मानव अधिकार

अगर सचमुच संविधान से चलने वाला लोकतंत्र इस भारत देश में स्थापित करना हो , तो इसकी पूर्वशर्त के तौर पर राजनैतिक विचारों के सभी बंदियों को बिनाशर्त तुरंत छोड़ दिया जाए. एक साल से गिरफ्तार मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने राज्यपाल से की अपील.

अगर सचमुच संविधान से चलने वाला लोकतंत्र इस भारत देश में स्थापित करना हो , तो इसकी पूर्वशर्त के तौर पर राजनैतिक विचारों के सभी बंदियों को बिनाशर्त तुरंत छोड़ दिया जाए. एक साल से गिरफ्तार मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने राज्यपाल से की अपील.

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प्रती माननीय राज्यपाल
महाराष्ट्र सरकार , मुंबई

17.06.2019

हम सभी न्यायबंदी पिछले एक साल से पेना के येरवाड़ा सेन्ट्रल जेल में कैद हैं । हममें से 5 लोगों को पूणा के शनिवारवाडा में हुये एल्गार परिषद ‘ से जुड़े कथित अपराध में 6 जून , 2018 को गिरफ्तार किया गया , तो अन्य 4 को 28 अगस्त 2018 भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी , 2018 के हुई हिंसा को भड़काना , दो समाज में घृणा दुश्मनी पैदा करना , राजद्रोह , देशद्रोह , अपराधिक षड़यंत्र आदी आरोप लगाये सरासर झूठे हैं ।

क्योंकि अगर देश का मतलब लोग हैं , तो एक देश के लोगों ने , लोगों द्वारा चुनीं सरकार के खिलाफ बोलना और अन्य लोगों को भी वैसा सोचने के लिए उकसाना , यह राजद्रोह या देशद्रोह कैसे हो सकता हैं ? एल्गार परिषद के तमाम भाषण , प्रबोधन के गीत और नाटक के जरिये लोगों को सरकार के खिलाफ हिंसा करने के लिए उकसाया नहीं गया था । उल्टे , अन्याय – अत्याचार शोषण के खिलाफ लोगों ने एकसाथ आकर लड़ना चाहिए और संविधान के खिलाफ काम करने वाली भाजपा सरकार को चुनाव में वोट न देकर सावधान बचाव , लोकतंत्र बचाव , देश बचाव ‘ की अपील की गई थी । इन्हीं कारणों की वजह से हमारे द्वारा नहीं किये हुए गुनाह में फंसाकर हमपर जबरन मुकदमा लादना , यह हम पर सरासर अन्याय हैं

बेल नॉट जेल ‘ इस संदर्भ में उच्चतम न्यायल के साफ दिशानिर्देष होने के बावजूद हमारी जमानत याचिका के अभियोजन पक्ष द्वारा लम्बे समय तक खींचा जा रहा है । सरकारी वकील और पुलिस जांच अधिकारी को पहले से ही मीडिया ट्रॉयल चलाने में इन्टरेस्ट होने की वजह से वे हमारी जमानत की सुनवाई को भी मिनी मीडिया ट्रॉयल ‘ जैसे चला रहे हैं ।

जिन माओवादियों से किये गये कथित इ – मेल पत्रों द्वारा आदान – प्रदान करने का आरोप लगाया गया हैं , वे कथित पत्र अभियोजन पक्ष शुरू से ही मीडिया धड़ल्ले से दिखा रही हैं , लेकिन , एक साल बितने को आया , उस संदर्भ के इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज आरोपियों को नहीं दिये गये हैं । इससे अभियोजन पक्ष के इंटेशन पर ही सवाल खड़े होते हैं । राजनैतिक बंदियों को सालों साल जेलों में सड़ाया जारहा हैं । सभी में समान न्याय ‘ और ‘ समय पर न्याय ‘ इस बुनियादी तत्वों का उल्लंघन करके एक तरह से न्याय को नकारा जा है । सबका साथ , सबका विकास , सबका विश्वास ‘ यह नयी सरकार का नारा पिछली सरकार का इतिहास देखते हुए कितना कारगर साबित हो पायेगा , इस पर ही सवालिया निशान खड़े करते हैं ।

क्योंकि अगर सबका विश्वास हासिल करना हो सबसे पहले सरकार ने अपनी संविधान के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी । और उसके लिए सभी से समान न्याय का बर्ताव होगा । असहमतियों को सरकार विरोधी विरोध को और विरोधी विचारों को कुचल डालना , उनपर देशद्रोह के मुकदमें उन्हें गिरफ्तार करना . . . .

यह अभिव्यक्त की स्वतंत्रता पर खुला हमला है । नयी सरकार चुनकर आते ही मॉबलिचिंग का एकबार फिर हो गया है , उन्हें रोकना तो दूर की बात , धर्माधता बढ़ाने वालों पर , घृणा – दुश्मनी फैलाने वालों पर और नाथूराम गोडसे का खुलेआम समर्थन करने वालों पर सरकार कोई कार्रवाई करती नजर नहीं आ रही है । इसलिए सबका विश्वास यह एक धोखा अगर लोकतंत्र यानि संविधान से चलने वाला तंत्र हैं तो देश में सभी के लिए कानून बराबर क्यों नहीं ? कोई अंदर और कोई बाहर क्यों है ? अगर सचमुच संविधान से चलने वाला लोकतंत्र इस भारत देश में स्थापित करना हो , तो इसकी पूर्वशर्त के तौर पर राजनैतिक विचारों के सभी बंदियों को बिनाशर्त तुरंत छोड़ दिया जाए , ऐसी हम आपसे मांग करते हैं .

आप के न्याय बंदी

सुधीर धावले ,सुरेन्द्र गाडलिंग महेश राउत ,रोना विल्सन, अरूण फरेरा ,वर्णन गोनसाल्विस वरवर राव ,सुधा भारद्वाज ,शोमा सेन .

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