बच्चे मन के सच्चे  (और बड़े ?)  — नथमल शर्मा ,संपादक इवनिंग टाइम्स

बच्चे मन के सच्चे (और बड़े ?) — नथमल शर्मा ,संपादक इवनिंग टाइम्स

11 सितम्बर 2017

एक बार फिर बच्चों पर चर्चा हो रही है। बात करते समय सबकी आंखें नम् है । देश के हर घर में माता-पिता चिंतित है । हमारे बच्चे अब स्कूलों में भी सुरक्षित नहीं है । कैसा समाज रच रहे हैं हम ? देश की राजधानी से लगे एक बहुत बड़े स्कूल में एक बच्चे को मार दिया गया । हत्यारे का दिल उस नन्हें प्रद्युम्न की मुस्कान से भी नहीं पसीजा।
दिल्ली से ही लगा हुआ है गुड़गांव। अब उसका नाम गुरूग्राम कर दिया गया है । इसी गुरूग्राम में है रेयान स्कूल । नन्हा-सा प्रद्युम्न इसी स्कूल में जिंदगी का सबक सीखने आया था । उस दिन उसके बेस्ट फ्रेंड सर्वेश का जन्मदिन था। सर्वेश ने कहा था कि जब मैं सबको चाॅकलेट दूंगा, तू मेरे साथ रहना । बहुत खुश था प्रद्युम्न । वह खुद ही तैयार होता था स्कूल के लिए । नहीं करता था तंग मम्मी को। उस दिन भी खुशी-खुशी गया स्कूल । किसी को नहीं पता था कि वह उसका आखिरी जाना था । वह नहीं लौटा। कभी नहीं लौटेगा। वहां चले गया जहां से कोई नहीं लौटता कभी । दुखद यह है कि वह गया नहीं,भेज दिया गया । उस छोटे से बच्चे की स्कूल में ही हत्या कर दी गई । उसके पिता छोड़ गए थे स्कूल । थोड़ी ही देर में स्कूल से फोन आया कि आपके बच्चे की तबियत ठीक नहीं है । वे भागे-भागे आए। लेकिन प्रद्युम्न को तो मार डाला गया था । स्कूल में उस मासूम की हत्या ने पूरे परिवार को दुखी कर दिया । ऐसा दुख जिसकी पूर्ति कहीं से नहीं हो सकती । प्रद्युम्न और उसके परिवार को बिना किसी अपराध के *ऐसी* सजा दे दी गई ।
इस हत्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया । हम कैसे निर्मम समय में आ गए हैं ? सामाजिक मूल्यों को जैसे तिलांजली ही दे दी गई । संवेदनाएं लगातार छीज रही है । बच्चे बहुत प्यारे होते हैं । बहुत मासूम भी। उनकी एक मुस्कान हमें जैसे खजाना दे देती है । कभी कहीं सफ़र में जा रहे हों, पास बैठा कोई बच्चा अचानक ही हमें देख मुस्कुरा उठता है । वह हमें नहीं जानता । फिर भी अपना नन्हा सा हाथ बढ़ाता है हमारी तरफ़ । और हम कितने भी परेशान हों, कितने भी तनाव में हों, उस मुस्कान पर अभिभूत हो जाते हैं । वह सफर बहुत सुकून से बीत जाता है ।बच्चे होते ही ऐसे हैं । नन्हा-सा प्रद्युम्न भी ऐसा ही था। उसकी हत्या कैसे कर दी उस निर्दयी ने ? हाथ क्यों नहीं कांपे उसके ?
यह सच है कि शिक्षा आज बहुत बहुत फायदे वाला व्यवसाय होकर रह गया है । सरकार ने अपनी इस संवैधानिक जिम्मेदारी से खुद को अलग कर लिया है । शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी हमारी बुनियादी जरूरत है। और इन तीनों से ही सरकार को कोई मतलब नहीं रहा । इस क्षेत्र पर व्यवसायी काबिज हैं । ज्यादातर में राजनेताओं और अफसरों का धन भी लगा हुआ है । नर्सरी और केजी की फीस हजारों,लाखों में है। नालंदा और तक्षशिला को याद करते हुए हम लोग ऐसी शिक्षा-दूकानों में अपने बच्चों को भेज रहें हैं । जहां कुछ भी भारतीय तो नहीं रहा । हालांकि ऐसी दूकानों से पढ़कर (?) निकले बच्चों से हम सब आदर्श भारतीय नागरिक की उम्मीद जरूर करते हैं । जो बच्चे संस्कृति और संस्कारों को समझ व ग्रहण कर भी रहे हैं तो वह उनके परिवार के कारण । ज्यादातर स्कूलों का इसमें कोई योगदान नहीं है । याद करिए कितना बाल-साहित्य रचा जा रहा है ? बच्चों के लिए कितने गीत या कविताएँ लिखी जा रही है ? हम कितना समय दे रहे हैं बच्चों को ? हमें बच्चों के लिए काम करने पर हाल ही में नोबल पुरस्कार मिल चुका है । कैलाश सत्यार्थी को यह सम्मान मिला है । वे विदिशा में जन्मे और दिल्ली में रहते हैं । बचपन बचाने के लिए जुटे रहते हैं । कैलाश सत्यार्थी ने भी हाल ही में कहा है कि हमारे देश में हर क्षण बच्चों के साथ क्रूरता होती है । एक अन्य अध्ययन में भी यह बात आई है कि बच्चों के साथ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं । पिछले पांच वर्षों में यह दर लगभग दुगनी हो गई । इधर समाज का मध्य वर्ग लगातार कैरियरिस्ट ही हुआ है । वह बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा की उपेक्षा ही करता है । वह उन्हें कम्प्यूटर- लेबर बना रहा है । पैकेज से खुश है। परदेश में नौकरी पर गर्वित है। एक होड़ सी मची है समाज में । एक-दूसरे की देखा देखी हर वर्ग इसमें जुट गया है । यह एक प्रकार की मजबूरी भी है । काम के अवसर लगातार कम हो रहे हैं । कृषि अब फायदा का काम नहीं । उद्योग लगा नहीं सकते । जाहिर है कम्प्यूटर – लेबर ही बनना है । और इसी मजबूरी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं स्कूल को दूकानों की तरह चलाने वाले । वहां सब कुछ बहुत महंगा है । माता-पिता अपना पेट काटकर भारी-भरकम फीस भर रहे हैं । फिर भी बच्चे सुरक्षित नहीं है । प्रद्युम्न जैसे बहुत प्यारे बच्चे की हत्या उसी के स्कूल में कर दी जाती है । किसी छोटी सी बच्ची के साथ बलात्कार हो जाता है । दिल्ली से लेकर देश के लगभग हर गांव-शहर में ऐसा ही हो रहा है और दुखद यह है कि हम सब बहुत असहाय से होकर इस सब होने देने को जैसे स्वीकार ही करते हैं । ऐसा संवेदनहीन समय पहले कभी नहीं रहा । हालांकि फिर भी उम्मीद कायम रहती है। हम बच्चों से प्यार करते रहें ।

– नथमल शर्मा
(ईवनिंग टाइम्स में प्रकाशित आज शाम की बात)

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