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? अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : हादिया के बहाने एक नजर, महिलाओं के जनवाद पर : सीमा आज़ाद ,संपादक दस्तक़

दस्तक मार्च-अप्रैल का सम्पादकीय

 

8.03.2018 

इलाहाबाद .

 

24 साल की हादिया अपने घर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बार-बार कह रही है कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है और अपनी मर्जी से ही धर्म परिवर्तन किया है, लेकिन सत्ता की इकाईयां उसकी बात मानने को तैयार नही है। घर से लेकर राज्य तक सभी कह रहे हैं कि 24 साल की ‘अखिला अशोकन’ को ‘शफीन जहां’ नाम के व्यक्ति ने बरगलाकर ‘हादिया’ बनाकर उससे शादी कर ली है। इतना ही नहीं सरकार ने उसकी ‘मर्जी’ को नकारते हुए इस शादी की जांच का काम एनआईए को सौंप दिया।

 

सुप्रीम कोर्ट में अपनी पेशी के दौरान हादिया ने कोर्ट के सवालों का जिस तरीके से जवाब दिया है, उससे उसके दिमागी रूप से सन्तुलित होने का भी प्रमाण मिल गया, फिर भी यही माना जा रहा है कि उसे बरगलाया गया है। इतना ही नहीं अदालत के सामने जब उसने अपनी मेडिकल की पढ़ाई जारी रखने, और पिता के साथ न रह कर पति के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की, तो कोर्ट ने उसकी बात अस्वीकार कर उसका अभिभावकत्व पढ़ाई के दौरान उसके कॉलेज के प्रिंसीपल को सौंप दिया। सुप्रीम कोर्ट में इस ‘हादिया’ को लेकर बहस जारी है, अगली तारीख 8 मार्च है.

कल्पना कीजिये, यदि अखिला उर्फ हादिया लड़की न होकर 24 साल का लड़का होती, तो क्या होता? निश्चित ही तब उसकी शादी और धर्म परिवर्तन दोनों को एक बालिग व्यक्ति का निर्णय माना जाता, और उसका अभिभावक उसके कॉलेज के प्रिंसीपल को बनाने की बात तो सोची भी नहीं जाती। हादिया के खिलाफ जिस तरह से इस देश की पूरी मशीनरी खड़ी हो गयी है, उससे यह समझा जा सकता है कि इस देश की संरचना में कितना जनवाद है। उसमें भी जब बात महिलाओं के जनवाद की हो, तो यह लोकतन्त्र दिखावटी लगने लगता है। लोकतंत्र को थामे रखने वाले कथित चारो स्तंभों पर एक नजर डाल लें तो यह बात खुलकर सामने आ जाती है कि हमारे देश में मुकम्मल समाजवादी जनवाद तो दूर, पूंजीवादी जनवाद भी नहीं है.

 

बात विधायिका से शुरू करें, तो 1947 में भारतीय सरकार बनने और 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के तुरन्त बाद संसद में महिलाओं को विवाह और सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार दिलाने वाले, अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित ‘हिन्दू कोड बिल’ पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद सहित पूरी विधायिका यानि संसद (जवाहर लाल नेहरू को छोड़कर) इसके खिलाफ खड़ी हो गयी और इसे ‘सामाजिक संरचना के लिए खतरा’ बताने लगी। बाद में यह टुकड़ों-टुकड़ों में तब कानून का हिस्सा बनने लगा, जब महिलाओं ने इसके लिए समय-समय पर आन्दोलन किया.

 

1986 में आया शाहबानों का मामला याद कीजिये, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम लॉ के खिलाफ जाकर सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाकशुदा पत्नी को भी गुजाराभत्ता का हकदार बना दिया, तो इसके खिलाफ संसद तुरन्त नया कानून लेकर आयी। इस कानून ने मुस्लिम तलाकशुदा महिला को मुस्लिम लॉ के अनुसार पत्नी मानने से इंकार कर गुजाराभत्ता पाने के अधिकार से वंचित ही रखा। मौजूदा तीन तलाक का मामला भी कितना ही प्रगतिशील होने का ढिंढोरा क्यों न पीटे, लेकिन इस कानून की कई कमियों के अलावा यह बड़ी कमी है कि इसमें यह भी कहा गया है कि ‘त्वरित तीन तलाक’ चूंकि मुस्लिम धर्म का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसको समाप्त किया जाता है। यानि यह धर्म में होता, तो इसे समाप्त नहीं किया जाता.

लोकतंत्र के दूसरे स्तंभ न्यायपालिका पर बात करें, तो यह महिलाओं के मामले में बेशक न्याय करती हुई दिखती है, लेकिन बीच-बीच में यहां से भी ऐसे फैसले और बयान आ जाते हैं, जो इस जनवादी राज्य व्यवस्था की पोल खोल देते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने बीएचयू के महिला छात्रावास में रात्रि प्रवेश के समय को बढ़ाने सम्बन्धी याचिका को खारिज करते हुए अपनी व्यक्तिगत सोच को देश भर की लड़कियों पर थोप दिया। उन्होंने महिला छात्रावास में समय बढ़ाने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ‘रात में मेरी बेटी भी घर से बाहर होती है तो मुझे या मेरी पत्नी को उसके साथ सुरक्षा के लिए होना होता है।’ देश की लड़कियां उनसे पूछना चाहती हैं कि रात में  घर ही सुरक्षित हैं तो ‘सुरक्षित घरों’ के अन्दर लड़कियों के साथ हिंसा या बलात्कार कैसे हो जाते हैं? या क्या इस डर से लड़कियां ‘बाहर’ निकलना बन्द कर दें, या सत्ता प्रशासन को इस डर का माहौल खत्म करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए?

 

इसके पहले 1975 में मथुरा रेप मामले में मथुरा नाम की आदिवासी महिला से थाने के अन्दर बलात्कार करने वाले पुलिस कर्मियों को अदालत ने यह कहकर बरी कर दिया था कि ‘मथुरा सेक्स की आदी है।’ इस फैसले के खिलाफ देश भर की महिलायें सड़कों पर उतर आयी थीं। 90 के दशक में राजस्थान की भंवरी बाई के बलात्कारियों को निचली अदालत ने इस आधार पर दोषमुक्त कर दिया था, कि ‘भंवरी ‘नीची जाति’ की है और ‘ऊंची जाति’ के आरोपी उसे छू भी नहीं सकते।’

कार्यपालिका की बात करें, तो बीएचयू जैसे संस्थान इसका साक्षात नमूना है, जहां पढ़ने वाली लड़कियों के साथ विषय चयन से लेकर छात्रावासों के भोजन तक में भेदभाव किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ज्यादातर संस्थानों में महिला सेल या जीएसकैश नहीं बनाये गये हैं, बल्कि यहां मनु के विधान को लागू किया जा रहा है। ये संस्थान पूरी तरह से पितृसत्तात्मक विचारों से लैस है। ऑफिस में काम करने वाली महिला का बॉस यदि पुरूष है, तो शोषण द्विस्तरीय है। इन संस्थानों की समस्या यह है कि यहां यदि किसी महिला के साथ महिला होने के नाते शोषण हुआ है, तो उसकी सुनवाई के लिए या तो कोई जगह नहीं है, या समाज में बात फैलने का हवाला देकर उसे उसे टाला जाता है, या महिला से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि वह एक और शोषण से बचने के लिए अपनी शिकायत ही वापस ले ले. इस अलोकतान्त्रिक माहौल के कारण ऐसे ज्यादातर मामले थानों तक पहुंचते ही नही हैं। लड़कियां इनके साथ जीने की आदी हो चुकी हैं.

चौथे स्तंभ-पत्रकारिता की बात करें, तो यह महिलाओं पर हिंसा से जुड़े समाचार जिस तरीके से प्रकाशित करता है, वह अपने आप में महिला विरोधी होता है। महिला आन्दोलनों ने और अखबारों में महिला पत्रकारों की बढ़ती तादाद ने इनकी भाषा को कुछ हद तक ठीक किया है, वरना इनकी भाषा पूरी तरह महिला विरोधी और पितृसत्तात्मक ही होती है। महिला सम्बन्धी अपने स्तंभों में हिन्दी के अखबार लड़कियों को पारम्परिक सुशील सुन्दर बहू या बेटी बनने की ही सीख देते हैं, न कि परिवर्तनकामी इंसान बनने की। 8 मार्च, अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर ये अखबार महिलाओं को मुबारकबाद तो देंगे, लेकिन औरतों की संघर्षशील छवि को रौंदकर एक निश्चित मानक में फिट सुन्दरी को खड़ा कर देंगे, या बाजारवादी आधुनिकता के साथ परम्परा का तालमेल करने वाली स्त्री को आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर देंगे। यह स्त्री विरोध का छिपा हुआ तरीका है.

यह जनवाद एक छलावा है, जो हादिया जैसे कुछ मामलों में स्पष्ट रूप में सामने आ जाता है। वास्तविक जनवाद हमें लाना है, जो केवल महिलाओं की ही नहीं, दलितों, अल्पसंख्यकों की बराबरी की भी वकालत करता है। हर अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मेहनतकश महिला आबादी इसी जनवाद को स्थापित करने करने का संकल्प लेती है, फिर से लेगी और संघर्ष के रास्ते पर बढ़ेगी, जब तक कि यह हमें मिल नहीं जाता.

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सीमा आज़ाद 

संपादक ,दस्तक़ ,इलाहबाद 

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