अदालत मानव अधिकार राजकीय हिंसा

आजीवन कारावास भुगत रहे कैदियों को छूटने की पात्रता के बावजूद जेल में रहने को मजबूर है करीब 175 कैदी,

 

 

 

आजीवन कारावास भुगत रहे कैदियों को छूटने की पात्रता के बावजूद जेल में रहने को मजबूर है करीब 175 कैदी, छत्तीसगढ़ सरकार ने मांगी रिपोर्ट…

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छत्तीसगढ़ की जेलों में आजीवन कारावास भुगत रहे कैदियो की रिहाई सरकारी प्रक्रिया और साफ़ दिशा निर्देश के आभाव में अटकी पड़ी हैं, जेल मुख्यालय ने दूसरी बार जेलों से उम्रकैद पाए कैदियों की रिपोर्ट तलब की है. और पूछा है कि इन कैदियों से सम्बन्धित न्यायालय ने क्या अभिमत दिया हैं. जिन कोर्ट ने बिना अभिमत के फाईल वापस कर दी है ऐसी फाईलो को दुबारा भेजा जाये.

धारा 432 के अनुसार विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए उम्र कैद की सजा पूरी करने वाले कैदियों को रिहा कर सकती हैं, ऐसे कैदियों के प्रस्ताव जेल द्वारा सम्बन्धित न्यायलय को अभिमत के लिये भेजते है, अदालत से अभिमत प्राप्त होने ख़ारिज होने के बाद भी दुबारा विचार किया जा सकता है, सामान्यता अदालत रिहाई का विरोध नहीं करती हैं.

इसमें प्रावधान है कि कैदी को माह में तीन दिन अच्छे चाल चलन, और तीन दिन अच्छे आचरण पर माफी मिल सकती हैं .

मुख्यालय जेल ने अपने आदेश में कहा है कि यदि कोर्ट ने बिना किसी टिपण्णी के प्रकरण को लौटा दिया है तो दुबारा इसे भेजा जाये, और इसे पुनर्विचार के लिये विधि विभाग को भेजा जाये. सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन के आधार पर 201 कैदियों का प्रस्ताव तैयार कर कोर्ट को भेजा गया था .स्वीकृति के बाद 38 कैदियों को रिहा कर दिया गया. लेकिन 70 फीसदी से ज्यादा मामले अब नही लंबित हैं .

विवरण

मुख्यालय जेल ने 14 साल की सजा और 6 साल की माफ़ी समेत 20 साल की सजा पूरी करने वाले कैदियों की सूचि मांगी थी, इसकी जाँच करने के बाद जनवरी 2017 में प्रस्ताव तैयार करके कोर्ट को भेजे गए थे, लेकिन कोर्ट ने मामला बरसों पुराना होने का हवाला देते हुए फाईल को लौटा दिया. छत्तीसगढ़ की विभिन्न 32 जेलों ने  करीब 300 कैदियों की सूचि भेजी थी

 

प्रियंका शुक्ला(अधिवक्ता)

कैदियों के भी अपने अधिकार होते है, यदि किसी कैदी के रिहा होने का अधिकार बनता है तो बिना देर के छोड़ा जाना चाहिए. चूकी मामला जेल में रिहाई हेतु 300 कैदियों का है, जो कि गंभीर है. जिसके लिए बिना देरी किये यदि माननीय कोर्ट ने पहले रिपोर्ट वापस भेज भी दी है, तो भी सरकार को चाहिए कि मामले को संज्ञान में लेते फिर से कोर्ट को रिपोर्ट भेजे, व जो भी कैदी छोड़ने योग्य है उनको बिना देरी के छोड़ा जाया जाना चाहिए. इसमें यदि सरकार चाहे तो भी खुद के संज्ञान में लेते हुए कैदियों को रिहा कर सकती है. जिसके लिए सरकार को कोर्ट की भी अनुमति लेने की आवश्यकता नही होगी.

 

जेल डीआईजी केके गुप्ता ने बताया की रिहाई योग्य बंदियों के सम्बन्ध में कोर्ट के दिये गए अभिमत की जानकारी मांगी गई हैं ,रिपोर्ट मिलने के बाद इसे विधि विभाग को भेजा जायेगा.

 

प्रियंका शुक्ला(अधिवक्ता)

कैदियों के भी अपने अधिकार होते है, यदि कैदियों के रिहा होने का अधिकार बनता है तो बिना देर के छोड़ा जाना चाहिए. चूकी मामला जेल में रिहाई हेतु 300 कैदियों का है, जो कि गंभीर है. जिसके लिए बिना देरी किये यदि माननीय कोर्ट ने पहले रिपोर्ट वापस भेज भी दी है तो भी सरकार को चाहिए कि मामले को संज्ञान में लेते फिर से कोर्ट को रिपोर्ट भेजे, व जो भी कैदी छोड़ने योग्य है उनको बिना देरी के छोड़ा जाया जाना चाहिए. इसमें यदि सरकार चाहे तो भी खुद के संज्ञान में लेते हुए कैदियों को रिहा कर सकती है. जिसके लिए कोर्ट की भी अनुमति की आवश्यकता नही होगी.

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