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दस्तक  में आज प्रस्तुत

26.7.17

*आज छब्बीस जुलाई को उषा आठले की बारी है । उषा रायगढ़ में रहती हैं और भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़ी सुप्रसिद्ध रंगकर्मी व रंग निर्देशक हैं । उषा एक कवयित्री के अलावा एक अनुवादक भी हैं और मराठी से अनेक पुस्तकों के हिंदी में व हिंदी से मराठी में अनुवाद भी किये हैं जिनमे प्रख्यात चित्रकार भाऊ समर्थ की किताब भी है ।*

*उषा आठले की कुछ कविताएँ आज दस्तक में प्रस्तुत कर रहा हूँ , उनके अनुसार यह बहुत पुरानी कविताएँ हैं।*

शरद भाई, लगभग बीस वर्षों से मैंने कोई कविता नहीं लिखी। इसलिए पुरानी कविताएं तारीख़ के साथ भेज रही हूँ। – उषा

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1 मौसम

धूपछाँही मौसम में
कीचड़ में पैर धँसाए
रोपा लगाते हुए झुके शरीर
गुनगुनाते हैं
धान की झूमती पकी बालियों की तरह,
कीचड़ के साथ
पैरों से चिपकती जोंकें
दूर फेंकते हुए
रोपा थामी उंगलियाँ
फिर जुट जाती हैं
मटमैले पानी के ऊपर
धानी ध्वजाएँ फहराने में।

(१९ जुलाई १९८४)

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*२. किसानों के लिए*

बीजों को अपने में समेटे
गीली और गर्म धरती
चुप नहीं रह सकती
हवा अपना असर दिखाएगी
समय के अगले पड़ाव पर
फसल उगाने वाले हाथ
आपस में गुँथकर
समूची धरती को
अपनी बाँहों में भर लेंगे।

(१० जनवरी १९८५)

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*३. गिरगिट*

बरामदे में बैठी अम्माजी
फ्रिज भरने के लिए
करती हैं मोलभाव फेरीवाले से
बहस के बीच अटकी है
एक चवन्नी या अठन्नी।
टोकरी में फल-सब्जी रखवाते
खिल उठता है उनका चेहरा
ठगी से बच जाने के संतोष में।
वही अम्माजी
बिलासपुर की बड़ी दुकान में
साड़ियां पसंद करती हुई
किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह
कैशमेमो के साथ पेमेंट करती
पैकेट्स थामे निकल पड़ती हैं
मोहक मुस्कान के साथ।
मैं सोचती हूँ
सब्ज़ी, आम और
महंगी साड़ियों का फ़र्क
कितना बदल देता है
अम्माजी को !!

(२० अक्टूबर १९८३)

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*४. माँ और बच्चा*

बार-बार दस्तक देता
अपनी उपस्थिति का अहसास कराता
कुलबुलाता रहता है दिन-रात
वह
हमारा अजन्मा नन्हा
मेरे भीतर
उसकी हर आहट में
कुछ तुम
और कुछ मैं
नए सिरे से फिर
उगने लगते हैं
उसमें क्या तुम्हारा है
क्या मेरा
और क्या बिल्कुल उसका अपना
हम ढूंढते रहेंगे
उसके पैदा होने पर।
हम दोनों
उसके माता-पिता होने के साथ
फिर जियेंगे
अपना-अपना बचपन
एक नई खुशबू के साथ।

(१६ नवम्बर १९८७)

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*५ .मेरा देश*

आजकल तो
आँकडे ही बोलते हैं
कभी-कभी पोल भी खोलते हैं
आँकडे ही विकास की गति हैं
वे ही करते हैं प्रस्तुत
परिणाम और प्रमाण
आँकडे कहाँ से आते हैं ?
वे फूले हैं या पिचके??
इसकी जड़ों तक पहुँचे
तो दिखेगा…
कर्णधार विकास नहीं,
आँकडे माँगता है,
आँकडों पर सोचता है
योजनाएँ बनाता है
आँकडों में ही।
वह अपनी उपलब्धि पर
ख़ुश है
आँकडे साधन नहीं
साध्य हो गए हैं।

(२१ मार्च १९९४)

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*कविता : उषा आठले*

( *दस्तक के लिए प्रस्तुति- शरद कोकास*)

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