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अपने बेटों को बताएं कि जबरिया सेक्स बलात्कार कहलाता है चाहे वो पत्नी के साथ ही क्यों न हो

केवल पन्द्रह साल बाद बलात्कार जैसा शब्द समाज के शब्दकोश से गायब हो सकता है
अगर हम सिर्फ इतना करें…

हम अपने बेटों को जन्म से ही ब्रेन ट्रेनिंग के माध्यम से यह बताएँ कि उनकी और उनकी बहनों या अन्य लड़कियों की देह में केवल जननांग का अंतर है अन्यथा वे हर बात में बराबर हैं. उन्हें भी शरीर मे उतना ही कष्ट होता है, उतनी ही बीमारियां होती हैं. जबरन छूने से, च्यूंटी काटने से, ज़ोर से पकड़ने से, मारने से शरीर मे उतना ही दर्द होता है. चोट लगने से वैसा ही घाव होता है.

यह कि उनका हर बात में बराबरी का हक़ है पढ़ने लिखने में, खाने पीने में, खेलने कूदने में, घर मे लाई वस्तुओं का उपभोग करने में, प्यार और दुलार पाने में भी. देह और मस्तिष्क के स्तर पर दोनों बराबर हैं.

जितने काम लड़कियों को सिखाते हैं उतने ही काम लड़कों को सिखाएं मसलन खाना पकाना, बर्तन कपड़े धोना, झाड़ू पोछा करना, घर साफ करना, कपड़े सीना, गाड़ी चलाना, इत्यादि.

और सबसे महत्वपूर्ण बात कि समझ आते ही उन्हें यौनिकता के बारे में बताएं. उन्हें बताएं कि स्त्री को मासिक धर्म क्यों होता है. स्वप्नदोष क्या होता है, हस्तमैथुन क्या होता है. उन्हें प्रजनन शास्त्र के बारे में बताएं. उन्हें बताएं कि यद्यपि सेक्स मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है लेकिन जबरिया सेक्स बलात्कार कहलाता है चाहे वह पत्नी के साथ क्यों न हो. उन्हें बताएं कि यौन प्रताड़ना किसे कहते हैं. उन्हें बतायें कि यौन सुख की अनुभूति स्त्री पुरुष में अलग अलग होती है और शरीर का मन से क्या सम्बन्ध होता है. यह भी कि अपराध किसे कहते हैं.

जब वे अच्छी तरह इन बातों को समझ लें उन्हें यह भी बताएं कि वे उनसे पहले की पीढ़ी के लोगों को यानि अपने पिताओं, चाचाओं, मामाओं और नाना दादाओं को भी यह बात बतायें कि उन्होंने स्त्री का जितना अपमान कर लिया सो कर लिया अब करेंगे तो उन्हें सरे आम जुतियाया जाएगा. 

बाक़ी इन पन्द्रह सालों में बलात्कारियों को सजा देना हो, लम्बे मुकदमे चलाने हों, मोमबत्तियां जलानी हों, धर्म के नाम पर अपराध को उचित ठहराना हो, फेसबुक से लेकर संसद तक जितनी बहस करनी हो, व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन करना हो, स्त्रियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देना हो, यानि जो करना हो करते रहें. विरोध भी बदस्तूर जारी रहे क्योंकि अंततः हमारा उद्देश्य एक बेहतर समता मूलक समाज की स्थापना ही है.

आलेख : शरद कोकास

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