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असहमति की आवाज को कुचल दो! : उत्तम कुमार, सम्पादक दक्षिण कोसल

30.08.2018

28 तारीख को सबेरे छापेमारी के बाद जो लोग गिरफ़्तार किए गए, उनमें फ़रीदाबाद से सुधा भारद्वाज, हैदराबाद से वरवर राव, मुंबई में वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा और नई दिल्ली में गौतम नवलखा शामिल हैं | रांची में स्टैन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतुबड़े के घर पर भी छापा मारा गया |

 

#सुधा भारद्वाज

सुधा भारद्वाज एक अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं | वो दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं | सुधा मजदूर संगठन में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं | उन्होंने आदिवासी अधिकार और भूमि अधिग्रहण पर कई कार्यक्रम किए हैं | वो दिल्ली न्यायिक अकादमी से भी जुड़ी हुई है |

#वरवर राव

वरवर पेंड्याला राव जाने माने तेलुगू के कवि और लेखक हैं | वो ‘रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन’ (विरसम )के संस्थापक भी हैं | वरवर वारंगल ज़िले के चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं | उनसे रामनगर और सिकंदराबाद षड्यंत्र जैसे 20 से ज़्यादा मामलों में जांच की गई थी आपातकाल के दौरान भी साज़िश के कई आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था, बाद में उन्हें आरोपमुक्त कर के रिहा कर दिया था | लगभग 13 साल जेलों में बिताए हैं | उनके पहलकदमी पर राज्य में माओवादी हिंसा ख़त्म करने के लिए चंद्रबाबू सरकार से कवि और गायक गदर से मिलकर मध्यस्थता की थी | जब वाईएस राजशेखर रेड्डी सरकार ने माओवादियों से बातचीत की, तब भी उन्होंने मध्यस्थ के लिए आगे आए |

 

#गौतम नवलखा

गौतम नवलखा चर्चित पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मूल्यों पर काम किया है | आपको बताता चले वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के तौर पर भी काम करते हैं | नवलखा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से जुड़े हैं | नवलखा ने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल पीपुल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स ऐंड जस्टिस इन कश्मीर के संयोजक भी रहे हैं |

#अरुण फ़रेरा

मुंबई के बांद्रा में जन्मे अरुण फ़रेरा मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं | वो अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के अभियोग में 4 साल जेल में रह चुके हैं | अरुण फ़रेरा इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपुल्स लॉयर्स के कोषाध्यक्ष भी हैं | जो अधिवक्ता सुरेन्द्र गाडलिंग की गिरफ्तारी पर सवाल किया था | फ़रेरा भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ़्तार हुए दलित कार्यकर्ता सुधीर धावले के पक्ष में भी अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं | मुंबई के गोरेगांव और जोगेश्वरी में 1993 में हुए दंगों के पीड़ितों के बीच किया है, इन दंगों के बाद उन्होंने देशभक्ति युवा मंच नाम की संस्था के साथ काम करना शुरू कर दिया | इस संस्था को सरकार माओवादियों का फ़्रंट मानती है |

#वरनॉन गोंज़ाल्विस

मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक-कार्यकर्ता हैं | वो मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते रहे हैं | उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था | वो 6 साल तक जेल में रहे थे |गोंज़ाल्विस को नागपुर के ज़िला और सत्र न्यायालय ने यूएपीए की अलग-अलग धाराओं के तहत दोषी पाया था | वरनॉन की पत्नी सुज़न अब्राहम भी मानवाधिकार मामलों की एक वकील हैं | पुलिस वरनन गोंज़ाल्विस के साथ लैपटाप तथा बहुत सारे साहित्य साथ ले गये |

 

कौन थे जिनके याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई

उच्चतम न्यायालय ने रोमिला थापर और अन्य लोगों के याचिका पर भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले के सिलसिले में गिरफ्तार 5 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को 6 सितंबर तक घर में नजरबंद रखने का आदेश दिया | मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’ है | शीर्ष अदालत के इस आदेश के बाद इन पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल नहीं भेजा जायेगा परंतु वे पुलिस की निगरानी में घरों में ही बंद रहेंगे |

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने भीमा-कोरेगांव घटना के करीब 9 महीने बाद इन व्यक्तियों को गिरफ्तार करने पर महाराष्ट्र पुलिस से सवाल भी किए | पीठ ने कहा, ‘असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है और यदि आप इन सेफ्टी वाल्व की इजाजत नहीं देंगे तो यह फट जायेगा | सर्वोच्च अदालत ने इसके साथ ही इन गिरफ्तारियों के खिलाफ इतिहासकार रोमिला थापर और अन्य की याचिका पर महाराष्ट्र सरकार और राज्य पुलिस को नोटिस जारी किये | याचिकाकर्ताओं में प्रभात पटनायक, माजा दारुवाला, सतीश देशपांडे और देवकी जैन भी शामिल हैं |

इतिहासकार रोमिला थापर, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे, देवकी जैन और माया दारुवाला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है | इस मामले की अगली सुनवाई 6 सितंबर को होगी | इन लोगों की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “जस्टिस वाईएस चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये बहुत दुर्भाग्य की बात है | ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है जो दूसरों के अधिकार की बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उनका मुंह बंद करना चाहते हैं | ये लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है |” दूसरी ओर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में मीडिया रिपोर्ट्स पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि आयोग को ऐसा लगता है कि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है | एनएचआरसी ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी करके 4 सप्ताह के अंदर रिपोर्ट देने को कहा है| एमनेस्टी ने भी पूरे घटना को नोटिस किया है |

ऐसा क्या उस इतिहास में कि आग भड़क उठी

पिछले साल 31 दिसंबर को यलगार परिषद का आयोजन किया गया था | इस परिषद में माओवादियों की कथित भूमिका की जांच में लगी पुलिस ने कई राज्यों में 7 कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी की और 5 कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया | इस परिषद का आयोजन पुणे में 31 दिसंबर 2017 को किया गया था और अगले दिन 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में दलितों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी | महाराष्ट्र में पुणे के क़रीब भीमा कोरेगांव गांव में दलित और सवर्ण जाति के बीच टकराव हुआ |

भीमा कोरेगांव में दलितों पर हुए कथित हमले के बाद महाराष्ट्र के कई इलाकों में विरोध-प्रदर्शन किए गए | दलित समुदाय भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन महार सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1818 में पेशवा की 28,000 सेना को 500 महार सैनिकों ने हार का सवाद चखाया था अर्थात महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था | संविधान के शिल्पकार बाबा साहेब आंबेडकर स्वयं 1927 में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे |

कितने खतरनाक थे मामले?

पुलिस के अनुसार सभी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 505, 117, 120B IPC धारा 13,16,17,18,18B, 20, 38,39,40 UAPA लगाई गई है l

असली गुनाहगार कौन?

महाराष्ट्र के पुणे स्थित भीमा-कोरेगांव से शुरू हुई जातीय हिंसा की आंच महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड से तेलंगाना पहुंच चुकी है। एक जनवरी को पुणे में दलित समुदाय भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मना रहे थे, लेकिन कार्यक्रम में दो गुटों के बीच हुए टकराव में एक व्यक्ति की मौत हो गई और कुछ घायल हो गए, जिसके बाद मुंबई समेत राज्य के अन्य इलाकों में तनाव फैल गया। दो लोगों को इस विरोध प्रदर्शन का मास्टरमाइंड माना जा रहा है। जिसमें संभाजी भिड़े (85 वर्ष) जिन्हें भिड़े गुरुजी के नाम से भी जाना जाता है और मिलिंद एकबोटे (56 वर्ष) । लेकिन दोनों ने इस पूरे मामले में अपनी भूमिका को नकार दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार चुप रह कर किसे अपराधी साबित करना चाहती है?

भीमा-कोरेगांव लड़ाई की सालगिरह पर भड़की हिंसा का असर समूचे हासिए पर खड़े लोगों पर पर पड़ा है। जब कोरेगांव हिंसा पर प्रकाश आंबेडकर की अगुवाई में कई संगठनों ने राज्य बंद बुलाया। इस दौरान मुंबई समेत कई इलाकों में हिंसा हुई- मुंबई पुलिस ने कुल 25 लोगों पर एफआईआर दर्ज की है, इसके अलावा कुल 300 लोगों को हिरासत में लिया गया। प्रकाश अांबेडकर का कहना है, इस पूरे मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

देश में विरोध प्रदर्शन

इस मामले के सुलगते ही पूरे देशभर में विरोध शुरू हो गया | दिल्ली नें रूकावटों के बाद छात्र नौजवानों ने प्रदर्शन किए | तेलंगाना, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र विरोध प्रदर्शन ने उबाल लेनेे लगा |

संविधान और मनुस्मृति में टकराव

मनुस्मृति के अनुसार देश को चलाने की कोशिश हो रही है | गाय के नाम पर मोब लिंचिग हो रही है, लव जेहाद के नाम पर महिलाओं का ईज्जत लूटकर बलात्कार और मौत के घाट उतारा जा रहा है | किसानों को आत्महत्या के लिए उकसाया जा रहा है | नोटबंदी और जीएसटी से आम आदमी का कमर तोड़ा जा रहा है | आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन और संस्कृति से बेदखल कर एक सोची समझी साजिश के तहत सुरक्षा बलों के आपरेशन के तहत कई नए सलवा जुडूम के नाम पर आदिवासियों को माओवादी और उसी नीति के तहत माओवादी को मुखबीर के नाम पर कत्लेआम कर रहे हैं | एससी/एसटी एक्ट को खत्म करने की कोशिश कर पहले संविधान को जलाया गया फिर कोंटा में माओवादी का लेबल लगाकर मूलनिवासियों, महिलाओं, बच्चों का मुठभेड़ के नाम नरसंहार कर पूरे देश में अर्बन माओवादी के बहाने मिडिल क्लास के मन में डर पैदा कर भय और कार्पोरेट लूट को बनाए रखने की साजिश हुई | कैग के अनुसार मोदी के राज में सरकारी कंपनियों को 30 हजार करोड़ का नुकसान हुआ, भाजपा को छोड़ कर देश के सभी राजनीतिक दल बैलेट पेपर से वोटिंग से मुंह मोड़ने जैसे मुद्दों से देश में इस कदर तूफान मचाना गया कि प्रधानमंत्री मोदी के हत्या की साजिश करने वाले कथित नक्सली वकील, लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुध्दिजीवियों को जेलों में डालने की कोशिश अमल में लाया गया तथा इस नंगे अत्याचार पर कोशिश हो रही है कि कोई कुछ ना बोले, ना लिखे और ना विरोध करें | हां झूठे लोकतंत्र की पोल खुल रही है.

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