कला साहित्य एवं संस्कृति

अगरिया : लौहकर्म के आदिम असुर जनजाति

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पुस्तक समीक्षा

वेरियर एल्विन भारतीय मानवशास्त्र में एक चर्चित नाम है। उनका अध्ययन क्षेत्र मुख्यतः मध्य भारत के जनजातीय क्षेत्र रहा है। इस क्षेत्र के ‘बैगा’, ‘अगरिया’, ‘मुड़िया’ जनजाति का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया और उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सभी पहलुओं के तार्किक विवेचन का प्रयास किया। एल्विन जनजातियों के बीच पहली बार 1932 में मध्यप्रदेश के अमरकंटक के पास ‘करंजिया’ में अध्ययन के लिए आए। यह क्षेत्र मुख्यतः ‘बैगा’ जनजाति के लिए जाना जाता है। बैगा जनजाति का उनका अध्ययन 1939 में ‘द बैगा’ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।

‘अगरिया’ जनजाति का अध्ययन उन्होंने बैगा जनजाति के अध्ययन के समानांतर किया, क्योंकि इस क्षेत्र में वे भी निवासरत हैं। एल्विन के अनुसार अगरियाओं के अधिकांश सांस्कृतिक लक्षण बहुसंख्यक बैगाओं के अनुरूप हैं, इसलिए उन्होंने इस पुस्तक को एक तरह से ‘द बैगा’ का पूरक कहा है। बावजूद इसके अगरियों की अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता रही है। ‘अगरिया’ पहली बार 1942 में प्रकाशित हुई थी।

भारतीय इतिहास में आर्य-अनार्य का प्रश्न काफी उलझा हुआ है। मुख्य समस्या निवास स्थल और प्रवास को लेकर रही है। आज यह बात लगभग स्पष्ट है कि आर्य एक भाषायी समूह रहा है। मगर यह भी स्पष्ट है कि वैदिक काल से ही यहां विभिन्न सांस्कृतिक समूह रहे हैं, जिन्हें ‘अवैदिक’ ‘अनार्य’ सम्बोधनों से उद्धृत किया जाता रहा है। इनमे विभिन्न जनजातीय समूहों की प्राचीनता निर्विवाद है। इस तरह ऐतिहासिक काल से ही कृषि सभ्यता के विकास के बाद नागर-ग्रामीण-जनजातीय समाज का अस्तित्व दिखाई देता है, जिनमे परस्पर अन्तःक्रिया होती रही है। औद्योगिक विकास जनित आधुनिकता के पूर्व यह अन्तःक्रिया धीमी थी, मगर उसके बाद उसमें तीव्रता आई। आज स्तिथि यह है कि जनजातियों की पृथक पहचान पर ही संकट है।

‘अगरिया’ जनजाति जैसा कि नाम से ही सपष्ट है, आग से सम्बंधित है। अगरियों का इतिहास धातुकर्म के इतिहास से जुड़ा हुआ है। लोहे की खोज मानव सभ्यता के विकास मे मील का पत्थर साबित हुआ। इसी की सहायता से जंगलो को काटकर कृषि सभ्यता का विकास हुआ। हल के फाल, कुल्हाड़ी, गाड़ी के पहिये के रिंग ने एक नई सभ्यता के विकास की ओर अग्रसर होने में मदद की। मगर लोहे को उसके अयस्क से पृथक कर उपयोग के लायक बनाने की तकनीक तक पहुंचना दीर्घकालिक और जटिल अनुभव रहा होगा। मगर मनुष्य ने इसे सम्भव कर दिखाया। अगरिया उन्ही आदिम कारीगरों के वंशज हैं, जिन्होंने लोहे को उसके अयस्क से पृथक कर उपयोगी बनाना सम्भव किया। उन्होंने न केवल लोहे को अयस्क से पृथक किया, अपितु उससे उपयोगी, अनुष्ठानिक और सौंदर्यपरक साजो-समान बनाने की कला का विकास किया।

एल्विन की पुस्तक ‘अगरिया’ में  इसी जनजाति का समग्रता में अध्ययन है। एल्विन ने इसमें अगरियों के सामाजिक लोकाचार की अपेक्षा उनके मिथक, उत्पत्ति, उनके धातुकर्म के अन्य सभ्यताओं से समानता-विषमता पर अधिक ध्यान दिया है। एल्विन के अनुसार अगरियों के सांस्कृतिक पक्ष उनके बहुसंख्यक पड़ोसी बैगा से मिलते जुलते हैं, जिसका वर्णन उनकी पुस्तक ‘द बैगा’ में किया जा चुका है। एल्विन ने दिखाया है कि मैदानी क्षेत्र में रहने वाले ‘लोहार जाति’ और अगरिया कार्यों में समानता के बावजूद भिन्न सांस्कृतिक समूह हैं। लोहार जहां केवल प्राप्त लोहे का उपकरण बनाते हैं, वहीं अगरिया अपनी भट्टी में अयस्क का निष्कर्षण भी करते हैं। लोहारों का देवतंत्र सनातन परंपरा के ‘विश्वकर्मा’ से जुड़ता है वहीं अगरिया खुद को ‘असुर’ परंपरा से जोड़ते हैं; उनके विशिष्ट देवता ‘लोहासुर’, ‘अग्यासुर’, ‘कोयलासुर’ आदि हैं, जो वैदिक देवतंत्र से भिन्न रहे हैं। यों सांस्कृतिक विशिष्टता का निर्माण अपने भौगोलिक-सामाजिक परिवेश के अन्तःक्रिया से होता है, इसलिए पेशागत समानता बावजूद सांस्कृतिक भिन्नता हो सकती है।

असुर कौन थे? क्या वैदिक साहित्य में उल्लेखित असुर ही असुर-अगरियों के आदिम पूर्वज थे? इस पर मत भिन्नता है। औपनिवेशिक इतिहास चिंतन में तो आर्य-अनार्य की तर्ज पर सुर-असुर की समस्या की सुलझा दी जाती है। यानी सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता ‘असुरों’ को ‘सुरों’ ने पराजित कर बेदखल किया। वैदिक साहित्य में देवासुर संग्राम भी है। मगर समस्या इतनी आसान नही है। असुर प्रारम्भ में देवताओं के लिए प्रयुक्त होता था, मगर बाद में उसका अर्थ उल्टा हो गया। इसी तरह सुर का भी अर्थ बदल गया। एस.सी.राय के अनुसार जब पाषाण युग से सभ्यता का विकास लौह युग की तरफ हुआ तो पाषाण युग के आदि मानवो तथा नई धातु का उपयोग करने वालों के मध्य संघर्ष हुआ होगा। उन्होंने इस तथ्य पर ध्यान आकर्षित किया है कि मुंडो में तथा छोटा नागपुर के आदिम आदिवासियों मे पारम्परिक रूप से, देश आदिम आदिम पेशे वालों को धातु का उपयोग करने वाले समुदायों द्वारा असुर कहा जाता था और ऐसा इसलिए कहा जाता था क्योंकि मुंडाओं ने अपने आराध्य देव सिंगबोंगा की सहायता से धातु का प्रयोग करने वालों को नष्ट कर दिया था।

राय की स्थापना से एक दिक्कत यह है कि ‘धातु का प्रयोग न करने वाले असुर हैं’, जबकि बाद की अवस्था में असुर-अगरिया का मुख्य व्यवसाय ही लौह कर्म हो गया। तो क्या यहां भी नाम का स्थानापन्न हो गया? जबकि एल्विन की स्थापना में “इन प्राचीन असुर आदिवासियों ने बिहार के मुंडा प्रदेश पर आक्रमण किया होगा तथा मुंडा आदिवासियों द्वारा अपने देव सिंग-बोंगा के प्रभाव से इन असुर आदिवासियों को बिहार की सीमाओं तक खदेड़ दिया होगा। इसके बाद वे असुर आदिवासी पश्चिम तथा दक्षिण दिशाओं में सरगुजा, उदयपुर, कोरिया तथा बिलासपुर के उत्तरी इलाके तक फैल गए होंगे। इसी प्रजाति का एक कमजोर तबका, रायपुर से होते हुए मैकल पहाड़ियों तक आकर बसा होगा जहां उन्हें उपयुक्त आवास तथा ढेर सारे लौह अयस्क के भंडार मिले होंगे।”

भगवान सिंह अपने इतिहास सम्बन्धी विवेचन से निष्कर्ष निकालते हैं कि असुर वे लोग कहलाए जिन्होंने झूम कृषि को छोड़कर स्थायी कृषि को नहीं अपनाया जबकि सुर स्थायी कृषि व्यवस्था को अपनाने वाले लोग कहलाए। एल्विन इस बात को रेखांकित करते हैं कि “अगरिया परंपरा इस मत को जरा भी आधार नही देती है कि आज के अगरिया-असुर, पूर्व असुरों के ही वंशज हैं तथा वे भी पुरानी परंपरा के असुरों के व्यवसाय को आज भी अपना रहे हैं। प्राथमिक रूप से नामों में साम्यता है।”

इस तरह अगरिया असुरों और वैदिक साहित्य में वर्णित असुरों के आपसी सम्बन्ध होने न होने की समस्या और जटिल हो जाती है। मगर अगरिया मिथक वैदिक देवताओं से प्रतिद्वंदिता से भरे हैं “जैसे विष्णु ने समुद्र मंथन के अवसर पर निकलने वाली अनेक बहुमूल्य वस्तुओं को प्राप्त करने में असुरों को धोखा दिया था। उसी प्रकार भगवान ने प्रथम अगरिया राजा लोगुंडी को भी धोखा दिया था और उसके नगर को नष्ट कर दिया था। उसी प्रकार अर्जुन तथा अन्य पांडव भाइयों ने असुरों के विरुद्ध युद्ध किया तथा उनके किलों पर अधिकार कर लिया। वैसे ही भीमसेन के नेतृत्व में पांडवों ने लोहरीपुर पर आक्रमण कर उसका विनाश कर दिया था। जिस प्रकार असुर राहु हमेशा सूर्य को ग्रसित करने के लिए लालायित रहता है वैसे ही अगरिया ज्वालामुखी भी हमेशा तैयार रहता है तथा कम से कम मण्डला जिले में सूर्य और आदिवासियों के मध्य प्रतिद्वंदिता की परंपरा है तथा वहां उस जिले में सूर्य की किरणों या धूप में बैठकर लोहे का काम करने पर पूर्ण निषेध है।”

पुस्तक में एल्विन ने अगरिया जनजाति के संगठन, गोत्र व्यवस्था, किवंदतियां, टोना-टोटका, आय-व्यय, उनके लौह भट्टी, कार्यस्थल आदि का विस्तृत वर्णन किया है, जो न केवल मानवशास्त्र के विद्यार्थियों अपितु सांस्कृतिक इतिहास में रुचि रखने वाले पाठको के लिए भी रोचक है। एल्विन ने अगरिया के बहाने पूरे विश्व में लौह कर्म के विकास और परंपरा का भी विवेचन किया है। जैसा कि ऊपर ज़िक्र हो चुका है लोहे की खोज ने सभ्यता में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाया जिसके कारण यह प्रारम्भिक मानव समुदाय के लिए आकर्षण-विकर्षण का कारण भी बना। प्रारम्भिक मानव ने इसमें ‘जादुई शक्ति’ का अहसास किया होगा, क्योकिं इसने तत्कालीन सभ्यता के लिए असम्भव कार्य को सम्भव बनाया। यही कारण है कि पूरे विश्व में शुभ कार्यों से लेकर जादू, टोने-टोटके में लोहा का प्रयोग होता रहा है। खासकर ‘कुवारी लोहा’ जो अगरिया लौह भट्टी से प्रथम बार बनकर निकलता है उसे अत्यधिक पवित्र मन जाता रहा है।

एल्विन ने चालीस के दशक में ही अगरियों की निम्न आर्थिक-सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है। अत्यधिक श्रम के बाद भी उन्हें पर्याप्त पारिश्रमिक नही मिल पाता था। सामाजिक रूप से गोंड़, बैगा उसे निम्नतर मानते थे, हालांकि गोंडों के साथ उनके खाने का सम्बन्ध रहा है। तत्कालीन समय में ही फैक्ट्री से तैयार लोहे की आपूर्ति के कारण अगरियों का महत्व घटता जा रहा था, और उनकी भट्टियाँ बन्द होने लगीं थीं। आज तो चालू हालत में अगरिया भट्टी ढूंढना भी दुर्लभ है। जाहिर है बेहतर तकनीक पुरानी तकनीक को खत्म कर देती है मगर समस्या यह है कि तकनीकी रूप से पिछड़ते लोगों का व्यवस्थापन अक्सर सार्थक ढंग से नही हो पाता।

कृति – अगरिया (हिंदी अनुवाद, अनुवादक प्रकाश परिहार)
लेखक – वेरियर एल्विन
प्रकाशन – राजकमल, वन्या
पुस्तक समीक्षा – अजय चंद्रवंशी

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