हाँ ,में एक लड़की हूँ  *** ज़हीन सिंह -,अभिव्यक्ति . 1 

हाँ ,में एक लड़की हूँ *** ज़हीन सिंह -,अभिव्यक्ति . 1 

अभिव्यक्ति . 1 
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हाँ ,में एक लड़की हूँ ,
खुले पंखों वाली लड़की ,
आज़ाद ख्यालों वाली लडकी
इस पुरूषवादी समाज में ,अपनी खुशी के लिये लडती
हुई लडकी .
जानती हूँ ,लोग कहेंगे कैसे रहेगी अकेली
इस समाज में .
जहाँ अँधेरा होते ही दुबका दी जाती है ,लडकियाँ .
लडकीयाँ जहाँ शादी एक मात्र लक्ष्य बन जता है उनका .
समझोता ,कुर्बानी ,आत्मसमर्पण , बचपन से सिखा देते है उसे .
खुली आँखोँ से क्या सपनो में भी सपना नहीं देख सकते .
उस समाज में लडकर अपने सपनों के लिये बढ रही हूँ .
और अपनी पहचान बनाने के लिए ,
तिल तिल लड़ रही हूँ ,क्योंकि में लडकी हूँ .
अनजान शहर में अनजान लोगो के बीच
खुद को पा रही हूँ .
अपनी किस्मत खूद लिखने के लिये ,
रोज रोज एक एक कदम रख रही हूँ ,में .
मुझ जैसी न जाने कितनी लडकियाँ ,
पर्दे के पीछे से उड़ने का ख्वाब देखती हैं .
पर कही उम्मीद की रोशनी नज़र न आई ,तो
उलटे पैर लौट जाती है , जहाँ से चली थी .
क्यों कि वह भी लडकी है.
डरी सहमी सी लडकी !
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1.8.17

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