माखन लाल शोरी द्वारा प्रमाणित व लिखित शोध

कोयतुर भाषा पर आधारित मूल इतिहास की जानकारी

कोयतुर समुदाय की भाषा में ही है इतिहास
लंकाकोट से लगा है किरन्दुल कोट की इतिहास
कोयतुर भाषा गोंडी भाषा में
किरंदुलकोट का अर्थ किसी अन्य भाषा में नहीं है लेकिन गोंडी भाषा में है
गोंड़ी भाषा में किरंदुलकोट का प्रादुर्भाव कोंदल मेंदुल मेटा की अपभ्रंश से हुई है। अपभ्रंश के फलस्वरूप यह पहचान किरन्दुल हुई। कोंदल का अर्थ होता है बैला , मेंदुल का मतलब होता है देह / शरीर, मेटा का अर्थ होता है पहाड़ अर्थात बैल के शरीर के आकार की पहाड़ को ही गोंड़ी में कोंदल मेंदुल मट्टा कहते हैं।

जो कालांतर में अपभ्रंश के फलस्वरूप किरन्दुल के नाम से जाना पहचाना जाता है। इसका पुराना नाम कोंदल मेंदुल मट्टा था। जो की गोंडवाना समुदाय की कोट गंड व्यवस्था विकास क्रम से पूर्व ही नामांकित हो गया था। कोया पुनेम व वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार इसकी कालखंड 5000 वर्ष पूर्व बैठती है। यह छेत्र उस समय किरंदुलकोट के नाम से विख्यात थी। किरंदुलकोट में ही पहांदी पारी कुपार लिंगो द्वारा कोया पुनेम की विस्तारीकरण के समय गिदाल की सवारी करके गीदम नामक स्थान पर उतर कर कोयतुर समुदाय को कोया पुनेम की शिक्षा दी गयी थी इसलिए उस स्थान को कालांतर में गिदाल कोडा से गीदम के नाम से जाना पहचाना जाता है। यह छेत्र ही गोंड समुदाय की मूल उत्पत्ति जगह है।

किरंदुलकोट व लंकाकोट छेत्र की पुरातन नार अर्थात गॉवों की नाम गोंडी भाषा के अनुसार ही है। जो यह प्रमाणित करते हैं की इस छेत्र की पुरातन मूल बीज कोयतुर गोंड ही है।यह खोज मैं गोंड़ी भाषा के अध्ययन के अनुसार ही प्रमाणित किया हूँ।वैसे ही वर्तमान दंतेवाड़ा की मध्यकालीन नाम तारला गुढ़ा थी गोंड़ी भाषा मे तारला शब्द तारना से बना है तारना का अर्थ है बिछाना या ढकना अर्थात यह छेत्र दो नदियों का संगम छेत्र है। दोनों नदियों के संगम के कारण इस छेत्र हमेशा डोबान मतलब जल प्लावन से ढके हुए रहते थे।इसी प्राकृतिक घटनाओं के कारण इस छेत्र को गोंड़ी भाषा में तारला गुढा कहते थे। गुढा का अर्थ है छेत्र या स्थान या निवास। जो कालांतर अर्थात में प्रवासित समूहों के आक्रमण के पश्चात उनकी पुरखों के सम्मान में दंतेवाड़ा कहलाया। लंकाकोट व किरंदुलकोट के कई गांव आज भी इस इतिहास की प्रामाणिकता को साबित करते हैं। जैसे भैरमगढ़,तुमनार, गीदम कांकेर लंका, चिता लंका ,पालनार, सुकमा, कूका नार, बका वंड, कोड़े नार, चितर कोट, करन दोला , मुरनार, पेन दोनगुर, गढ़ धनोरा, कोंडा नार आदि गांव के नाम गोंड़ी भाषा की विशेषता लिये हुये हैं। इसलिए इन छेत्रों में गांयता भूम्यारक गोंड समुदाय के ही टोटम धारी कोयतुर ही हैं।

माखन लाल शोरी

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