दस्तक के लिए प्रस्तुत अनिल करमेले *|| बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ ||* बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में, प्रलय में मेरा पता पदचिन्‍ह जीवन में, शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में
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⭕ आशीष नैथानी की कविताएँ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले *|| मैं जहाँ से आया हूँ ||* वहाँ आज भी सड़क किनारे नालियों का जल पाले से जमा रहता है आठ-नौ महीने, माएँ बच्चों को पीठ पर लादे लकड़ियाँ बीनती हैं स्कूली बच्चों की शाम रास्तों पर दौड़ते-भागते-खेलते बीतती है वहाँ अब भी
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14.8.1   अनुवादः पी. कुमार मंगलम_ *दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले* जब भी कोई लिख रहा होता है तो वह दूसरों के साथ बाँटने की ज़रूरत ही पूरी कर रहा होता है। यह लिखना अत्याचार के ख़िलाफ़ और अन्याय पर जीत के सुखद अहसास को साझा करने के लिए ही होता है। यह
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