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अगस्‍त क्रांति से शुरू हुई थी अंग्रेजों की वापसी की उल्टी गिनती, जानें कैसे हुआ मुमकिन .

  महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई से भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। यह आंदोलन अगस्त क्रांति के रूप में जाना जाता है। यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से किया गया। यह आंदोलन देश भर में तेजी से बढ़ा। अंग्रेजों ने करीब 14 हजार भारतीयों को जेल में डाल दिया। आमतौर पर 9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है। लेकिन ये आंदोलन 8 अगस्त 1942 से आरंभ हुआ था। 8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान पर अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति ने प्रस्ताव पारित किया था जिसे ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव कहा गया।

भारत छोड़ो आंदोलन का रोचक प्रसंग

भारत छोड़ो आंदोलन के आगाज को जानने से पहले अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ जनभावना को कुछ यूं समझा जा सकता है। तत्कालीन संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के पूर्वी हिस्से के जिले आजमगढ़ में निबलेट जिलाधिकारी थे। वो अपने जिले के एक थाने मधुबन का जिक्र करते हुए कहते हैं कि आंदोलन में कोई बड़े कद का नेता नहीं शामिल था। करीब एक हजार लोगों की भीड़ ने थाने को घेर रखा था। सभी लोगों के हाथों में मशालें और तलवारें थीं। जब उसको एक स्थानीय अधिकारी ने जानकारी दी वो मौके के लिए रवाना हुआ। मशालों और तलवारों को देखकर वो भयभीत हुआ। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि भीड़ की तरफ से ये आवाज गई कि वो लोग किसी ब्रिटानी अधिकारी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। वो लोग चाहते हैं कि गांधी बाबा(महात्मा गांधी) की अपील पर ध्यान दें और जितना जल्दी हो सके भारत को आजाद कर दें। 

हिल गई अंग्रेजी हुकूमत

भारत छोड़ो आंदोलन के शुरू होते ही गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी हुकूमत इतना डर गई थी कि उसने एक भी नेता को नहीं बख्शाा। दरअसल अंग्रेजों की सोच ये थी कि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी से आंदोलन ठंडा पढ़ जाएगा। देश के अलग अलग हिस्सों में राष्ट्रीय सरकारों का गठन हुआ। यूपी का बलिया, महाराष्ट्र का सतारा और अविभाजित बंगाल का हजारा भारत छोड़ो आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र थे। बलिया में जहां चित्तु पांडे की अगुवाई में राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया। वहीं सतारा की सरकार लंबे समय तक चलती रही।  क्यों खास था ये आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरु हुआ यह आंदोलन सोची-समझी रणनीति का हिस्साा था। इस आंदोलन की खास बात ये थी कि इसमें पूरा देश शामिल हुआ। ये ऐसा आंदोलन था जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दी थीं। ग्वालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने कहा कि वो एक मंत्र देना चाहते हैं जिसे आप सभी लोग अपने दिल में उतार लें और वो वो मंत्र था करो या मरो था। बाद में ग्वालिया टैंक मैदान को अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। लोगों ने खुद अपना नेतृत्व किया लेकिन आंदोलन के असर को इस तरह से समझा जा सकता है कि बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

हालांकि ये अंहिसक आंदोलन था पर आंदोलन में रेलवे स्टेंशनों, सरकारी भवनों आदि को निशाना बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने हिंसा के लिए कांग्रेस और गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया। लेकिन पर लोग अहिंसक तौर पर भी आंदोलन करते रहे। पूरे देश में ऐसा माहौल बन गया कि भारत छोड़ो आंदोलन अब तक का सबसे विशाल आंदोलन साबित हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन का असर ये हुआ कि अंग्रेजों को लगने लगा कि अब उनका सूरज अस्त होने वाला है। पांच साल बाद 15 अगस्त 1947 को वो दिन आया जब अंग्रजों का प्रतीक यूनियन जैक इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है

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