24.7.17

 

मित्रों आज प्रस्तुत कर रहा हूँ सरला शर्मा जी की दो रचनाएँ जिनमे एक कविता है और एक गद्यांश । इन्हें पढ़कर अपनी राय ज़रूर प्रकट करे ।*

*सरला शर्मा* हिंदी की प्राध्यापिका रही है । आप हिंदी छत्तीसगढ़ी व बांग्ला तीनों भाषाओं में लिखती है । आपकी प्रकाशित रचनाएँ हैं :

शरद कोकास 

*हिंदी में*
1 वनमाला (.काव्य संग्रह )
2 बहुरंगी (निबन्ध संग्रह )
3 तीजन बाई और पंडवानी (व्यक्ति परिचय )
4 कुसुम कथा (उपन्यास )
5 सत्यम वद (कहानी संग्रह )
*छत्तीसगढ़ी मे*ं
1 सुरता के बादर (संस्मरण)
2 माटी के मितान (उपन्यास)
3 सुन संगवारी (मिझरा)
4 आखर के अरघ (निबन्ध संग्रह)
*बंगला मे*ं
बाल गीत .प्रकाशनाधीन
आपकी अभिरुचि …साहित्य पठन ,पाठन में है तथा
आकाशवाणी ,दूरदर्शन से आपकी रचनाओं और व्याख्यानों का निरन्तर प्रसारण होता है । सरला जी का निवास पद्मनाभपुर दुर्ग में है ।

*एक कविता*

जग संकुल जग के मेले में
मेरे गीतों को लेगा मोल
कौन न जाने कोई
चिर हास अश्रु से पूरित
है मानव का मन
हास झरे पथ में ,कब कैसे
इन्हें समेटे कौन
न जाने कोई
पाकर प्रेम कृतार्थ हुई तो
देकर हुई कभी कृत कृत्य
देने पाने की इस क्रीड़ा को
सार्थकता देता है कौन
न जाने कोई …
जिज्ञासाओं के अरण्य में
चलते चलते साँझ हो गई
पथ हारे दिग्भ्र्मित पगों को
मंजिल तक पहुंचाए कौन
न जाने कोई ……
मेरे गीतों को लेगा मोल
न जाने कोई …..

*सरला शर्मा*

●●●●

*एक गद्यांश*

तबे एकला चलो रे …..प्रश्न उठता है कब अकेले चलें ? विशेष कर आज जब सोशल मीडिया ने अकेलेपन को खत्म करने का बीड़ा उठा रखा है ,सब अपनी सुनाने को बेताब हैं ऐसे में न सुनने की फुर्सत है न गुनने का अवकाश । कम उम्र लोगों की यह बेताबी समझ में भी आती है पर उम्रदराज़ लोग भी इस भीड़ में शामिल हो गये है । प्रकृति संकेत दे रही है इन्द्रियां शिथिल होने लगी हैं , सरकार ने अवकाश यानि रिटायर कर दिया जिस संस्था में आप कम करते हैं वहां किसी और ने कार्यभार ग्रहण कर लिया अब वहां आपकी
हमारी कोई उपयोगिता नहीं है गैरजरूरी हो गये हैं , जिस परिवार के केंद्र बिंदु थे उसकी बागडोर नई पीढ़ी ने सम्भाल लिया है , दोस्तों की महफ़िल में अब कहकहे नहीं गूंजते वहां शिकायतों कीअंतहीन चर्चा चलने लगी है मानें न मानें अकेले पड़ गये है अब तो एकला चलें । अंततः महंगे अस्पताल में कीमती दवाओं के सेवन के बाद मोटी फ़ीस वाले विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख में भी हम बेड पर अकेले ही तो होते हैं अपनी पीड़ा अकेले ही भोगते हैं । डरिये मत मेरा आशय आपको भयभीत करना नहीं है ।
कैसे शुरुवात करें ..तो आइये अभ्यास करें भीड़ में रहकर भी , भीड़ में शामिल न रहने की ….अंतर्यात्रा यहीं से शुरू होनी है तो अभ्यास पहले से करें ताकि यह स्थिति हमें कमजोर न होने दे । हर व्यक्ति अकेला ही होता है अपनी अनुभूतियों ,सम्वेदनाओं के साथ तो जब कोई हमारी आवाज़ सुनकर ठहर नही सकता तो अरण्य रोदन क्यों भाई ? ऐसा करें सोशल मीडिया में कोई post न करें बेशक पढ़ें ….मित्रो से कम से कम हफ्ते भर तक कोई बात न करें , घर में ही रहें पर नितांत आवश्यक हो तभी बोलेन पर अपनी सोच
आदेश किसी पर न लादे …यह संवाद हीनता आपको खुद से संवाद करने में सहायक होगी । क्रमशः आप
बीती सफलताओं असफलताओं को तटस्थ होकर देख पाएंगे ,आनन्द आने लगेगा , भविष्य के लिए जोड़ने घटाने की जरूरत तो रह नहीं गई है खुद दिल से दिल की बात कहें …बरसों से जमी शिकायतें
पिघलने लगेगी । यही अकेलापन रास आने लगेगा , मन शुरू में उछल कूद मचाएगा पर कब तक ? धीरे धीरे शांत होने लगेगा यह शांति खुद पर भरोसा करना सिखा देगी । यही होगी एकला चलो की स्थिति …
बेशक हफ्ते भर बाद फिर सक्रिय हो जाइये , तब आप पाएंगे आपके बिना भी दुनिया चलती रही है ।जरूरी और आखिरी बात जो सचमुच आपके मित्र है वे इस एक हफ्ते के एकांतवास के बाद भी आपके साथ हैं …यही होंगे सच्चे साथी जो मित्र शब्द को परिभाषित करते हैं ।
याद आये रवि ठाकुर ….जदि तोर डाक शोने केउ ना आसे तबे एकला चलो रे …..
हरियाली अमावस है आज घने बादलों ने अँधेरे को और बढ़ा दिया है पर प्रकाश पर्व यहीं से तो शुरू होता है …मित्रों इस आलोकमय पथ पर आपकी यात्रा शुभद सुखद हो …।

*सरला शर्मा*
दुर्ग ( छ ग)

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