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अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अपास्त करने की मांग

9.03.2019

छत्तीसगढ़ किसान सभा , आदिवासी एकता महासभा

सर्व आदिवासी समाज,

छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा और अन्य संगठनों के आह्वान पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदिवासियों को वनभूमि से बेदखली करने के आदेश के खिलाफ हजारों आदिवासियों ने विरोध प्रदर्शन किया और इस आदेश को अपास्त करने के लिए अध्यादेश लाने की मांग की. उन्होंने प्रदेश में आदिवासी वनाधिकार मान्यता कानून, 5वीं अनुसूची के प्रावधानों और पेसा कानून को शब्द और भावना के अनुरूप पूर्णतः लागू करने की भी मांग की.

छत्तीसगढ़ किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा की ओर से अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बादल सरोज ने संबोधित किया. अमेरिका में रेड इंडियन्स समुदाय के आदिवासियों के कत्ले-आम का उदाहरण सामने रखते हुए उन्होंने बताया कि पूंजी की हवस और मुनाफे की लालच में यहां की सरकारें भी आदिवासियों के अस्तित्व को ख़त्म कर जल-जंगल-जमीन-खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को कार्पोरेटों को भेंट में देना चाहती है. यही कारण है कि पिछले एक साल में आदिवासियों के पक्ष में पैरवी करने के लिए मोदी सरकार का कोई वकील खड़ा नहीं हुआ. इसलिए ऐसी आदिवासीविरोधी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने के सिवा और क्जोई रास्ता नहीं बचता.

छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस देश के दो करोड़ और छत्तीसगढ़ के 25 लाख आदिवासियों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है, लेकिन इस देश की सरकारों को कोई चिंता नहीं है और वे कार्पोरेट घरानों की सेवा में ही लगी हुई है. लेकिन पूरे देश में आदिवासियों, दलितों, किसानों का जो संयुक्त संघर्ष विकसित हो रहा है और जिसकी धमक मुंबई और दिल्ली में किसानों की पदयात्रा में सुनाई दी, उससे आदिवासियों और किसानों के मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं. इन्हीं मुद्दों में राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर किया है और केंद्र से भी बेदखल करेगी. उन्होंने कहा कि राज्य की कांग्रेस सरकार को इन मुद्दों पर संवेदनशील होने और आदिवासियों के अधिकारों के जमीनी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की जरूरत है.

आदिवासियों के इन सभी संगठनों ने ऐलान किया है कि संघर्ष जारी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ युद्ध छेड़ा है, अब इस युद्ध को रोकने की जिम्मेदारी भी उसी की बनती है. दोनों को आदिवासियों के वनाधिकारों को मान्यता देनी होगी और विकास के नाम पर आदिवासियों, दलितों और ग़रीबों के विनाश की राजनीति पर रोक लगानी होगी.

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