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अमन की पहल : 22 दिसंबर 2019 को जामा मस्जिद इलाके के दौरे के बाद की रिर्पोट

jama masjid

जामा मस्जिद व दरियागंज क्षेत्र में 20 दिसंबर को हुई घटनाओं के संदर्भ में अमन की पहल के साथियों  नसीम खान, मजहर खान, मो. मकसूफ-उल-हक़ तथा विमल भाई  ने 22 दिसंबर रविवार को मटिया महल जामा मस्जिद के आसपास के इलाकों में खासकर के मटिया महल व चावड़ी बाजार के कोने तक दौरा किया।  वहां विभिन्न दुकानदारों से बातचीत की, आम लोगों से बातचीत की, युवाओं से बातचीत की, जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर काफी देर आम लोगों के व्यवहार और वहां के माहौल को समझा।

20 दिसंबर 2019 शुक्रवार की घटनाएँ

20 दिसंबर 2019 शुक्रवार को भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर ने घोषणा की थी कि वह वहां से संविधान के प्रति लेकर जंतर-मंतर तक जाएंगे। शुक्रवार को जामा मस्जिद में बड़ी नमाज होती है। जिसमें हजारों लोग इस बार जुड़े और उन्होंने सीएए और एनआरसी का विरोध किया।

भीम आर्मी के चीफ़ चंद्रशेखर को 20 की सुबह ही पुलिस ने गिरफ्तार करने की कोशिश की मगर वे बच कर निकल गए।  

शाम को दिल्ली गेट के पास पुलिस ने बहुत बुरी तरह लाठीचार्ज किया था। जिसमें कई घायल हुए, बहुत बुरी अवस्था में उनको थाने में रखा गया। ना डॉक्टर न ही वकील, किसी से नहीं मिलने दिया गया। बीसियों वकील बाहर इंतजार भी करते रहे मगर नहीं मिल पाए।

इसके विरोध में आईटीओ पर पुलिस मुख्यालय के बाहर सैकड़ों की संख्या में लोग प्रदर्शन करते रहे कि लोगों को छोड़ा जाए।

जामा मस्जिद के आस पास लोगों से बातचीत

लोगों से बात की तो हमने पाया कि वो अपने आप में बहुत साफ़ थे। उनका कहना है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर  और नागरिकता संशोधन अधिनियम पर विरोध इस वजह से है कि ये संविधान पर हमला है। हम एक  धर्मनिरपेक्ष देश हैं और रहेंगे। हिंदुस्तान को बचाने के लिए संविधान को बचाना होगा। ये काले कानून हमें बाँट रहे है।

पुलिस की भूमिका जामिया में बहुत खतरनाक थी लेकिन जामा मस्जिद पर बेहतर थी। सब कुछ ठीक ठाक हुआ। लोग प्रदर्शन के बाद अपने अपने रास्ते चले गए। लेकिंन लोगो को दिल्ली गेट पर रोका गया। गेट पहुँचते पहुँचते पता नहीं क्या हुआ कि ये हिंसा हो गई!

सुबह जब भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर को अरेस्ट किया तब थोड़ी सी भगदड़ मची थी लेकिन लोगों ने संभाल लिया क्यूंकि ये एक पुर अमन प्रदर्शन था।

लोगों का ये भी कहना था कि जब वो अपने दस्तावेज़ नहीं दिखाते, तो हमें भी पूरा हक है कि अपने दस्तावेज़ न दिखाएँ! हमें भारत सरकार पर भरोसा नहीं है!

इसी बातचीत के दौरान यह भी देखा कि काफी तादाद में पुलिस तैनात थी ही लेकिन पुलिस पेट्रोलिंग भी काफी थी। ऐसा लगा कि लोगों में एक डर बैठाने की कोशिश की जा रही है!

सभी लोगो के मुताबिक ये प्रदर्शन पूर्णतया शांतिपूर्ण था। पुलिस की भूमिक अभी ठीक ही थी। लेकिन सवाल आखिर में हुई हिंसा पर उठाया! ये भी कहा गया कि क्यूंकि ये पुलिस स्टेशन के बाहर का ही है तो पुलिस स्टेशन का सीसीटीवी देखना बहुत ज़रूरी है।

यहाँ इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि आग लगने की घटना से शुरू करके ही पुलिस ने जामिया और दिल्ली गेट पर लाठी चार्ज की कार्यवाही की। जामिया मिलिया में भी ऐसा ही हुआ कि वहां प्रर्दशन शांतिपूर्ण था और एक बस जला दी गई। फिर उसके नाम पर पुलिस द्वारा हिंसा की गई। एक ही रणनीति रही। यहाँ पुलिस पर शक और मज़बूत हो जाता है।

जामा मस्जिद की मोटर पार्ट्स की मार्किट में ये भी बताया गया कि यहाँ हिन्दू और मुस्लिम सालों से बल्कि पीढ़ियों से साथ कारोबार कर रहे हैं। लेकिन आज तक कभी कोई खींचा तानी भी नहीं हुई। यहाँ साफ़ तौर से आरएसएस का नाम लिया गया कि यह सब उन्हीं की करामात है। जामा मस्जिद के लोग प्रदर्शन  के बाद वाली रात में सुबह चार बजे तक जागते रहे ताकि किसी भी तरह की कोई हिंसा न हो! ये भी बताया कि चन्द्र शेखर आज़ाद ने सभी पुलिस वालों को चाय नाश्ता भी देने को कहा था।

हमारी टीम काफी देर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठी ताकि माहौल को समझ सकें! इसी दौरान कई लोगों से हमारी बात हुई और उन्होंने केवल एकता, विविधता की खूबसूरती और धर्मनिरपेक्षता की ही बात की जो कि हमारे संविधान की रूह है!

अबू सुफियन (पुरानी दिल्ली वालों की बातें) दिल्ली वेलफेयर एसोसिएशन से मुलाक़ात हुई बल्कि काफी बात हुई! उनके मुताबिक, उन्होंने प्रोटेस्ट से पहले सभी लोगों की तरफ से एह्तुयाती क़दम लिए गए थे। जामा मस्जिद पर इसलिए कुछ नहीं हो पाया क्यूंकि स्थानीय लोग बहुत सतर्क थे कि किसी भी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए। यहाँ तक कि हमने अपने  3 कैमरे भी लगाए हुए थे ताकि असामाजिक तत्वों पर नज़र राखी जा सके।

पुलिसिया हिंसा

प्रर्दशन को जामा मस्जिद से जंतर-मंतर जाना था। लेकिन पुलिस ने दिल्ली गेट पर ही रास्ता रोका हुआ था! वहीं से हिंसा शुरु हुई जबकि वहां काफी कम लोग थे। ओसामा बिन तारिक से बात हुई जो की चश्मदीद थे। उन्होंने बताया कि लोगो पर  6  बजकर 5 मिनट  पर उपायुक्त के दफ्तर के पास के पानी की बौछारे छोड़ी गई।  जिससे पब्लिक पीछे की तरफ धकेल दी गई। उसके बाद कार में आग लगी। सवाल यह है कि फिर आग किसने लगाईं?

उन्होंने पूरा वाक्या बताया कि 20 तारीख को प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। कहीं कोई हिंसा नहीं थी। फिर  6 बजकर 10 मिनट के करीब जब अंधेरा शुरू होता है तो प्रदर्शनकारियों पर डीसीपी ऑफिस दरियागंज के पास जहां पुलिस, सीआरपीएफ और आर ए एफ ने बैरिकेड लगाकर नाकाबंदी कर रखी थी, वहां से प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछार चालू की गई। लोग पीछे की तरफ थाने के पास दौड़ते आए। जब लोग पीछे आने लगे तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। जिसमें नाबालिग बच्चों से लेकर  70 साल से ज्यादा के बूढ़े लोग भी थे। उनके सर पर वार किया गया। कुछ लोगों ने पत्थर फेंके मगर फिर शांत हो गए। अचानक से दिखाई देता है कि एक कार जो डीसीपी ऑफिस के पास खड़ी थी उसमें आग लग गई। जबकि प्रदर्शनकारी पीछे हटाए जा चुके थे। दरियागंज थाने तक पहुंच चुके थे और लाठीचार्ज भी चल रहा था। पानी भी फेंका जा रहा था। इसी बीच यह कैसे संभव हुआ पता नहीं?

कुछ पुलिस कर्मी सिविल ड्रेस में थे यहां तक कि बाइक हेलमेट और घर के जूतों में बिना नेमप्लेट वाले  कपड़े पहने थे। वे सीधा सर पर वार कर रहे थे।

प्रदर्शनकारियों में से  दो तीन लोग ही पत्थर मार रहे थे। उनको रोका गया। उन्होंने मुश्किल से 6-7 पत्थर ही फेंके थे। मैंने भी ऐसा करने से लोगों को रोका था। पुलिस ने मासूम बच्चों और बड़ों को भी मारा और फिर उन्हें कस्टडी में लिया। एक लड़के के सिर पर इतनी ज़बरदस्त चोट हुई कि उसकी याददाश्त चली गई वो अस्पताल में अपनी जानकारी भी नहीं बता पाया। किसी तरह बाद में उसके बारे मे पता किया गया।

उनहोंने अपना तजुर्बा भी बयान किया जब उन्होंने पहली बार अपने कॉलेज में सुना कि मुसलमान हो तो पाकिस्तानी होगे। लेकिन चार साल साथ पढने के बात हिंदू मुसलमान का भेद न होकर बहुत अच्छे  दोस्त मिले। इसीलिए हिन्दू और मुसलमान को एक दुसरे के करीब रहना व एक दुसरे को जानना आपसी ताल मेल के लिए बहुत ज़रूरी है। जो ये सरकार होने नहीं दे रही है!

टीम ने पुलिस उपायुक्त, दरियागंज के दफ्तर के ठीक बाहर फुटपाथ से लगी वह कार भी देखी और फोटोस लिए जिसका सिर्फ ऊपरी हिस्सा अंदर से कुछ जला था। टायर पूरी तरह सुरक्षित थे। पानी बौछार के साथ पुलिस, सीआरपीएफ और आरपीएफ की सुरक्षा के बीच कार का किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा जलाया जाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

पुरानी दिल्ली अपने दंगों की इतिहास के बावजूद भी गंगा जमुनी तहजीब की विरासत संभाले है। कुछ ही महिनो पहले दंगा भड़काने की एक कोशिश को पुरानी दिल्ली नाकाम कर चुकी है। हमें माहौल में कहीं भी किसी भी तरह की कोई हिंसक गरमाई नहीं नजर आई। हां लोग जरूर अपने कारोबारी भविष्य को लेकर परेशान हैं। और भारत के संविधान पर हो रहे हमले को लेकर चिंतित हैं।

जो लोग हिंसा में घायल हुए, जिनके चोटें लगीं। वे डर के मारे सामने नहीं आ रहे हैं। इस बात का डर है कि सरकार उन पर उल्टे इल्जामात लगाने की कोशिश करेगी।

हमने दरियागंज में उपायुक्त कार्यालय जाकर पुलिस का बयान लेने की कोशिश की। मगर छुट्टी की वजह से वहां पर कोई मौजूद नहीं था। जो अधिकारी मौजूद थे उन्होंने बताया कि वे प्रधानमंत्री की रैली के कारण आज बहुत व्यस्त रहे हैं।

20 तारीख के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद जिस तरह हिंसा भड़काने की कोशिश की गई और उसके बाद यहां के मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश की गई। हम उसकी पुरजोर भर्त्सना करते हैं।

भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर की गिरफ्तारी की भी भर्त्सना करते हैं।

जिस तरीके से बूढ़ों और बच्चों को बुरी तरह मारा गया। वह निंदनीय है।

लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में घायलों को अपमानित किया गया। उनको इलाज नहीं दिया गया। उनके साथ में जो लोग आए उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। यह पूरी तरह से न केवल गलत है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के मूल सिद्धांत के भी खिलाफ है। इस पर अस्पताल के प्रशासन को ध्यान देना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति ना हो।  याद रखें कि युद्ध के समय में भी रेड क्रॉस सबके लिए काम करती है।

इसके बाद भी लोगों की ओर से कोई गलत प्रतिक्रिया नहीं आई। यह प्रशंसनीय बात है।

पुरानी दिल्ली देश के इतिहास में एक बड़ा स्थान रखती है।इसकी गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाए रखना सरकार और स्थानीय निवासियों कि ज़िम्मेदारी है। स्थानीय निवासियों ने इस ज़िम्मेदारी को निभाया है।

हमारी मांग

इस पूरे मामले की न्यायिक जांच हो और दोषियों को न्याय संगत सजा दी जानी चाहिए।

भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर ने शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन में शामिल हुए और न ही कोई उत्तेजक बयान और बातचीत की बावजूद भी सरकार ने जिस तरह उनको गिरफ्तार किया और अभी भी नहीं छोड़ा है यह पूरी तरह से गलत है हमारी मांग है कि उनको तुरंत बिना शर्त रिहा करना चाहिए।

लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल का प्रशासन 20 दिसंबर की घटना की आंतरिक जाच करे व दोषियों को सजा दे। ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति ना हो। याद रखें कि युद्ध के समय में भी रेड क्रॉस सबके लिए काम करती है।

अमन की पहल  के टीम सदस्य
सुश्री नसीम खान,   विमल भाई,   मजहर खान, मो0 मकसूफ-उल-हक़
जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समंवय} बड़खल गांव, फरीदाबाद, हरियाणा {9718479517, 9868904495} 15-01-2020

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