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आठवाँ सवाल :.क्या फलित ज्योतिष को शास्त्र की मान्यता प्राप्त है ? संदर्भ , धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर.

इसके जवाब में दाभोलकर कहते हैं – ‘ देखिए , कोई भी चीज़ शास्त्र है , यह कैसे सिद्ध हो सकता है ? इसके लिए वैश्विक स्तर के कुछ पैमाने हैं , जो नरेन्द्र दाभोलकर ने नहीं बनाए हैं .

पहले कुछ अवधारणा या हाइपोथीसिस प्रस्तुत करना होता है तथा उसे सिद्ध करना होता है . सिद्ध होने के बाद ही उसका रूपान्तरण सिद्धांत में होता है आप किसी भी ज्योतिषी से पूछिए कि फलित ज्योतिष की अवधारणा क्या है ? वह नहीं बता पाएगा .
मैं बताता हूँ .

फलित ज्योतिष में तीन बातें मानी जाती हैं –

  • आकाशीय ग्रह – नक्षत्रों का मानव – जीवन पर निरंतर और अखंड प्रभाव पड़ता रहता है ।
  • फलित ज्योतिष व्यक्ति के जन्म के समय पर निर्भर करता है ।
  • उसी के अनुसार किसी का भविष्य पता चलता है , तय होता है , बदलता हैं.

हम पल भर के लिए यह मान लें कि आकाशीय ग्रह – नक्षत्रों का प्रभाव मानव जीवन पर पडता हैं .

अगर मुझे बुखार आता है और मैं पांच दवाइयों का काढ़ा लेता हूं तो बुखारी उतर जाता है । पर अब यह पता चलना मुश्किल है कि उन पाँच औषधियों में किस एक औषधि से मेरा बुखार उतरा ! यदि इसका पता करना है तो मुझे प्रत्येक औषधि को पृथक् – पृथक् लेना होगा । इसीतरह अगर मुझे ज्योतिषी बताता है कि मुझ पर गुरू या शनि का प्रभाव पड़ा है तो उसे बाकी ग्रहों को ढाँकने की व्यवस्था करनी होगी । उसके बिना उसे पता कैसे चलेगा कि इस या ‘ उस ग्रह का प्रभाव कैसा है ? अरबों किलोमीटर दूर इन ग्रह – नक्षत्र का प्रभाव किस पर कैसा पड़ेगा , यह बताना उनके लिए कतई संभव नहीं है ।

दूसरी बात

, फलित ज्योतिष जन्म के समय से निर्धारित होता है । फलित ज्योतिष के अब तक के इतिहास में उन्होंने जन्म का सही समय नहीं बताया है । बच्चे के जन्म का कौनसा समय तय हो और बही समय क्यों ? इस पर कोई एकमत नहीं हो पाया है । मैं डॉक्टर हूं इसलिए बता सकता हैं कि जब स्त्री के शरीर में पुरूष बीज प्रवेश करता है , उसके अगले 24 से 48 स्त्री की गर्भनाल में स्त्री – बीज और पुरूष – बीज का मिलन होता है और भ्रूण की पहली कोशिका का निर्माण होता है । अब यह समय कैसे किसी को पता चल सकता हैं .यह वक्तव्य महात्मा फुले का है । इसलिए आप जन्म का समय केसे तय कर सकते है।

अब आप कहते हैं कि जब जन्म होता है , वह समय . . . तो अरबों मीलों दूर से आने वाल किरणें दस मजिला इमारत की कॉन्क्रीट दीवारों को भेदकर स्त्री के चार इंच मोटाई के पेट के पास आकर अटक सकती हैं क्या कि अभी भीतर प्रवेश मना है – नो एन्ट्री , जब डिलीवरी होगी तभी हम अपना काम शुरू करेंगे !

तीसरी बात ,

जन्म के समय के अनुसार नसीब तय होता है या बदलता है । यह सबसे गलत बात है . मान लीजिए , किसी अस्पताल के जच्चा – बच्चा वॉर्ड में तीन टेबिल रखे गए हैं । एक टेबिल पर पुणे के किसी अत्यंत गरीब मजदूर की बेटी को रखा गया , जिसके नौ माह पूरे हो गए हैं । दूसरी , पुणे के अमीर व्यापारी की बेटी है , उसके भी नौ नाह पूरे हो गए हैं और तीसरी , भारत के सबसे अमीर आदमी की बेटी है , उसके भी नी माह पूरे हो चुके हैं । एक ही स्थान पर , एक ही समय में सिजेरियन ऑपरेशन कर तीन बच्चों को जन्म दिया गया , तो क्या तीनों का भविष्य एक ही होगा ? पहली बेचारी मज़दूर की बेटी दूसरे दिन अपने बच्चे को सम्हालकर काम पर जाएगी , उसके बिना वह जी नहीं सकती .दूसरी ओर अमीर व्यापारी पूरे दस दिन के बाद आलीशान गाड़ी लाएगा , अपनी बेटी को ले जाने के लिए । भारत का सबसे अमीर आदमी यह देखेगा कि यहाँ हैलिकॉप्टर किसतरह उतर पाएगा ! अर्थात जन्म के समय से उस बच्चे का भविष्य तय हो जाता है , यह बताना कैसे संभव है ?

इसीलिए मनुष्य का भविष्य आकाशीय ग्रह – नक्षत्र पर निर्भर नहीं है , बल्कि मनुष्य की सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है । दो हज़ार वर्षों तक इस देश की औरतों की कुंडली में शिक्षा का योग नहीं था मगर सावित्रीबाई फुले के जन्म के बाद एकसाथ सबके योग तुरत – फुरत बदल गए ? इसलिए फलित भविष्य मनुष्य को परिवर्तन से रोकता है और फलित भविष्य शास्त्र नहीं है , यह हमारा दावा है । और इसके खिलाफ हमारी लड़ाई है ।

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प्रारंभिक वक्तव्य

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक का प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .
मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है .

नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा ।

यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए ।. उषा आठले


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