर्जी देते हैं और शाब्दिक विरोध करते हैं। उनकी असहायता का आलम यह है कि हर अत्याचार, यहां तक कि बलात्कर तक के पक्ष में तर्क ढूंढते हैं। जाहिर है यह विवशता अक्षमता जनित है। उनकी 'लोकतंत्रात्मक पद्धति' गेंदमल की केवल आलोचना करना जानती है; क्रियात्मकता उसमे सिरे से गायब है। क्या यह समकालीन समाज के 'जागरूक बौद्धिक जनता' की कटु आलोचना नही है? गेंदमल का लगातार शक्तिशाली होते जाना 'देवताओं' की निष्क्रियता का परिणाम है। ऐसे 'देवताओं' का समाज मे क्या काम?'धर्मराज' मानो अपने काम से ऊब चुके थे, इसलिए मौका मिलते ही अपना काम छोड़कर रास-रंग में डूबते चले जाते हैं। क्या शासन तंत्र इतना यांत्रिक और उबाऊ हो चुका है! या शासक वर्ग खोखले हो चुके हैं! उपन्यास यह प्रश्न भी उठाती है।

           गेंदमल चालाक और शातिर व्यक्ति है, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेने में माहिर।वह तमाम भ्रष्ट आचरण के बावजूद 'धार्मिक' है, स्वर्ग का दावेदार है। वह स्वर्ग में भी अपनी 'योग्यता' के बूते सफल हो जाता है। लेखक गेंदमल के बहाने उस 'मानवीय प्रवृत्ति' को चित्रित करते प्रतीत होते हैं, जो स्वर्ग में भी उसे चैन से रहने नही देती। प्रथम दृष्टया यह 'कर्मठता' प्रतीत हो सकता है मगर इस 'कनिंगनेस' के पीछे लालच, स्वार्थ,अराजकता, भाई-भतीजावाद बहुत कुछ है, जो समकालीन जीवन की विडम्बना है। 'अच्छे लोग' चुप, शांत तमाशा देखते हैं, देवता बनते हैं,कायरता का दार्शिनीकीकरण करते हैं इसलिए गेंदमल जैसे लोग सफल हैं।

           पौराणिक आख्यानों का व्यंग्यकार उपयोग करते रहे हैं। भारतेंदु से लेकर परसाई औरआज तक के लगभग सभी व्यंग्यकारों ने इसका प्रयोग किया है। चूंकि ये कथा जनमानस में लोकप्रिय और सर्वसुलभ होते हैं इसलिए लेखक को इनके माध्यम से अपनी बात कहने में आसनी होती है। विष्णु नागर जी भी अपनी बात कहने में सफल रहे हैं, तो इसका कारण कथानक के साथ-साथ उनके गद्य की सहजता भी है।

पुस्तक- आदमी स्वर्ग में (उपन्यास)
लेखक- विष्णु नगर

प्रकाशन- सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली

अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा (छ. ग.)

मो. 9893728320

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