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आज साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, विचारक, समाजसेवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, वैज्ञानिक सब चिंतित है।, उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के बजाय उनपर हमले किये जा रहे हैं . :. गणेश कछवाहा .

असहमति को सत्ता के खिलाफ बगावत या विद्रोह मानना शासक वर्ग की कमजोरी, डर,तानाशाही प्रवृत्ति तथा फांसीवादी चरित्र को उजागर करता है।यह किसी भी देश के लोकतंत्र ही नहीं वरन सभ्य समाज के लिये गंभीर व खतरनाक होता है।

 इससे नागरिकों के मौलिक एवं संवैधानिक अधिकारों का हनन शुरू हो जाता है।दमन, अत्याचार,और उत्पीड़न और अमानवीय कार्यवाही बढ़ जाती है।वैचारिक,जागरूक ,वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील गतिविधियों पर अनैतिक प्रतिबंध  लगाने के दुष्प्रयत्न शुरू हो जातें हैं।एक दूसरे पर घोर अविश्वास का दूषित वातावरण फैलने लगता है।जिससे देश के सामाजिक ताने बाने के टूटने या बिखरने का खतरा बढ़ जाता है।निश्चित तौर पर इससे लोकतंत्र बहुत आहत ,और कमजोर होता है या कहें कि लोकतंत्र अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।

 

सभ्य व आदर्श समाज एवं देश के लिए स्वस्थ ,समृद्ध व मजबूत लोकतंत्र व संविधान का होना बहुत जरूरी है।भारत विश्व का सबसे बड़ा एवं समृद्ध लोकतांत्रिक देश है।विविध सांस्कृतिक संस्कारों , मूल्यों,इतिहास, परम्परा, विरासत एवं धरोहर को आत्मसात कर उसे जीवंतता प्रदान किये हुए है।और इसी राष्ट्रीय एकता अखंडता व सद्भावना के लिये पूरी दुनिया में एक विशिष्ट पहचान,स्थान और सम्मान है।

 

भारत के इसी विशाल लोकतंत्र, संविधान ,गौरवशाली इतिहास व संस्कार को बचाने ,रक्षा करने एवं उसे और अधिक समृद्ध करने के लिए इतिहासकार,पुरातत्व वेत्ता, साहित्यकार, संस्कृति कर्मी,बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री,वैज्ञानिक,  संविधान विशेषज्ञ,यहां तक की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति काफी चिंतित है। विश्व के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जनता से अपील करनी पड़ी कि देश के लोकतंत्र को बचा लीजिए।यह अपने आप में बहुत बड़ी और  गंभीर बात है।यह बहुत बड़े खतरे का संकेत है।

 

लोकतंत्र में जनता की आवाजों , विचारों और सवालों की सक्रिय भागीदारी अति अनिवार्य व महत्वपूर्ण होती है।इसके बिना लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है।सत्ता की नीतियों और व्यवस्था की विसंगतियों पर असहमति ही लोकतंत्र को  समृद्ध, मजबूत और बेहतर बनाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि असहमति लोकतंत्र के लिए सेफ्टी वाल्व की  तरह है।

 

साहित्यकारों,विचारको,चिंतकों,समाजशास्त्रियों,अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किये बगैर एक बेहतर, खुशहाल और समृद्ध राज्य या देश का निर्माण नहीं कर सकते।एक प्रसंग में कवि दिनकर ने पंडित नेहरू से कहा था” कि जब राजनीति लड़खड़ाती है तब उसे साहित्य सहारा देता है।”इस तथ्य को समझने की जरूरत है।वर्तमान में साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, विचारक, समाजसेवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, वैज्ञानिक सब चिंतित है।उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के बजाय उनपर हमले किये जा रहे हैं।उन्हें देश द्रोही करार दिया जा रहा है जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र व सभ्य समाज का सूचक नहीं है।

 

लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरुरी है।विचार-विमर्श की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहना चाहिए।यह विचारों, नीतियों एवं निर्णयों को संबल व सही दिशा प्रदान करते हैं।संत कबीर की वाणी “निंदक नियरे राखिये” की पवित्र परम्परा को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए।अन्यथा चापलूसों,चमचों और स्वार्थियों की फौज तुम्हें घेर लेगी उनके चक्कर में फंसकर अपने ही हाथों से स्वयं , राष्ट्र व लोकतंत्र का गला  घोंट दोगो।क्योंकि ये चापलूसों की फौज अपने स्वार्थ के लिए तुम्हें एक सेवक से राजा,महाराजा ही नहीं आराध्य देवता तक बना देंगे।चारों ओर केवल तुम्हारी जयजयकार गूंजेगी। तब दिव्य स्वप्न लोक में पहुंचकर तुम्हें भी स्वयं भगवान होने का भ्रम होने लगेगा तब तुमसे कोई सवाल पूछे, जवाब मांगे,यह भगवान को नागवार गुजरेगा।भगवान से केवल प्रार्थना की जाती है वहां श्रद्धा और समर्पण होता है, सवाल जवाब नहीं।और यहीं से लोकतंत्र का पतन शुरू होता है और खूंखार तानाशाह का जन्म होता है। उसे समाज,देश के हालात और जनता की पीड़ा,दर्द,आवाज कुछ भी सुनाई नहीं देता वह जयजयकार की गूंज में दम तोड़ देता है।

 

आज देश  की हालात को समझने की जरूरत है।देश एक गम्भीर व जटिल समस्याओं से गुज़र रहा है।देश की एकता ,अखंडता, सद्भावना ,लोकतंत्र व संविधान को बचाने की अहम जरूरत है। राष्ट्र के हर एक नागरिकों  ,सभी वर्गों की यह प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे तमाम भेदभावों से ऊपर उठकर  ,एक जुट होकर देश के बारे में सोचे।लोकतंत्र व संविधान को बचाने के लिए वैज्ञानिक, प्रगतिशील, एवं जनवादी शक्तियों एवं वैचारिक विचार विमर्श को आगे बढ़ाना होगा। तब हम गर्व से कह पाएंगे”सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा .

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गणेश कछवाहा 

जिला बचाओ संघर्ष मोर्चा एवं

ट्रेड यूनियन काउंसिल रायगढ़ छत्तीसगढ़।

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